भारत, Jun 01, 2026

हीट वेव की प्रतीकात्मक तस्वीर (Credit- Gemini AI)
Heat wave warning 2026 : गर्मी किस कदर बढ़ रही है, वो हम हर दिन महसूस कर रहे हैं। पर, आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि आने वाला समय और भी खतरनाक हो सकता है। 'Data For India' (2026) के अनुसार, वर्ष 2024 भारत के 124 साल के रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा। वहीं, 'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती गर्मी के साथ भारत में पिछले चार साल में 15 लाख यूनिट एसी बिके हैं।
गर्मी के आंकड़ों को आसान भाषा में समझने और समाधान के बारे में जानने के लिए 'पत्रिका स्पेशल' के रवि गुप्ता साथ सुनंदा भोला, पर्यावरण और क्लाइमेट एक्सपर्ट (वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडिया और नेशनल ज्योग्राफिक की पूर्व शोधार्थी) ने बातचीत की। आइए, बढ़ते तापमान की गंभीरत को समझते हैं-
'Data For India' (2026) ने अपनी एक रिपोर्ट में भारतीय मौसम विभाग की जानकारी के आधार पर बताया, वर्ष 1901 से 2024 के बीच भारत के औसत तापमान में लगभग 0.9°C की वृद्धि हुई है। पिछला दशक (2015-2025) भारत के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में सबसे गर्म दशक रहा है।
वर्ष 2024 भारत के 124 साल के रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा, जिसमें औसत तापमान 25.7°C दर्ज किया गया। इतना ही नहीं, भारत के 5 सबसे गर्म साल पिछले दो दशकों के भीतर ही रहे हैं, जिनमें 2024, 2016, 2009, 2010 और 2017 शामिल हैं।
वहीं, 'Global Heat Health Information Network' (2025) की रिपोर्ट बताती है कि भारत के पिछले एक दशक (2015-2024) में अब तक के सबसे गर्म 5 वर्षों में से 3 वर्ष दर्ज किए गए हैं।
जैसे- भयंकर गर्मी यह पुराना वीडियो भी देखिए
सुनंदा कहती हैं, हम बढ़ती गर्मी से बचने के लिए पंखा, कूलर से एसी तक का सफर तय कर चुके हैं। फिर भी गर्मी कम नहीं हो रही है। एक दिन ऐसा आएगा कि पंखा-कूलर की तरह एसी भी काम नहीं आएगा। इसका सीधा मतलब है कि क्लाइमेट चेंज तापमान बढ़ा रहा है और अभी भी एसी जैसी चीजों समाधान मानकर बैठे हैं।
वो आगे कहती हैं, जबकि, गर्मी से ऐसा नहीं है कि सिर्फ कुछ समय की परेशानी हो रही है। अगर मौतों का आंकड़ा देखा जाए तो वो भी डराने वाले हैं। 'PNAS 2020' के अनुमान के अनुसार, अगर यह ऐसा ही चलता रहा, तो 'Global Heat Health Information Network' (2025) चेतावनी दिया है कि साल 2100 तक भारत में गर्मी से होने वाली मौतें 25 गुना बढ़कर 15 लाख (1.5 million) प्रति वर्ष तक पहुंच सकती हैं।
वर्ष 2000-2020 (सरकारी आंकड़े): 'Global Heat Health Information Network' (2025) के अनुसार, इन 20 वर्षों के बीच नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने 20,615 मौतें, NDMA ने 17,767 मौतें और IMD ने 10,545 हीटवेव मौतें दर्ज कीं। इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में हीटवेव से सालाना औसतन केवल 1,500 मौतें होती हैं।
'PLOS Medicine 2024' के अध्ययन का हवाला देते हुए 'Global Heat Health Information Network' (2025) यह भी बताता है कि 1990 से 2019 के बीच दुनियाभर में हीटवेव से होने वाली मौतों में से 20.74% मौतें अकेले भारत में हुईं।
अनुमान है कि 5 दिनों तक चलने वाली सिर्फ एक हीटवेव से पूरे भारत में लगभग 30,000 अतिरिक्त मौतें होती हैं। अगर हर गर्मी के मौसम में ऐसी 5 हीटवेव आती हैं, तो यह आंकड़ा सालाना 1,50,000 अतिरिक्त मौतों तक पहुंच जाता है।
'HeatWatch' की रिपोर्ट सरकारी और मीडिया में दर्ज मौतों के आंकड़े पर सवाल उठाती है क्योंकि, "Struck by Heat" के मुताबिक, मार्च से जून 2024 के बीच भारत के 17 राज्यों में हीटस्ट्रोक से 733 मौतें दर्ज की गईं, हालांकि सरकारी स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों में 1 मार्च से 25 जुलाई के बीच 360 मौतें ही बताई गईं।
मौतों के आंकड़े असल से बहुत कम क्यों दिखाए जाते हैं, इस पर कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (UC Berkeley) के शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों अशोक गाडगिल और पीयूष नारंग के लेख में पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स का हवाला देते हुए कहा :
"गर्मी से संबंधित कई मौतों को पहचाना नहीं जाता है या उन्हें गलत तरीके से वर्गीकृत किया जाता है। पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि डॉक्टर अक्सर डेथ सर्टिफिकेट पर केवल मृत्यु के तात्कालिक मेडिकल कारण को दर्ज करते हैं, जबकि वे मुख्य ट्रिगर के रूप में 'गर्मी' की भूमिका को स्वीकार नहीं करते। परिणामस्वरूप, आधिकारिक आंकड़े हीटवेव की वास्तविकता से परे होते हैं।"
सुनंदा कहती हैं, "बढ़ते तापमान और मौतों के आंकड़ों को देखकर हमें असल समाधान पर बात करने की जरूरत है। साथ ही हर किसी को अपने जीवन में इसे उतारने से ही हम इससे बच सकते हैं।
पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाने के लिए एक प्राकृतिक “ग्रीनहाउस प्रभाव” मौजूद है, लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) और जलवाष्प जैसी गैसें पृथ्वी के चारों ओर एक कंबल की तरह काम करती हैं। जब हम बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योगों के लिए कोयला, पेट्रोल, डीजल और प्राकृतिक गैस जलाते हैं, तो बड़ी मात्रा में ये गैसें वातावरण में पहुंचती हैं। इससे यह “कंबल” और मोटा हो जाता है, जो पृथ्वी की गर्मी को अंतरिक्ष में निकलने से रोकता है। मीथेन, जो पशुपालन, धान की खेती, कूड़ा-घर (लैंडफिल) तथा तेल और गैस के रिसाव से निकलती है, कम समय में CO₂ की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पृथ्वी को गर्म करती है। कोयला आधारित बिजली उत्पादन, पेट्रोल-डीजल वाहन, उद्योग, वनों की कटाई, हवाई यात्रा, कृषि, पशुपालन और लैंडफिल में जमा कचरा ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख स्रोत हैं।"
हालांकि बड़े स्तर पर सरकारों और उद्योगों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन हम भी अपनी रोजमर्रा की आदतों से सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
आप इंटनेर पर ये पढ़ लेते हैं कि एक जींस, शर्ट या किसी चीज को बनाने में कितनी अधिक ऊर्जा की खपत होती है। पर, इसके बावजूद भी किसी वस्तु को खरीदने से पहले स्वयं से नहीं पूछते कि वास्तव में आवश्यकता है क्या? क्या पुरानी चीज को मरम्मत करके यूज नहीं किया जा सकता? क्या मैं इसे सेकंड-हैंड खरीद सकता हूं?
हमारे कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा उन वस्तुओं के निर्माण से आता है जिनका उपयोग हम बहुत कम समय के लिए करते हैं। यदि हम सोच-समझकर छोटे-छोटे कदम उठाएं, तो हम अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम कर सकते हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को घटाने में योगदान दे सकते हैं।"
अंत वो कहती हैं, "क्लाइमेट चेंज की लड़ाई के लिए "कंफर्ट जोन" से निकलना होगा तब जाकर धरती को आग का गोला बनने से बचाया जा सकता है। क्योंकि, धरती बचेगी तभी हम यहां जी पाएंगे।"
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Published on: 01 Jun 2026 06:28 pm


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