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नारायणपुर, May 29, 2026

टसर रेशम से चमकी नारायणपुर की तकदीर, ग्रामीणों को मिला रोजगार का नया रास्ता

Chhattisgarh Silk Farming: नारायणपुर में टसर रेशम योजना ग्रामीणों के लिए रोजगार और अतिरिक्त आय का मजबूत माध्यम बन रही है। आदिवासी परिवारों, खासकर महिलाओं को स्थानीय स्तर पर काम मिलने से आर्थिक स्थिति में सुधार आया है और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला है।

Tasar Silk Scheme

Tasar Silk Scheme(photo-patrika)

Tasar Silk Scheme: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में रेशम विभाग की टसर रेशम विकास एवं विस्तार योजना ग्रामीणों के लिए रोजगार और आय का मजबूत जरिया बन रही है। आदिवासी बहुल क्षेत्र के कई परिवार इस योजना से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने से ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। खासतौर पर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने इस योजना को सामाजिक बदलाव का भी माध्यम बना दिया है। टसर कृमिपालन से ग्रामीणों को अतिरिक्त आय मिल रही है, जिससे पलायन कम होने के साथ गांवों में आजीविका के नए अवसर भी बढ़ रहे हैं।

Tasar Silk Scheme: तीन फसल से बढ़ रही अतिरिक्त आय

रेशम विभाग से जुड़े हितग्राही वर्ष में तीन फसल तक टसर कृमिपालन का कार्य कर रहे हैं। इससे उन्हें खेती के साथ अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर मिल रहा है। विभाग द्वारा पौधारोपित क्षेत्रों में समूह आधारित तरीके से कृमिपालन कराया जाता है, जिससे ग्रामीणों को सामूहिक रूप से रोजगार और तकनीकी सहयोग प्राप्त हो रहा है।

हितग्राहियों को विभाग की ओर से मात्र 2 रुपये की अनुदान दर पर टसर कृमि अंडे उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके बाद करीब 45 से 50 दिनों तक कृमिपालन कर कोसाफल तैयार किया जाता है। यह प्रक्रिया ग्रामीणों के लिए कम लागत और अधिक लाभ वाला व्यवसाय साबित हो रही है।

ककून बैंक बना आय का भरोसेमंद केंद्र

टसर उत्पादन के बाद हितग्राहियों को बाजार की परेशानी न हो, इसके लिए विभाग द्वारा ककून बैंक की स्थापना की गई है। यहां ग्रामीण अपने उत्पादित कोसाफल को शासन द्वारा निर्धारित दर पर बेचते हैं। इससे उन्हें उचित मूल्य मिलने के साथ आय की गारंटी भी मिल रही है। विशेष बात यह है कि कोसाफल विक्रय से मिलने वाली राशि सीधे हितग्राहियों के बैंक खातों में जमा की जाती है। इससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी हुई है और ग्रामीणों का भरोसा भी बढ़ा है।

15 हितग्राहियों ने कमाए लाखों रुपये

वर्तमान वित्तीय वर्ष 2025-26 में टसर केंद्र ग्राम डूमरतराई, जिला नारायणपुर में कुल 15 स्थानीय हितग्राहियों ने कृमिपालन कार्य किया। इनमें 10 महिलाएं और 5 पुरुष शामिल रहे। इन सभी हितग्राहियों ने मिलकर कुल 2 लाख 11 हजार 167 नग कोसाफल का उत्पादन किया।

कोसाफल विक्रय से कुल 9 लाख 34 हजार 927 रुपये की आय प्राप्त हुई। इस तरह प्रत्येक हितग्राही को औसतन 62 हजार 328 रुपये की अतिरिक्त वार्षिक आय मिली। ग्रामीणों के लिए यह आय आजीविका सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

महिलाओं की बढ़ी भागीदारी, आत्मनिर्भरता को मिला बल

इस योजना का सबसे सकारात्मक पहलू महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। बड़ी संख्या में महिलाएं कृमिपालन और विभागीय गतिविधियों से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। इससे न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि महिलाओं का आत्मविश्वास और सामाजिक भागीदारी भी बढ़ रही है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि टसर रेशम योजना ने उन्हें गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराया है, जिससे बाहर पलायन की जरूरत कम हुई है।

वर्षभर मिल रहा रोजगार

रेशम विभाग की इस योजना से ग्रामीणों को केवल कृमिपालन तक सीमित लाभ नहीं मिल रहा, बल्कि पौधों की निराई-गुड़ाई, देखरेख और अन्य विभागीय कार्यों में भी सालभर रोजगार उपलब्ध हो रहा है। इससे ग्रामीणों को लगातार आय का स्रोत मिल रहा है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।

आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रहा नारायणपुर

टसर रेशम योजना नारायणपुर के ग्रामीणों के लिए आत्मनिर्भरता और आजीविका संवर्धन का प्रभावी माध्यम बनकर उभर रही है। कम लागत, स्थानीय रोजगार, महिलाओं की भागीदारी और सुनिश्चित बाजार जैसी सुविधाओं ने इस योजना को ग्रामीण विकास का सफल मॉडल बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस योजना का विस्तार अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में भी किया जाए तो यह आदिवासी और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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