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वही दाम, कम सामान: किराना दुकानों पर असल में क्या चल रहा है?

जयपुर.शहरी इलाकों की किराना दुकानों से लेकर गांवों की मंडियों तक एक खामोश लेकिन बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यह बदलाव इतना सूक्ष्म है कि आम ग्राहक अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन महीने भर के घरेलू खर्चों का हिसाब लगाते समय उन्हें इसका असर साफ महसूस होता है। छोटे पैकेटों वाले […]

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kirana bazar

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जयपुर.शहरी इलाकों की किराना दुकानों से लेकर गांवों की मंडियों तक एक खामोश लेकिन बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यह बदलाव इतना सूक्ष्म है कि आम ग्राहक अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन महीने भर के घरेलू खर्चों का हिसाब लगाते समय उन्हें इसका असर साफ महसूस होता है। छोटे पैकेटों वाले सामानों की कीमतों और वजन में हो रहे बदलाव ने धीरे-धीरे उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालना शुरू कर दिया है।

₹5 और ₹10 में मिलने वाले बिस्किट जैसे उत्पाद अब बाजार में ₹4.5 और ₹9 एमआरपी वाले पैक्स के रूप में आ रहे हैं। दुकानदार इन्हें पूरे ₹5 और ₹10 में ही बेचते हैं। ग्राहक अक्सर छपी हुई एमआरपी पर ध्यान नहीं देते, जिससे यह चलन बड़े पैमाने पर जारी है। यह अंतर देखने में मामूली लगता है, लेकिन लंबे समय में यह परिवारों के बजट पर बड़ा असर डालता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई परिवार हर महीने 50 छोटे पैकेट खरीदता है, तो प्रति पैकेट 50 पैसे या 1 रुपए का अतिरिक्त खर्च साल भर में सैकड़ों रुपए तक पहुंच जाता है। यह रकम उन परिवारों के लिए खास मायने रखती है, जो रोजाना की जरूरतों के लिए छोटे पैकेटों पर निर्भर रहते हैं। दुकानदारों के लिए यह अतिरिक्त राशि सीधे लाभ में बदल जाती है। सप्लाई चेन से लेकर खुदरा स्तर तक, इस छोटे अंतर का फायदा ग्राहकों तक पहुंचने के बजाय व्यापारियों को मिलता है। यही वजह है कि इसे "खामोश महंगाई" कहा जा रहा है—एक ऐसी महंगाई जो बिना शोर-शराबे के धीरे-धीरे उपभोक्ताओं की जेब खाली करती है।

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खामोश महंगाई और नियमों की अनदेखी

हाल ही में पैकेट वाले खाने-पीने की चीजों पर जीएसटी में किए गए बदलावों का उद्देश्य ग्राहकों को राहत देना था। सरकार चाहती थी कि टैक्स में कटौती का सीधा फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचे। लेकिन बाजार की स्थिति बताती है कि यह फायदा पूरी तरह ग्राहकों तक नहीं पहुंच रहा। ग्राहक उसी कीमत पर पहले से कम वजन का सामान खरीद रहे हैं। यह स्थिति खासकर अर्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों में गंभीर है, जहां एमआरपी नियमों की जानकारी कम है और उनका पालन भी ढीला है। छपी हुई एमआरपी से ज्यादा दाम पर सामान बेचना गैर-कानूनी है, इसके बावजूद यह कई जगहों पर बिना रोक-टोक जारी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और प्रशासनिक सख्ती का अभाव इस समस्या को और बढ़ा देता है। लोग अक्सर दुकानदारों से बहस नहीं करते और जो कीमत मांगी जाती है, वही चुकाते हैं। नतीजा यह होता है कि टैक्स सुधारों का लाभ जनता तक नहीं पहुंच पाता और ग्राहकों का भरोसा धीरे-धीरे कम होता जाता है।

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ग्राहकों पर असर

इस खामोश महंगाई का असर सबसे ज्यादा उन परिवारों पर पड़ता है जिनकी आय सीमित है। छोटे पैकेट खरीदने वाले ग्राहक अक्सर मजदूर वर्ग, निम्न आय वाले परिवार या ग्रामीण उपभोक्ता होते हैं। उनके लिए हर रुपए की अहमियत होती है। जब वे बार-बार कम वजन वाले पैकेट उसी कीमत पर खरीदते हैं, तो उनका मासिक बजट बिगड़ जाता है।

नीति निर्माताओं की चुनौती

नीति निर्माता धीरे-धीरे रोजमर्रा की चीजों के लिए पारदर्शी और उचित कीमतों को लागू करने पर जोर दे रहे हैं। लेकिन बाजार में होने वाली इस तरह की गड़बड़ी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। सरकार ने जीएसटी सुधारों के जरिए उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की थी, लेकिन यदि दुकानदार और सप्लाई चेन इसका फायदा खुद तक सीमित रखते हैं, तो सुधारों का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इस चुनौती को दूर करने के लिए कानून का सख्ती से पालन करना और ग्राहकों के बीच जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। उपभोक्ताओं को यह समझना होगा कि एमआरपी से अधिक कीमत वसूलना गैर-कानूनी है और इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

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