भारत, May 29, 2026

एलियंस के लिए भेजा गया पृथ्वी का संदेश (photo,AI)
NASA Voyager Mission: मानव इतिहास का वो इकलौता और सबसे अनोखा मिशन है, जो इंसानों की बनाई किसी भी चीज के मुकाबले हमारे ग्रह से सबसे दूर जा चुका है। यह ब्रह्मांड के उस अनजान अंधेरे में तैर रहा है, जहां सूरज की किरणें भी बेहद कमजोर पड़ जाती हैं। 1977 को लॉन्च हुआ यह यान आज भी धरती से अरबों किलोमीटर दूर सफर कर रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर भविष्य में कोई एलियन सभ्यता इसे खोजेगी, तो उन्हें पता चलेगा कि पृथ्वी पर रहने वाले इंसान कैसे थे।
1970 के दशक में NASA के वैज्ञानिक सिर्फ ग्रहों की तस्वीरें लेना नहीं चाहते थे, बल्कि वे ब्रह्मांड में इंसानों की मौजूदगी का संदेश भी भेजना चाहते थे, ताकि भविष्य में कोई दूसरी सभ्यता इसे समझ सके। इसी सोच के साथ वॉयजर मिशन (Voyager Mission) की शुरुआत हुई। इसके तहत नासा ने दो स्पेसक्राफ्ट बनाए वॉयजर 1 और वॉयजर 2। वॉयजर 2 को 20 अगस्त 1977 को लॉन्च किया गया, और इसके कुछ ही दिनों बाद 5 सितंबर 1977 को वॉयजर 1 को अमेरिका के फ्लोरिडा से एक ताकतवर रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया। उस समय किसी ने अंदाजा भी नहीं लगाया था कि यह मिशन आगे चलकर इतिहास का सबसे लंबा और सबसे कामयाब स्पेस मिशन बन जाएगा।
वॉयजर 1 पर तांबे से बनी एक खास ग्रामोफोन डिस्क लगाई गई, जिस पर सोने की परत चढ़ी हुई थी। इसे वॉयजर गोल्डन रिकॉर्ड (Voyager Golden Record) नाम दिया गया। इस रिकॉर्ड को इस तरह तैयार किया गया है कि यह अंतरिक्ष की भयंकर ठंड और खतरनाक रेडिएशन में भी अरबों सालों तक पूरी तरह सुरक्षित रहे। इसके कवर पर सुइयों की मदद से सांकेतिक भाषा में कुछ नक्शे और निर्देश बनाए गए हैं, ताकि ब्रह्मांड में अगर किसी समझदार सभ्यता या एलियंस को यह मिले, तो वे समझ सकें कि इसे बजाना कैसे है और इसे भेजने वाले इंसानों का घर हमारी पृथ्वी अंतरिक्ष में कहां पर है। वैज्ञानिक कार्ल सेगन (Carl Sagan) की देखरेख में एक खास टीम बनाई गई थी।
वॉयजर 1 का मुख्य काम हमारे सौरमंडल के दो बड़े ग्रहों बृहस्पति (Jupiter) और शनि (Saturn) के पास जाकर उनकी तस्वीरें लेना और वहां से जुड़ी जरूरी जानकारियां जुटाना था। लेकिन समय के साथ इसका यह मिशन और भी बड़ा हो गया। इस स्पेसक्राफ्ट ने बृहस्पति के चंद्रमा की अद्भुत तस्वीरें भेजीं और शनि के चारों तरफ बने छल्लों (Rings) का गहराई से अध्ययन किया। इसने वैज्ञानिकों को कई बड़े रहस्य बताए, जैसे बृहस्पति पर चलने वाले विशाल तूफान बहुत खतरनाक हैं और शनि के आसपास का माहौल हमारी धरती से बहुत अलग है।
वॉयजर 1 के रिकॉर्ड में दुनिया भर से चुने गए 27 बेहतरीन गानों को मिलाकर करीब 90 मिनट का संगीत शामिल किया गया था, जिसमें हमारे भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक बेहद खूबसूरत प्रस्तुति को जगह मिली। देश की मशहूर शास्त्रीय गायिका सूरश्री केसरबाई केरकर की आवाज में गाया गया राग भैरवी का एक बेहद सुरीला गीत 'जात कहां हो अकेले गोरी' इस सुनहरे रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। यह गाना करीब साढ़े तीन मिनट का है। वॉयजर 1 हमारी धरती से अरबों किलोमीटर दूर जा चुका है। अंतरिक्ष के उस अनजान, ठंडे और खौफनाक सन्नाटे में भारत की यह सुरीली तान लगातार तैर रही है।
इस सुनहरे रिकॉर्ड में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग कोनों की संस्कृतियों को भी समेटा गया था। जैसे अमेरिका के मशहूर रॉक एंड रोल सिंगर चक बेरी का गाना Johnny B. Goode और लुईस आर्मस्ट्रांग का जैज संगीत। इनके साथ ही जर्मनी के महान संगीतकार जोहान सेबेस्टियन बाक और बीथोवेन की अमर धुनें, चीन का सदियों पुराना पारंपरिक संगीत Flowing Streams और जापान का बांसुरी से बजाया गया पारंपरिक संगीत भी इसका हिस्सा बने। पृथ्वी की पूरी झलक दिखाने के लिए इसमें ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का संगीत, पेरू के पहाड़ों के लोकगीत, सेनेगल के ड्रम की थाप और अजरबैजान के लोक संगीत को भी जगह दी गई, ताकि ब्रह्मांड में इंसानी सभ्यता की हर रंगत को पेश किया जा सके।
एलियंस को बधाई देने और उनसे संपर्क करने के लिए इस रिकॉर्ड में दुनिया की 55 सबसे प्रमुख और प्राचीन भाषाओं में वॉयस मैसेज रिकॉर्ड किए गए।NASA ने इसमें हिंदी, बंगाली, गुजराती, मराठी, कन्नड़ और उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं को भी शामिल किया। हिंदी में रिकॉर्ड संदेश था 'धरती के रहने वालों की ओर से नमस्कार'। इसके अलावा अंग्रेजी, चीनी, अरबी, रूसी, जापानी, फ्रेंच, स्पेनिश और कई दूसरी भाषाओं में भी वॉयस मैसेज रिकॉर्ड किए गए हैं।
गानों के अलावा इस रिकॉर्ड में पृथ्वी की रोजमर्रा की 19 खास आवाजों को भी शामिल किया गया है। इनमें समुद्र की लहरों का शोर, बादलों की गड़गड़ाहट, बारिश की बूंदें, चिड़ियों की चहचहाहट, ट्रेन की सीटी, कुत्ते के भौंकने की आवाज और एक मां द्वारा अपने रोते हुए बच्चे को चुप कराने की दुलार भरी आवाज शामिल है। इंसानी वजूद को समझाने के लिए इसमें एक इंसान के दिल की धड़कन और उसके दिमाग की तरंगों को भी रिकॉर्ड करके भेजा गया है। साथ ही, डिजिटल रूप में 115 तस्वीरें भी डाली गई हैं। जिनमें भारत का ताजमहल, मिस्र के पिरामिड, इंसान का DNA और हमारे खाने-पीने के तौर-तरीके दिखाए गए हैं, ताकि हमारी पूरी दुनिया की एक सजीव झलक वहां पहुंच सके।
नासा ने 1970 के दशक में इस मिशन को शुरू किया, तब तकनीक सस्ती नहीं थी। वॉयजर 1 और वॉयजर 2 को बनाने, उनमें उपकरण लगाने और उन्हें लॉन्च करने का शुरुआती खर्च करीब 86.5 करोड़ डॉलर (865 मिलियन डॉलर) था। कई सालों में इसके रख-रखाव और गहरे अंतरिक्ष से आने वाले सिग्नलों को समझने के खर्च को जोड़ लिया जाए, तो यह पूरा मिशन अब तक 1 अरब डॉलर (1 बिलियन डॉलर) से भी आगे निकल चुका है।
वॉयजर 1 ने साल 2012 में ही हमारे सौरमंडल की आखिरी सीमा को पार कर लिया था और वह गहरे अंतरिक्ष में दाखिल हो गया था। ऐसा करने वाला यह पहला मानव निर्मित यान बना। इस समय में यह यान पृथ्वी से करीब 24.4 अरब किलोमीटर दूर जा चुका है और 61,146 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से लगातार आगे बढ़ रहा है। यह दूरी इतनी ज्यादा है कि इससे संपर्क करने में ही करीब 2 दिन का समय लग जाता है। नासा के वैज्ञानिक प्रकाश की रफ्तार से भी कोई रेडियो सिग्नल भेजते हैं, तो उसे वॉयजर 1 तक पहुंचने में 22.5 घंटे लगते हैं और फिर वहां से जवाब आने में भी इतना ही समय लगता है। वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष यान तक एक संदेश भेजने और उसका जवाब मिलने में करीब 45 घंटे का लंबा इंतजार करना पड़ता है।
वॉयजर 1 को चलाने के लिए कोई सोलर पैनल नहीं लगा है, क्योंकि गहरे अंतरिक्ष में सूरज की रोशनी न के बराबर पहुंचती है। इसे जिंदा रखने के लिए इसमें प्लूटोनियम 238 से चलने वाला एक छोटा परमाणु जनरेटर लगाया गया था, लेकिन समय के साथ इसकी ताकत लगातार कम होती जा रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल 2025 से 2030 के बीच वॉयजर 1 के पास इतनी बिजली भी नहीं बचेगी कि वह अपने किसी वैज्ञानिक उपकरण को चालू रख सके या पृथ्वी पर कोई संदेश भेज सके। इसके बाद धीरे-धीरे इसके सारे कैमरे और ट्रांसमीटर हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।
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Updated on: 29 May 2026 01:18 pm

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