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भारत, Jun 01, 2026

Polymenorrhea : 1 महीने में 2 बार पीरियड्स आना नॉर्मल नहीं; गायनोलॉजिस्ट से जानिए कारण, जांच और इलाज

Polymenorrhea: क्या आपको भी महीने में दो बार पीरियड्स आ रहे हैं? इसे सिर्फ स्ट्रेस मानकर नजरअंदाज न करें। डॉक्टर से जानें इसके पीछे के छिपे मेडिकल कारण, लक्षण, जरूरी टेस्ट आदि।

Polymenorrhea Severe Anemia Hypothalamus Infertility Hormonal Imbalance

जब महीने में दो बार ब्लीडिंग बने चिंता की वजह।( Photo: AI Generated)

Polymenorrhea : महिलाओं की सेहत और उनके शरीर का आंतरिक संतुलन काफी हद तक उनके मेंस्ट्रुअल साइकिल (मासिक धर्म चक्र) पर निर्भर करती है। इसे एक सामान्य और स्वस्थ पीरियड साइकिल को शरीर के सुचारू रूप से काम करने का पैमाना माना जाता है। लेकिन जब इस चक्र में जरा सी भी गड़बड़ी होती है, तो यह पूरे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। ऐसी ही एक बड़ी और चिंताजनक समस्या है एक ही महीने में दो बार पीरियड्स (Two Periods in One Month) का आना।

अक्सर महिलाएं या युवतियां इस स्थिति को महज काम की थकान, सफर या सामान्य तनाव मानकर टाल देती हैं। लेकिन मेडिकल साइंस में इसे पॉलीमेनोरिया (Polymenorrhea) कहा जाता है, जिसे किसी भी स्थिति में हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। लगातार दो बार ब्लीडिंग होना इस बात का साफ संकेत है कि शरीर के भीतर हार्मोन का खेल बिगड़ चुका है या फिर गर्भाशय (Uterus) कोई गंभीर संकेत दे रहा है।

आइए, डॉ. मेघा .एस. शास्त्री, गायनोलॉजिस्ट से पॉलीमेनोरिया क्या है, इसके पीछे कौन सा मुख्य कारण हैं, शरीर पर इसके क्या दीर्घकालिक नुकसान हो सकते हैं और इसका सही इलाज क्या है; समझते हैं।

What is Polymenorrhea : क्या होता है पॉलीमेनोरिया ?

एक सामान्य और स्वस्थ महिला का मेंस्ट्रुअल साइकिल औसतन 28 दिनों का होता है। हालांकि, मेडिकल गाइडलाइंस के मुताबिक, अगर पीरियड्स 21 से 35 दिनों के अंतराल पर आ रहे हैं, तो इसे पूरी तरह से सामान्य (Normal) माना जाता है। इस दौरान 3 से 7 दिनों तक ब्लीडिंग हो सकती है। लेकिन, पॉलीमेनोरिया में जब किसी महिला का पीरियड साइकिल 21 दिनों से छोटा हो जाता है, तो उसे एक ही कैलेंडर मंथ (महीने) में दो बार ब्लीडिंग का सामना करना पड़ता है। इसी स्थिति को मेडिकल टर्म में पॉलीमेनोरिया कहते हैं।

एक महीने में दो बार पीरियड्स आने के मुख्य कारण

शरीर में बिना किसी ठोस वजह के पीरियड साइकिल छोटा नहीं होता। इसके पीछे कई शारीरिक, मानसिक और चिकित्सीय कारण हो सकते हैं जैसे,

  • हार्मोनल असंतुलन : महिला के शरीर में मुख्य रूप से दो हार्मोन एस्ट्रोजन(Estrogen) और प्रोजेस्टेरोन (Progesterone)पीरियड्स को नियंत्रित करते हैं। जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तो ओव्यूलेशन (अंडा बनने और रिलीज होने की प्रक्रिया) बाधित होती है, जिससे ब्लीडिंग जल्दी-जल्दी होने लगती है।
  • अत्यधिक मानसिक तनाव: जब हम बहुत ज्यादा तनाव में होते हैं, तो मस्तिष्क में 'कोर्टिसोल' (Cortisol) नामक स्ट्रेस हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है। यह हार्मोन सीधे उस हिस्से (Hypothalamus) को प्रभावित करता है जो ओवरी को पीरियड्स का सिग्नल भेजता है। इसके परिणामस्वरूप पीरियड्स समय से बहुत पहले आ जाते हैं।
  • थायराइड विकार (Thyroid Dysfunction): गर्दन में स्थित थायराइड ग्रंथि हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म और रिप्रोडक्टिव सिस्टम को कंट्रोल करती है। यदि थायराइड हार्मोन कम बन रहा हो (Hypothyroidism) या बहुत ज्यादा बन रहा हो (Hyperthyroidism), दोनों ही सूरतों में पीरियड्स अनियमित होकर महीने में दो या तीन बार तक आ सकते हैं।

गर्भाशय (Uterus) और ओवरी से जुड़ी बीमारियां

सवाल- कई बार महिलाओं को महीने में दो बार सिर्फ 'स्पॉटिंग' (हल्के खून के धब्बे) होती है और कई बार पूरा 'फ्लो' होता है। एक मरीज खुद यह कैसे समझे कि उसे दो बार पीरियड आया है या यह सिर्फ स्पॉटिंग है?

डॉक्टर का जवाब- इसमें अंतर हैं जैसे पीरियड ( Period): इसमें ब्लीडिंग का फ्लो तेज होता है, जिसके लिए हर कुछ घंटों में पैड या टैम्पोन बदलने की जरूरत पड़ती है। इसका रंग गहरा लाल होता है, इसमें खून के थक्के (Clots) आ सकते हैं, यह लगातार 3 से 7 दिनों तक चलता है और इसके साथ पेट या पीठ में तेज ऐंठन (Cramps) होती है।

स्पॉटिंग (Spotting): यह बहुत हल्की ब्लीडिंग होती है, जिसमें सिर्फ अंडरगारमेंट्स पर हल्के गुलाबी या भूरे रंग के धब्बे लगते हैं। इसके लिए पैड बदलने की जरूरत नहीं होती (सिर्फ पैन्टी लाइनर काफी होता है)। यह बिना किसी दर्द के 1-2 दिनों में अपने आप ठीक हो जाती है।

सवाल-क्या यह समस्या किसी खास उम्र की महिलाओं (जैसे टीनएजर्स या 40 से ऊपर की महिलाओं) में ज्यादा देखी जाती है, या यह किसी भी उम्र में हो सकती है?

डॉक्टर का जवाब -पॉलीमेनोरिया की समस्या वैसे तो किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन यह दो खास उम्र के पड़ावों पर सबसे ज्यादा देखी जाती है।

  • टीनएजर्स (किशोरावस्था): जब लड़कियों को पीरियड्स शुरू ही होते हैं, तब उनका 'हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी-ओवेरियन एक्सिस' (HPO Axis) पूरी तरह मैच्योर नहीं होता। इस वजह से शुरुआती 1-2 साल हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण पीरियड्स जल्दी-जल्दी आ सकते हैं।
  • 40 से ऊपर की महिलाएं (पेरिमेनोपॉज): मेनोपॉज से ठीक पहले के सालों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर तेजी से गिरता-उठता है, जिससे पीरियड साइकिल छोटी हो जाती है।
  • 20-40 उम्र में यह समस्या आमतौर पर पीसीओएस, थायराइड, लाइफस्टाइल स्ट्रेस या फाइब्रॉएड के कारण होती है।

सवाल- क्या सिर्फ तनाव के कारण एक महीने में दो बार पीरियड्स आ सकते हैं, या इसके पीछे हमेशा कोई गंभीर अंदरूनी बीमारी ही होती है?

डॉक्टर का जवाब - सिर्फ अत्यधिक मानसिक या शारीरिक तनाव (Stress) के कारण भी एक महीने में दो बार पीरियड्स आ सकते हैं। इसके पीछे हमेशा कोई गंभीर बीमारी होना जरूरी नहीं है। तनाव के दौरान शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जो मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस को प्रभावित करता है। यह हिस्सा पीरियड्स को नियंत्रित करने वाले एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का संतुलन बिगाड़ देता है, जिससे साइकिल छोटी हो जाती है। हालांकि, अगर ऐसा लगातार हो, तो थायराइड या फाइब्रॉएड जैसी अंदरूनी जांच जरूर करानी चाहिए।

सवाल- जो महिलाएं इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स (i-Pill आदि) या रेगुलर बर्थ कंट्रोल पिल्स लेती हैं, उनमें यह समस्या कितनी आम है?

डॉक्टर का जवाब -गर्भनिरोधक गोलियां लेने वाली महिलाओं में महीने में दो बार ब्लीडिंग होना बेहद आम है। विशेषकर इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल (जैसे i-Pill) लेने के 5-7 दिनों के भीतर अचानक हैवी ब्लीडिंग या स्पॉटिंग शुरू हो जाती है (जिसे विड्रॉल ब्लीडिंग कहते हैं), और महिलाएं इसे दूसरा पीरियड समझ लेती हैं। वहीं, रेगुलर बर्थ कंट्रोल पिल्स शुरू करने के शुरुआती 2-3 महीनों में शरीर के हार्मोनल तालमेल बिठाने तक बीच में ब्लीडिंग (ब्रेकथ्रू ब्लीडिंग) होना काफी सामान्य है।

सवाल-ऐसे कौन से लक्षण हैं, जिन्हें देखकर महिला को तुरंत बिना देरी किए डॉक्टर के पास आना चाहिए?

डॉक्टर का जवाब -

  • पेट के निचले हिस्से (Lower Abdomen) में असहनीय और तेज मरोड़ होना।
  • ब्लीडिंग इतनी हैवी हो कि हर 1 से 2 घंटे में पैड पूरी तरह भीग जाए।
  • खून में बड़े-बड़े थक्के (Blood Clots) निकलना।
  • कमजोरी के कारण चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छाना या बेहोश होना।
  • ब्लीडिंग के साथ तेज बुखार या बदबूदार डिस्चार्ज होना (जो इन्फेक्शन का संकेत है)।

सवाल-जब कोई मरीज इस शिकायत के साथ आपके पास आती है, तो समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए आप कौन-से मुख्य टेस्ट करवाने की सलाह देते हैं?

डॉक्टर का जवाब -

  • पेल्विक अल्ट्रासाउंड (USG): इससे गर्भाशय और ओवरी की सटीक स्थिति पता चलती है, जिससे फाइब्रॉएड, सिस्ट या पॉलिप्स का तुरंत पता चल जाता है।
  • हार्मोनल ब्लड टेस्ट: खाली पेट खून का सैंपल लेकर TSH (थायराइड), प्रोलैक्टिन, और FSH/LH के स्तर की जांच की जाती है।
  • सीबीसी (CBC): यह जानने के लिए कि बार-बार ब्लीडिंग से शरीर में हीमोग्लोबिन कितना कम हुआ है (एनीमिया की जांच)।

सवाल-पॉलीमेनोरिया के लिए कौन से इलाज मौजूद है?

डॉक्टर का जवाब -पॉलीमेनोरिया का कोई एक तय इलाज नहीं है। इसका ट्रीटमेंट पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि जांच रिपोर्ट में क्या कारण निकलकर आया है।

  • रिप्लेसमेंट और मेडिकल थेरेपी : लो-डोज ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स में अगर कारण शुद्ध रूप से हार्मोनल गड़बड़ी है, तो 21 दिनों का बर्थ कंट्रोल पिल्स का कोर्स देते हैं। ये गोलियां शरीर के प्राकृतिक चक्र को रीसेट करती हैं और ब्लीडिंग को नियमित बनाती हैं।
  • प्रोजेस्टेरोन थेरेपी: जिन महिलाओं को ओव्यूलेशन नहीं हो रहा होता, उन्हें साइकिल के दूसरे हिस्से में प्रोजेस्टेरोन की गोलियां दी जाती हैं।
  • थायराइड की दवाएं: यदि हाइपोथायरायडिज्म है, तो थायरोक्सिन की छोटी सी गोली रोजाना सुबह खाली पेट लेने से 2-3 महीने के भीतर पीरियड्स अपने आप नॉर्मल ट्रैक पर आ जाते हैं।

सवाल-अगर कोई महिला इस समस्या को लंबे समय तक नजरअंदाज करती है, तो उसके शरीर पर इसके क्या दीर्घकालिक (Long-term) प्रभाव या कॉम्प्लिकेशन्स हो सकते हैं?

डॉक्टर का जवाब -

  • गंभीर एनीमिया (Severe Anemia): लगातार ब्लड लॉस से हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत गिर जाता है, जिससे हर वक्त भयंकर कमजोरी, थकान, सांस फूलना और दिल की धड़कन बढ़ना (Palpitations) जैसी दिक्कतें होने लगती हैं।
  • फर्टिलिटी में समस्या (Infertility): पीरियड साइकिल छोटा होने का मतलब है कि ओव्यूलेशन (अंडा बनने की प्रक्रिया) बाधित हो रही है। अंडा सही से मैच्योर न होने के कारण कंसीव करने में भारी मुश्किल आती है।
  • अंदरूनी बीमारी का बढ़ना: यदि कारण फाइब्रॉएड या एंडोमेट्रियोसिस है, तो इलाज न मिलने पर वे और गंभीर रूप ले सकते हैं।

सवाल- बार-बार पीरियड्स आने से शरीर में कमजोरी और खून की कमी (Anemia) होना लाजमी है। ऐसे में मरीजों को अपनी डाइट में किन चीजों को खास तौर पर शामिल करना चाहिए?

डॉक्टर का जवाब-

  • आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थ: पालक, मेथी, बथुआ, चुकंदर, अनार, सेब, खजूर, और काले चने खाएं। मांसाहारी लोग चिकन या अंडा ले सकते हैं।
  • विटामिन-सी: नींबू, आंवला, संतरा और अमरूद जरूर लें, क्योंकि विटामिन-सी शरीर को आयरन सोखने (Absorb) में मदद करता है।
  • हेल्दी फैट्स: हार्मोन संतुलित करने के लिए भीगे हुए बादाम, अखरोट और अलसी के बीज (Flaxseeds) लें।
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