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भारत, May 15, 2026

US China Relationship : रिचर्ड निक्सन से डोनाल्ड ट्रंप तक, क्यों अमेरिका को चाहिए चीन का साथ?

US China : अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन शीत युद्ध के दौरान 1972 में अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए चीन पहुंच गए थे। निक्सन के चीन पहुंचते ही दुनिया चौंक उठी थी। इस समय डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा को भी दुनिया हैरतभरी निगाहों से देख रही है। आइए अमेरिका के दोनों राष्ट्रपतियों की चीन यात्रा के मकसद को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

Richard Nixon to Donald Trump US China Relations Nixon China Visit 1972

निक्सन से डोनाल्ड तक ट्रंप चीन की यात्रा का मकसद (Ians and AI

US China Relationship: चीन में 1949 में साम्यवादी क्रांति हुई और माओ त्से-तुंग (Mao Zedong) के नेतृत्व में सरकार बनी। वहीं दूसरी ओर अमेरिका में शुरू से पूंजीवादी सरकार रही है। यही वजह है कि अमेरिका और चीन जब भी नजदीक आने लगते हैं, तब पूरी दुनिया की नजर उनपर आकर टिक जाती है। इसकी एक और बड़ी वजह यह है कि दोनों ही देश विश्व की सबसे बड़ी महाशक्तियां हैं।

पिछले 7-8 दशकों में विश्व राजनीति में अमेरिका और चीन के संबंध सबसे निर्णायक संबंधों में गिने जाते हैं। असल में दोनों एक दूसरे के कट्टर विरोधी देश रहे हैं और ये दोनों ही देश समय-समय पर संवाद, व्यापार, रणनीति और शक्ति-संतुलन के कारण एक-दूसरे के करीब आते रहे हैं। इन दोनों देशों के बीच संबंधों की परिभाषा 1972 में तब बदल गई जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) ने चीन की ऐतिहासिक यात्रा की। इस यात्रा ने पूरी दुनिया की भू-राजनीति ही बदलकर रख दी।

अब पांच दशकों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) का चीन पहुंचना भी वैश्विक राजनीति, ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध, व्यापार और सामरिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आइए विस्तार से समझते हैं कि निक्सन चीन क्यों गए थे, और अब ट्रंप क्यों पहुंचे हैं? दोनों की यात्राओं में क्या समानताएं और क्या अंतर हैं?

निक्सन ने चीन पहुंचकर दुनिया को चौंका दिया

दरअसल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो खेमों में बंट चुकी थी। पूंजीवादी गुट देशों का नेता अमेरिका था और साम्यवादी गुट खेमे का नेतृत्व सोवियत रूस कर रहा था। चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद के नेतृत्व में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई। जाहिर सी बात है कि अमेरिका और चीन के बीच संबंध लगभग समाप्त हो गए। अमेरिका ने उस वक्त चीन को मान्यता नहीं दी और ताइवान को 'वास्तविक चीन' मानता और बताता रहा। कोरियाई युद्ध और वियतनाम युद्ध के दौरान दोनों देशों के संबंध और खराब हो गए।

अमेरिका और चीन दोनों को चाहिए एक-दूसरे का साथ

हालांकि 1960 के दशक के अंत तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव आया। चीन और सोवियत संघ के बीच मतभेद बढ़ गए। चीन उस समय तक दुनिया के ताकतवर देशों में शामिल नहीं हो पाया था। वहां अर्थव्यवस्था से लेकर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चीजें बदल रही थीं। ऐसे में चीन को सोवियत संघ से खतरा महसूस होने लगा था। दूसरी ओर अमेरिका, वियतनाम के साथ युद्ध में बुरी तरह से फंस चुका था और उसे एशिया में नई रणनीति की जरूरत थी। ऐसे नाजुक समय में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सर और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंगर (Henry Kissinger) के साथ मिलकर चीन के साथ संबंध सुधारने की योजना बनाई।

पहले हेनरी फिर निक्सन पहुंचे थे चीन

इसी योजना के तहत वर्ष 1971 में पहले हेनरी किसिंजर ने गुप्त रूप से चीन की यात्रा की और उसके बाद अगले ही साल के फरवरी महीने में निक्सन खुद चीन पहुंच गए। यह यात्रा शीत युद्ध के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाओं में गिनी जाती है। निक्सन की चीन यात्रा का मकसद सोवियत संघ की ताकत को संतुलित करना था। वह यह जानते थे कि यदि अमेरिका और चीन करीब आते हैं, तो सोवियत संघ पर दबाव बढ़ेगा। इसे 'ट्रायएंगुलर डिप्लोमेसी'। अमेरिका ने चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाकर सोवियत संघ को स्पष्ट संदेश दिया कि वह अकेला नहीं है। अमेरिका को निक्सन की इस कूटनीतिक पहल से फायदा मिला। शीत युद्ध में अमेरिका की स्थिति मजबूत हुई।

US को वियतनाम युद्ध के चलते झेलना पड़ रहा था नुकसान

अमेरिका उस समय वियतनाम युद्ध में भारी नुकसान झेल रहा था। चीन का प्रभाव उत्तरी वियतनाम पर था। अमेरिका चाहता था कि चीन मध्यस्थ की भूमिका निभाए और युद्ध समाप्त करने में सहयोग करे। यही वजह है कि अमेरिका, चीन को वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में शामिल करना चाहता था। निक्सन समझते थे कि दुनिया की एक-चौथाई आबादी वाले देश को लंबे समय तक अलग-थलग नहीं रखा जा सकता। निक्सन ने उस दौरान अपने लेखों में भी यह लिखा कि चीन को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में शामिल करना जरूरी है।

निक्सन ने पहचान ली थी चीन की ताकत

अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन को यह पता था कि चीन फिलहाल आर्थिक रूप से कमजोर है, लेकिन भविष्य में वह सोने के अंडे देने वाली मुर्गी साबित हो सकती है। चीन एक बहुत बड़ी आबादी वाला देश है और आर्थिक शक्ति के तौर पर उभर रहा है। अमेरिका के लिए चीन भविष्य में एक विशाल बाजार की संभावना वाला देश बन सकता है। रिचर्ड
निक्सन और माओ के बीच हुई मुलाकात के बाद 'शंघाई कम्युनिके' जारी हुआ। इसमें दोनों देशों ने मतभेदों के बावजूद संबंध सुधारने पर सहमति जताई।

निक्सन की यात्रा के क्या मिले परिणाम

  • अमेरिका और चीन के बीच राजनयिक संपर्क बढ़े।
  • 1979 में दोनों देशों के औपचारिक संबंध स्थापित हुए।
  • चीन को वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रवेश मिला।
  • चीन बाद में विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य बना।
  • अमेरिका और चीन के बीच व्यापार में तेजी आई।

अब डोनाल्ड ट्रंप चीन क्यों पहुंचे?

1972 से लेकर अब तक यानी करीब साढ़े पांच दशक के बाद अब दुनिया की राजनीति नया आकार ले चुकी है। निक्सन के दौर में अमेरिका और चीन सहयोग की शुरुआत कर रहे थे, जबकि आज दोनों देशों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा है। हालांकि इसके बावजूद डोनाल्ड ट्रंप का चीन की यात्रा पर जाना यह दिखाता है कि प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद आवश्यक है।

ताइवान से लेकर ईरान के मुद्दे पर बातचीत की संभावना

ट्रंप ने पिछले साल से लगातार चीन पर टैरिफ ज्यादा लगाने की बात पर जोर दिया। इसके साथ ही अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, ताइवान और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तनाव बढ़ता गया। हालांकि, अन सबके बावजूद दोनों देशों ने उच्च-स्तरीय वार्ता जारी रखी। मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) के बीच व्यापार, निवेश, दुर्लभ खनिज, ताइवान और वैश्विक संघर्षों खासकर ईरान के मसले पर बातचीत हुई।

चीन की इस यात्रा से क्या हासिल करना चाहते हैं ट्रंप?

ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में चीन पर भारी टैरिफ लगाए थे। उनका तब आरोप लगाते हुए कहा था कि चीन व्यापार के लिए अनुचित नीति अपनाता है और वह अमेरिकी उद्योगों को नुकसान पहुंचाता है। इस वजह से अमेरिका और चीन के बीच लगातार तनाव बना रहा। वर्ष 2025-26 में भी दोनों देशों ने एक-दूसरे पर शुल्क लगाए, जिससे चलते वैश्विक बाजार प्रभावित हुए। अमेरिका की टांग ईरान युद्ध में बुरी तरह से फंस चुकी है, इसलिए उनकी मौजूदा यात्रा का मकसद दोनों देशों के बीच बढ़ तापमान को काम करना ही नहीं बल्कि व्यापारिक समझौते को आगे बढ़ाना और अमेरिकी निर्यात को बढ़ाना माना जा रहा है। दोनों के बीच बोइंग विमान, कृषि उत्पाद और ऊर्जा निर्यात जैसे मुद्दों का उल्लेख हुआ है।

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