
ड्रॉपआउट की समस्या वर्षों से बनी हुई है, बस आंकड़े बदलते रहते हैं। इसे जड़ से खत्म करने के लिए आंगनवाड़ी और प्राथमिक स्कूलों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। आंगनवाड़ी में पंजीकृत बच्चों को सीधे स्कूल में प्रवेश देने की व्यवस्था होनी चाहिए। घुमंतू या मजदूरी करने वाले परिवारों के बच्चों के पास अक्सर जरूरी दस्तावेज नहीं होते, जिससे उनका प्रवेश रुक जाता है। ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए नियमों में कुछ लचीलापन जरूरी है। - निर्मला वशिष्ठ, राजगढ़ (अलवर)
सरकारी स्कूलों में बढ़ती ड्रॉपआउट दर केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता का भी संकेत है। जब बच्चा स्कूल छोड़ता है तो उसका भविष्य सीमित हो जाता है। इसलिए माध्यमिक स्तर से ही कौशल आधारित पाठ्यक्रम, डिजिटल शिक्षा और स्थानीय रोजगार से जुड़ी ट्रेनिंग शुरू की जानी चाहिए। इससे अभिभावकों का भरोसा बढ़ेगा। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, डीबीटी, मुफ्त किताबें और परिवहन सुविधा समय पर मिलनी चाहिए। साथ ही, स्कूलों में काउंसलिंग और मेंटरशिप से बच्चों का आत्मविश्वास मजबूत किया जा सकता है। - डॉ. दीपिका झंवर, जयपुर
ड्रॉपआउट की समस्या का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। समाज और अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। जब शिक्षा को भविष्य के अवसर के रूप में देखा जाएगा, तब बच्चों की नियमित उपस्थिति बढ़ेगी। डिजिटल सुविधाओं का विस्तार और स्कूलों में बुनियादी संसाधनों का सुधार समय की मांग है। - अभिमन्यु जाखड़, जोधपुर
कई सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें और संसाधनों की कमी भी बच्चों को पढ़ाई से दूर करती हैं। टपकती छत, बैठने की समुचित व्यवस्था का अभाव और स्वच्छ पानी की कमी जैसे मुद्दे तुरंत सुलझाए जाने चाहिए। लड़कों और लड़कियों के लिए अलग शौचालय की सुविधा विशेष रूप से जरूरी है। शिक्षकों की पर्याप्त संख्या और उनकी नियमित उपस्थिति भी सुनिश्चित की जाए। मुफ्त गणवेश, सस्ती कॉपी किताबें और प्रतिभावान छात्रों को सम्मानित करने जैसी पहल बच्चों का उत्साह बढ़ाती हैं। बेहतर वातावरण ही बच्चों को स्कूल में टिकाए रखने का आधार बन सकता है। - वसंत बापट, भोपाल
सरकारी योजनाएं तभी प्रभावी होती हैं, जब उनका लाभ सही समय पर विद्यार्थियों तक पहुंचे। मिड डे मील, छात्रवृत्ति, साइकिल और स्कूटी वितरण जैसी योजनाएं बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने में सहायक हैं। दूरदराज क्षेत्रों की छात्राओं के लिए यात्रा वाउचर और सुरक्षित परिवहन विशेष महत्व रखते हैं। पोषण योजनाओं के तहत सप्ताह में एक दिन संतुलित आहार या दूध वितरण जैसी पहल बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार ला सकती है। - आनंद सिंह राजावत, ब्यावर
Updated on:
11 Feb 2026 05:51 pm
Published on:
11 Feb 2026 04:11 pm
