Public Transport: मध्य पूर्व संकट के चलते दुनिया में कई स्तरों पर संकट अब साफ दिखने लगा है। भारत के प्रधानमंत्री ने भी आम जनता से अपील करते हुए कहा कि निजी परिवहन की बजाय सार्वजनिक परिवहन का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत के शहर पीएम की अपल को असरदार बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो पाएं हैं? आइए जानते हैं कि देश में अलग-अलग शहरों में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था कितनी पुख्ता है।
Public Transport in India: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने मध्य पूर्व संकट के मद्देनजर देश के लोगों से यह अपील की कि वे एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचें। वर्क फ्रॉम होम, कार पूलिंग, वीआईपी लाव लश्कर में कमी और सार्वजनिक परिवहन से आना-जाना करें। उन्होंने जनता से यह भी अपील की खाना बनाने के तेल में 10 फीसदी की कटौती करें। उनकी इस अपील में देशवासियों से सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल करने के बाद यह जानना जरूरी है कि देश के अलग-अलग शहरों में इस मोर्चों पर क्या हालात हैं?
भारत में 1991 के बाद शहरों की संख्या और उनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ती गई। हालांकि जनसंख्या बढ़ने के साथ सड़कों पर सार्वजनिक वाहनों में आनुपातिक तौर पर बढ़ोतरी नहीं हुई। सार्वजनिक वाहन की संख्या कम होने के चलते उनमें धक्कामुक्की के चलते लोगों निजी वाहनों से दफ्तर और दूसरी काम की जगह जाना पसंद करने लगे। निजी वाहन कुछ प्रतिशत लोगों की पसंद हो सकती है, लेकिन ज्यादातर लोग विकल्पहीनता की हालत में इनसे यात्रा करते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे, अहमदाबाद और जयपुर जैसे महानगरों या बड़े नगरों में निजी वाहन जीवनरेखा बन चुके हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे, अहमदाबाद और जयपुर जैसे महानगरों में प्रतिदिन मेट्रो और बसों में सफर करने वाली लाखों आबादी भी यह मानती है कि यहां एक गाड़ी तो इमरजेंसी के लिए जरूर चाहिए।
हालांकि पिछले एक दशक में भारत ने शहरी क्षेत्रों में परिवहन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू, हैदराबाद, जयपुर और पटना में मेट्रो रेल नेटवर्क का विस्तार हुआ। आज भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश बन चुका है। मेट्रो की सेवाओं में विस्तार का मकसद सिर्फ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना भर नहीं है, बल्कि ट्रैफिक जाम कम करना, प्रदूषण नियंत्रित करना, ऊर्जा की बचत करना और आर्थिक उत्पादकता बढ़ाना भी है। भारत के अधिकांश शहर अभी भी भीड़भाड़, अव्यवस्थित बस सेवाओं, अपर्याप्त कनेक्टिविटी और यात्री सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
देश में सार्वजनिक परिवहन के आधुनिकीकरण की सबसे बड़ी पहचान मेट्रो रेल परियोजनाएं हैं। दिल्ली और एनसीआर में मेट्रो रेलवे के तेजी से विस्तार और आम लोगों में बढ़ती लोकप्रियता के चलते सार्वजनिक परिवहन क्षेत्र में इसे सफल बनाया। मेट्रो रेल देश की सबसे बड़ा नेटवर्क बन चुका है। वर्ष 2025-26 तक दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में लगभग 416 किलोमीटर का लंबा नेटवर्क और 300 से अधिक स्टेशन कार्यरत हैं। दिल्ली मेट्रो ने 2025 में लगभग 235 करोड़ यात्रियों को सेवा दी तथा औसत दैनिक यात्री संख्या 64 लाख से अधिक रही।
दिल्ली के अलावा मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे, पटना, नागपुर, अहमदाबाद, कोच्चि, जयपुर, लखनऊ और कानपुर में भी मेट्रो सेवाएं संचालित हो रही हैं। वर्ष 2025 के अंत तक भारत में लगभग 1000 किलोमीटर से अधिक मेट्रो लाइन का विस्तार हो गया और अभी सैकड़ों किलोमीटर नए नेटवर्क निर्माण की अवस्था से गुजर रहे हैं।
देश के अलग-अलग शहर में मेट्रो परियोजनाओं ने शहरों में यात्रा के समय को कम किया है। दिल्ली और एनसीआर इसका सबसे सटीक उदाहरण हे। दिल्ली में पहले रोहिणी से गुड़गांव जाने में कई घंटे लग जाते थे, लेकिन मेट्रो ने समय कम और सुनिश्चित किया है। सड़क की एक घंटे की यात्रा मेट्रो से 25-30 मिनट में पूरी हो जाती है। बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे आईटी शहरों में मेट्रो ने कार्यालय आने-जाने वाले कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है।
हालांकि मेट्रो परियोजनाओं को लागू करने में बहुत अधिक लागत आती है। यही वजह है कि कई छोटे शहरों को लेकर यह बहस जारी है कि पहले वहां बस सेवाओं को मजबूत किया जाना चाहिए या मेट्रो? भोपाल, इंदौर और पटना जैसे शहरों में नागरिकों के बीच इस विषय पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए मेट्रो का समर्थन करते हैं, जबकि कुछ लोग निर्माण के कारण बढ़ते ट्रैफिक और लागत पर प्रश्न उठाते हैं।
भारत के अधिकांश शहरों खासकर महानगरों में बसें सार्वजनिक परिवहन का सबसे सस्ता साधन हैं। दिल्ली परिवहन निगम (DTC), मुंबई (BEST), बेंगलुरु (BMTC), चेन्नई (MTC) और अन्य राज्य परिवहन निगम प्रतिदिन लाखों यात्रियों को सेवा प्रदान करते हैं। बस सेवाओं की सबसे बड़ी खासियत उनका किफायती होना और शहर के कोने-कोने तक उनकी पहुंच होना है। राज्य सरकारें सार्वजनिक परिवहन के प्रति लोगों का उत्साह बढ़ाने के लिए बसों में नि:शुल्क और रियायती बस सेवाएं भी चला रही हैं। सार्वजनिक परिवहनों को आधुनिक सुविधाओं जीपीएस, सीसीटीवी, डिजिटल टिकटिंग से लैस करने के साथ न्यूनतम प्रदूषण वाली बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
शहरी समाजिक योजना के विशेषज्ञ और इंस्टिट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टेनेबिलिटी,दिल्ली के निदेशक राजेंद्र रवि ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि भारत इस समय वैश्विक युद्ध और तेल संकट के कारण बढ़ती ईंधन कीमतों की चुनौती का सामना कर रहा है। पेट्रोल और डीज़ल महंगे होने से आम नागरिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ा है। ऐसे में सरकार द्वारा निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन अपनाने की अपील उचित है, लेकिन वास्तविक समस्या यह है कि देश के अधिकांश शहरों में सार्वजनिक परिवहन अब भी कमजोर और अपर्याप्त है।
उन्होंने कहा कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों में हजारों बसें चलती हैं, फिर भी भीड़ और लंबा इंतजार आम बात है। दिल्ली में लगभग 7,000, बेंगलुरु में 7,100, मुंबई में 2,700 और कोलकाता में करीब 4,000 बसें संचालित होती हैं। अहमदाबाद में लगभग 1,000, चंडीगढ़ में 640, जयपुर में करीब 300, गुवाहाटी में 600–700 तथा रांची में सीमित सिटी बसें ही उपलब्ध हैं। भारत में औसतन प्रति 1,000 लोगों पर केवल 1–1.5 बसें हैं, जबकि विकसित देशों में यह संख्या कई गुना अधिक है।
वह मेट्रो को लेकर कहते हैं कि मेट्रो परियोजनाओं ने कुछ राहत दी है, लेकिन छोटे शहरों में उनकी स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। जयपुर मेट्रो लगभग 12 किलोमीटर लंबे नेटवर्क के बावजूद अपेक्षित यात्रियों को आकर्षित नहीं कर पाई, क्योंकि शहर में मजबूत फीडर बस सेवा का अभाव है। कई शहरों में मेट्रो स्टेशन तक पहुँचने के लिए लोगों को ऑटो या निजी वाहनों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि केवल मेट्रो बनाना पर्याप्त नहीं है।
राजेंद्र रवि सार्वजनिक परिवहन की अन्य समस्याओं को गिनाते हुए कहते हैं, 'छोटे शहरों में बस स्टॉप, डिजिटल टिकटिंग, सुरक्षित सड़कें और नियमित समय-सारिणी जैसी सुविधाओं की भी कमी है। लोग मुख्यतः ऑटो, टेम्पो और निजी दोपहिया वाहनों पर निर्भर हैं। दुनिया के कई देशों ने मुफ्त या सस्ती सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था लागू की है, जबकि भारत में अब भी मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क का अभाव है। यदि सरकार वास्तव में निजी वाहनों का उपयोग कम करना चाहती है, तो इलेक्ट्रिक बसों का विस्तार, छोटे शहरों में नगर बस सेवाओं का विकास और मेट्रो–बस नेटवर्क का बेहतर समन्वय आवश्यक होगा।'