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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – सीमेंट की दीवार

समय के साथ परिवर्तन होते ही हैं। परिवर्तन किसका और कैसा यह अधिक महत्वपूर्ण है। परिवर्तन होता भी है और किया भी जाता है।

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Feb 11, 2026

Gulab Kothari

फोटो: पत्रिका

समय के साथ परिवर्तन होते ही हैं। परिवर्तन किसका और कैसा यह अधिक महत्वपूर्ण है। परिवर्तन होता भी है और किया भी जाता है। हमारे लोकतंत्र में कुछ परिवर्तन परिस्थितियों के कारण संसद द्वारा किए गए, कुछ स्वार्थी तत्व करवाते रहे। आज लोकतंत्र का जो स्वरूप हमारे सामने है वह जनता के द्वारा तो है, जनता का कहा भी जाता है, किन्तु जनता का है नहीं। यही कटु सत्य भी है।

लोकतंत्र के तीन पाए हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। चौथा तंत्र है मीडिया जो जनता और सरकार के मध्य सेतु है। इनका स्वरूप इतना बदल चुका है कि मूल स्वरूप से बहुत दूर निकल गए। अर्थात-जनता से बहुत दूर निकल गए। आज जनता का भरोसा स्थानीय स्तर पर तो तीनों संस्थाओं से उठ-सा गया है। केन्द्र के बूते पर देश चल रहा है।

प्रदेश स्तर पर जनता ने जिस भी राजनीतिक दल को भरपूर समर्थन दिया, उसी ने भरपूर लूटा। कई प्रदेशों में तो रजवाड़ों जैसा माहौल तक बनता गया। नाम तो सबको याद हैं। सभी ने लोकतंत्र को खानदान की विरासत बना लिया था। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु जैसे उदाहरण अभी सामने हैं। इसी प्रक्रिया ने प्रशासन को भी आसुरी बना दिया था। सामन्ती युग का भी और लूट-पाट-अत्याचार का भी भयावह दृश्य देखा है लोकतंत्र के पर्दे पर।

आज की शिक्षा ने तो लोकतंत्र का गला ही घोंट दिया है। सरकारें सर्वाधिक गर्व इस शिक्षा के प्रसार पर ही करती हैं। धृतराष्ट्र को जैसा मोह अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन पर था, वैसा ही गर्व हमें शिक्षा नीति और अधिकारियों पर रहा है। नीतियां लागू करने वालों को आज भी मैकाले की दृष्टि से ही प्रशिक्षित किया जा रहा है। ये आज भी अंग्रेजों की तर्ज पर राज कर रहे हैं। न सरकार से इनका कोई नाता है, न ही जनता से जो इनका पालन-पोषण करती है। सब खुदगर्ज होकर अपने पेट के लिए कुछ भी बेचने को तैयार रहते हैं। सरकारों को आते-जाते रहना है, ये तो स्थायी हैं।

पत्रकार एक ओर कार्यपालिका के स्थायी मित्र बन बैठे, दूसरी ओर सरकार से स्वार्थ सिद्धि योग बनाते रहे। सरकारों के साथ हो लिए-चौथा स्तंभ बन गए। पत्रकार और मीडिया की चिन्तनधारा राष्ट्रीय स्तर की थी, देश और समाज के लिए जागरूकता-लोकशिक्षण की मशाल थामे थे। आज मांगने वाले बन गए। दृष्टि अधिकारियों और नेताओं के साथ-साथ पेट तक सिमटने लगी है। जनता को छोड़कर लक्ष्मी के पीछे दौड़ पड़े। युग बदल गया। कार्यपालिका और न्यायपालिका का स्थायित्व सीमेंट की तरह पक्का हो गया। एक ओर सरकार तथा दूसरी ओर जनता। बीच का प्रवाह बाधित हो गया।

सरकार की नीतियों और योजनाओं को जनता तक पहुंचाना था। क्रियान्विति के लिए बजट था। सब सीमेंट की दीवार को पार करने में लाचार हो गए। स्वर्गीय राजीव गांधी ने कहा था ‘सर कार के एक रुपए के खर्च का 15 पैसा ही जनता तक पहुंचता है।’ तब दीवार, सीमेंट की नहीं, चूने की थी। पिछले दस वर्षों से राजस्थान का बजट घाटे का बन रहा है।

सरकार(पिछली) तो यहां तक घोषणा कर चुकी है कि बजट की राशि Žब्याज-वेतन-पेंशन के लिए भी कम पड़ती है। वेतन देने के लिए कर्ज लेने के उदाहरण भी हैं। यह हाल तो तब हैं, जब अधिकांश कर्मचारी संविदा पर हैं। पेंशन के लिए लोग चक्कर काटते रहते हैं। मुआवजे एड़ियां घिसवां देते हैं, काम निकलवाने के लिए अपने ही नौकरों को रिश्वत देनी पड़ती है। ये अपने कहां हुए? आज लोकतंत्र को ये पराए लोग-संवेदनहीनता के साथ चला रहे हैं। भारत की माटी से कोई लगाव नहीं, सेवा करने की कोई कामना नहीं है। परायापन इतना बढ़ गया है कि रिश्वत में धन कम और अस्मत ज्यादा मांगते हैं। एक-चौथाई ही ऐसे होंगे जो राष्ट्रधर्म और मूल्यों के साथ इस भीड़ में जीने के लिए संघर्ष कर रहे होंगे।

सरकार के एक रुपए का कितना अंश नीचे तक पहुंचता रहा है इसका उदाहरण-शहरों-गांवों में पीने का जल आज भी दूषित है। आदिवासी आज भी आदिवासी है। चारों कोने माफिया से लदे हैं-सरकारी आश्रय में। न आरक्षण का लाभ आम लोगों तक पहुंचा। गरीबी रेखा के नीचे आज भी करोड़ों हैं। इनकी आवाज सीमेंट के पार नहीं जा सकती।

आज का लोकतंत्र शिक्षा के कारण पंगु हो गया है। यह सीमेंट की दीवार शिक्षितों-उच्च शिक्षितों की बनी है। कल लोहे की हो जाएगी। सरकार का सनातनी नारा नीचे तक नहीं जाएगा। नीतियों में अंग्रेजी विदेशी चिन्तन का प्रभाव भारतीय सांस्कृतिक धरातल के विपरीत पड़ता है। एक ओर मूल्य आधारित-धर्म सापेक्ष सनातन हैं, दूसरी ओर धर्म निरपेक्ष सत्ता और शिक्षा है। तब दोनों साथ, एक ही दिशा में कहां चल सकते हैं। नीतियां कुछ भी बने, सरकारें खुश हो लें, नीचे तो वहीं पहुंचेगा, जो सीमेंट के उस पार होगा। शायद सरकारों को नजर तक न आए। मंत्रीगण आज भी अंग्रेजी के चक्रव्यूह को तोड़ नहीं पाते। अबोध बालक की भांति कार्यपालिका की अंगुली पकड़कर लोकतंत्र का झंडा उठाए चलते हैं।

€क्या आज के हालात के रहते सरकार और जनता साथ साथ रह सकेंगे। जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र, विधायिका तक सिमटा हुआ है। लाभ सीमेंट में बदल रहा है। जनता के लिए कब होगा-समय ही तय करेगा।

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