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भारत, May 28, 2026

Donald Trump Vs Iran : अमेरिका और ईरान जिद पर अड़े, 2008 और 2020 की मंदी से भी ज्यादा बिगड़ सकते हैं हालात

Donald Trump Vs Iran: मध्य पूर्व संकट से बाहर निकलने का रास्ता इतना आसान नजर नहीं आ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी शर्तों के साथ युद्ध में खड़े और अपनी-अपनी जिद मनवाने के लिए अड़े हुए हैं। अगर संघर्ष के हालात लंबे समय तक बने रहे तो दुनिया के ज्यादातर मुल्कों की अर्थव्यवस्था की हालत पतली हो सकती है। यह संभव है कि पिछले दो वैश्विक मंदी के मुकाबले इस बार दुनिया की हालात कहीं ज्यादा खराब हो सकती है। आइए जानते हैं क्यों?

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दुनिया की आर्थिक रफ्तार कम होने के साथ महंगाई भी बढ़ रही है। (PC; AI )

Donald Trump Vs Iran : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार ईरान के साथ संवाद और समझौते (US Dialogue With Iran) के लिए बातचीत का दरवाजा खुला रखने की बात कह रहे हैं। लेकिन वह लगातार यह भी कह रहे हैं कि समझौता सिर्फ ईरान की शर्तों पर नहीं होगा। एक ओर पूरी दुनिया के ऊर्जा संकट (Energy Crisis) के चलते पसीने छूट रहे हैं। ऐसे विकट परिस्थितियों में दुनिया के ज्यादातर मुल्क अमेरिका और ईरान से यह उम्मीद लगा रहे हैं कि दोनों के बीच समझौता हो जाए तो तेल, गैस और महंगाई (Inflation) की किल्लतों से निजात मिले। दोनों ही देश अपनी-अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। एक बार फिर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तीन महीने से चल रहे अलोकप्रिय युद्ध को समाप्त करने और गैस की बढ़ती कीमतों को कम करने के लिए उन पर किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव नहीं है।

मुझे मिडटर्म चुनावों की परवाह नहीं: ट्रंप

यह भी कयास लगाया जा रहा है कि अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनाव (US Mid Term Election) और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) बंद किए जाने से दुनिया में बढ़ रही तेल और गैस की कीमतों के चलते ट्रंप नरमी बरतेंगे और ईरान से समझौता कर ले सकते हैं। हालांकि ट्रंप ने इन कयासों को खारिज करते हुए कहा, 'मुझे मिडटर्म चुनावों की परवाह नहीं है। कल क्या हुआ आप देख लीजिए'

दरअसल वह यह टिप्पणी टेक्सास में मंगलवार की रात ट्रंप समर्थित उम्मीदवार केन पैक्सटन की जीत को लेकर कर रहे थे। केन पैक्सटन ने रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ नेता सीनेटर जॉन ट्रंप यह बताना चाह रहे थे कि उनके ईरान को लेकर अड़ियल रवैये से उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है।

शांति समझौते पर ईरान की क्या है शर्त?

वहीं दूसरी ओर ईरान का कहना है कि किसी भी शांति समझौते में लेबनान युद्ध (Lebanon War) को भी शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन अमेरिका और इज़राइल इसे अलग मुद्दा मानते हैं। यही वजह है कि इज़राइली सेना लेबनान में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर लगातार हमले कर रही है। इजराइल ने बुधवार को पिछले 24 घंटों में लेबनान में हिज़्बुल्लाह से जुड़े 150 से अधिक ठिकानों पर हमला किया। अब सवाल यह उठता है कि अगर ईरान, इजराइल, लेबनान और अमेरिका के बीच संघर्ष के हालात यूंही बने रहे तो दुनिया में आर्थिक मंदी के हालात पैदा हो सकते हैं। क्या यह आर्थिक मंदी पिछले दो आर्थिक मंदी से ज्यादा घातक साबित होगी? आइए जानते हैं।

पिछली दो आर्थिक मंदियों से इस बार कितने अलग हैं हालात?

Middle East Crisis : मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक संकट (Geo Political Crisis) के चलते विश्व अर्थव्यवस्था वर्तमान समय में दुनिया के अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहे हैं। ट्रंप के टैरिफ युद्ध (Trump Tarrif War) के बाद मध्य पूर्व ईरान-इजराइल के बीच जारी तनाव, लाल सागर में व्यापारिक मार्गों पर हमले, तेल उत्पादक देशों की राजनीतिक अस्थिरता आदि ने मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बहुत ज्यादा दबाव तो बना ही दिया है। अभी वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी (Global Economic Crisis) के दौर से नहीं गुजर रही है, लेकिन तेल, गैस की बाधित आपूर्ति के चलते मंदी जैसे माहौल बन रहा है। दुनिया में कई कंपनियां घाटे के चलते अपने कर्मचारियों को नौकरी से हटा रही है। हालांकि हम जब वर्तमान हालत को 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी और 2020 की कोविड-19 जनित मंदी के बरअक्स रखकर देखते हैं तो यह कई मायनों में भिन्न नजर आती है।

दरअसल, पिछली दो मंदियों में से एक आर्थिक थी तो दूसरी स्वास्थ्य जनित समस्याओं के चलते पैदा हुई थी। मध्य पूर्व संकट के चलते पैदा हुआ संकट सिर्फ आर्थिक नहीं है। वर्तमान संकट 'भू-राजनीतिक-आर्थिक संकट' (Geo-Political-economic Crisis) का रूप ले चुका है। इसकी प्रकृति, कारण, प्रभाव और समाधान तीनों ही पहले की मंदियों से अलग हैं।

दुनिया में अलग-अलग फसादों से पैदा हो रहा संकट

दुनिया के बहुत सारे देशों की ऊर्जा जरूरतों की आपूर्ति का केंद्र मध्य पूर्व देश हैं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की निर्भरता तो इन मामलों में बहुत ज्यादा है। मध्य पूर्व विश्व ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है। मध्य पूर्व के सउदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, यूएई और कतर में दुनिया के कुल तेल भंडार का करीब-करीब 50 प्रतिशत हिस्सा है।

भारत से ज्यादा जापान और दक्षिण कोरिया प्रभावित

एशियाई देशों की निर्भरता मध्य पूर्व के देशों पर बहुत ज्यादा है। जापान अपनी जरूरत का 90 फीसदी तेल सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से आयातित करता है। दक्षिण कोरिया 80 फीसदी, पाकिस्तान 60%, भारत 55-60%, जबकि 45-50% फीसदी तक मध्य पूर्व देशों से तेल का आयात करते हैं। जाहिर सी बात है कि मध्य पूर्व क्षेत्र में जब भी तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। यहां तो हाल के वर्षों में ईरान-इजराइल टकराव, गाजा युद्ध, यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जहाजों पर हमले और ओपेक देशों की उत्पादन नीतियों ने मिलकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को अस्थिर कर दिया। यूरोप और एशिया के बीच लगभग 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार इसी रास्ते से होता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापार बाधाओं के चलते व्यापारिक जहाजों को लंबा वैकल्पिक मार्ग तय करना पड़ रहा है। इससे परिवहन लागत में बढ़ोतरी हो रही है और इन सभी बाधाओं के चलते दुनिया में महंगाई तेजी से बढ़ रही है।

Stagflation: 2008 में करीब 3.5 करोड़ लोगों की चली गई नौकरियां

वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी की जड़ में मुख्य रूप से अमेरिका ही था। अमेरिका के आवास बाजार और बैंकिंग प्रणाली के पतन के कारण वैश्विक मंदी आई थी। इसे 'सब-प्राइम संकट' कहा गया। बैंकों ने जोखिमपूर्ण ऋण दिए और लोग ऋण चुकाने में विफल रहे, जिसके चलते पूरी वित्तीय प्रणाली हिल गई। बेरोजगारी दर 2008 की आर्थिक मंदी के चलते 5.7% से बढ़कर 6.2% पहुंच गई थी। एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में करीब 3-3.5 करीब लोगों की नौकरियां छूट गई थीं। अकेले अमरीका में करीब 87 लाख लोग नौकरियों से हाथ धो बैठे थे। स्पेन और मिस्र जैसे देशों में बेरोजगारी दर 20 फीसदी तक पहुंच गई थी। 2008 में मांग घटने से मंदी आई थी, लेकिन आज उत्पादन लागत बढ़ने और आपूर्ति बाधित होने से महंगाई और मंदी साथ-साथ बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। इसे 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) कहा जा रहा है, जिसमें आर्थिक वृद्धि की रफ्तार कम होने के साथ महंगाई ऊंचाई छूने लगी है।

वर्ष 2020 में महामारी के चलते ठप पड़ गए थे उद्योग धंधे

वर्ष 2020 में कोविड महामारी के चलते मंदी आई थी। कोविड की संक्रामकता को कम करने के लिए दुनिया भर की सरकारों ने पूर्ण लॉकडाउन लगाए। कल-कारखाने और उद्योग धंधे के पहिए पूरी तरह से थम गए थे। लोगों को घरों में कैद होना पड़ा था। उत्पादन और मांग दोनों ही अचानक गिर गया। कोविड से लड़ने के लिए कई तरह के वैक्सीन का इजाद हुआ, जिसके बाद लॉकडाउन खत्म हुआ और धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आई। हालांकि, कोविड काल में करीब 11.5 लोगों की नौकरियां छूट गई थीं। लेकिन यदि काम के घंटे कम होने को भी जोड़ दिया जाए तो इसका प्रभाव 25.5 करोड़ लोगों की बेरोजगारी के बराबर मापा गया था।

पिछले तीन महीने से मध्य पूर्व संघर्ष जारी है। इस इलाके में युद्ध कितना लंबा खिंच जाएगा, इसके बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। हां, अगर संघर्ष लंबा खिंचता जाएगा, तो तेल की कीमतें लगातार बढ़ती जाएंगी। इसका असर परिवहन, बिजली, खाद्य उत्पादन और उद्योगों की लागत बढ़ती जाएगी।

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