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Kanpur News: रंग, राष्ट्रभक्ति और परंपरा का संगम: गंगा मेला में उमड़ा जनसैलाब, ऊंट-घोड़ों संग निकला रंगों का कारवां

Kanpur Ganga Mela :कानपुर में सात दिन तक चले होली उत्सव का समापन ऐतिहासिक गंगा मेला के साथ हुआ। ऊंट, घोड़े और ट्रैक्टरों के साथ रंगों का जुलूस निकला। तिरंगा फहराकर शुरुआत हुई और शहर में गंगा-जमुनी तहजीब की शानदार झलक देखने को मिली।

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कानपुर में सात दिनों तक चलने वाले होली उत्सव का मंगलवार को ऐतिहासिक गंगा मेला के साथ भव्य और रंगीन समापन हुआ। सुबह से ही शहर की गलियां गुलाल, अबीर और ढोल-नगाड़ों की गूंज से सराबोर नजर आईं। हुरियारों की टोलियां नाचते-गाते सड़कों पर उतरीं तो पूरा शहर फागुन के उल्लास में डूब गया। हर तरफ रंगों की बारिश और होली के गीतों की गूंज सुनाई देती रही।इस बार गंगा मेला के जुलूस में खास बदलाव भी देखने को मिला। वर्षों पुरानी भैंसा ठेला परंपरा की जगह ट्रैक्टर-ट्रॉलियां, ऊंट और घोड़े शामिल किए गए। करीब छह ऊंट, पांच घोड़े और आठ ट्रैक्टरों के काफिले के साथ निकली टोलियों ने पूरे शहर में उत्साह का माहौल बना दिया। जुलूस जहां-जहां से गुजरा, वहां लोग रंग और गुलाल उड़ाकर होली का जश्न मनाते नजर आए।

तिरंगा फहराकर हुई शुरुआत

गंगा मेला की शुरुआत राष्ट्रभक्ति की परंपरा के साथ हुई। हटिया स्थित रज्जन बाबू पार्क में जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने तिरंगा फहराकर राष्ट्रगान के साथ मेले का शुभारंभ किया। इसके बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृति में बने शिलालेख पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।यह परंपरा 1942 की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाती है, जब करीब 45 क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की पाबंदियों को चुनौती देते हुए होली के दिन तिरंगा फहराया था। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन बाद में जनता के दबाव के चलते उनकी सातवें दिन रिहाई हुई और शहरवासियों ने रंग खेलकर जीत का जश्न मनाया।

गंगा-जमुनी तहजीब की झलक

गंगा मेला की सबसे खास पहचान इसकी सामाजिक एकता है। जब रंगों से सराबोर जुलूस मुस्लिम बहुल इलाकों से गुजरा, तो स्थानीय लोगों ने हुरियारों का गर्मजोशी से स्वागत किया। दोनों समुदायों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर भाईचारे और सौहार्द का संदेश दिया। करीब 85 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा कानपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल पेश करती है।

प्रमुख बाजारों से गुजरा जुलूस

रज्जन बाबू पार्क से शुरू हुआ जुलूस शहर के प्रमुख बाजारों और मार्गों से होकर निकला। यह सूत बाजार, जनरलगंज, मेस्टन रोड, चौक और सर्राफा बाजार से गुजरते हुए आगे बढ़ा। रास्ते भर दुकानदारों और स्थानीय लोगों ने रंग और गुलाल उड़ाकर जुलूस का स्वागत किया। ढोल-नगाड़ों और होली के गीतों की धुन पर लोग झूमते नजर आए।

आजादी की लड़ाई से जुड़ी है परंपरा

गंगा मेला का इतिहास आजादी की लड़ाई से जुड़ा है। 1942 में होली के दिन हटिया के रज्जन बाबू पार्क में क्रांतिकारियों ने तिरंगा फहराया था, जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने अपराध मानते हुए 45 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। इसके विरोध में पूरे शहर में आंदोलन शुरू हो गया और लोगों ने लगातार होली खेल गिरफ्तारी देना शुरू कर दिया था। हालात कुछ इस कदर बन गया कि अंग्रेजों को मजबूर होकर सातवें दिन सभी क्रांतिकारियों को रिहा करना पड़ा। उनकी रिहाई पर हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और अबीर-गुलाल के साथ जश्न मनाया। इसके बाद जुलूस सरसैया घाट पहुंचा, जहां लोगों ने गंगा स्नान किया। तभी से कानपुर में होली के पांच दिन बाद गंगा मेला मनाने की परंपरा चली आ रही है।