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बदलती दुनिया में भारत की नई यूरोपीय दिशा

-विनय कौड़ा अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार आज भारत जिस वैश्विक वातावरण का सामना कर रहा है, वह न तो स्थिर है और न ही किसी एक शक्ति के इर्द-गिर्द घूमता हुआ। यह ऐसा वक्त है जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भरोसे की जगह आशंका और स्थायित्व की जगह अनिश्चितता ने ले ली है। इसी पृष्ठभूमि में […]

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 19, 2026

-विनय कौड़ा अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

आज भारत जिस वैश्विक वातावरण का सामना कर रहा है, वह न तो स्थिर है और न ही किसी एक शक्ति के इर्द-गिर्द घूमता हुआ। यह ऐसा वक्त है जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भरोसे की जगह आशंका और स्थायित्व की जगह अनिश्चितता ने ले ली है। इसी पृष्ठभूमि में भारत की विदेश नीति एक नए संतुलन की खोज करती दिखाई दे रही है। यह संतुलन केवल एशिया या अमरीका तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे यूरोप को अपने केंद्र में ला रहा है। हाल के घटनाक्रम इस बदलाव को केवल संकेत नहीं, बल्कि ठोस दिशा प्रदान करते हैं। पिछले दिनों जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की भारत यात्रा इसी व्यापक रणनीतिक पुनर्संरेखण का महत्वपूर्ण उदाहरण रही।

यह यात्रा औपचारिक शिष्टाचार से कहीं आगे जाकर दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग की रूपरेखा को और स्पष्ट करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चांसलर मर्ज के बीच हुई बातचीत में व्यापार, निवेश, रक्षा सहयोग, हरित ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, कौशल विकास और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं जैसे विषय प्रमुख रहे। यह संवाद इस बात का प्रमाण था कि भारत और जर्मनी एक-दूसरे को केवल आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में समान सोच वाले सहयोगी के रूप में देख रहे हैं। जर्मनी आज यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यूरोपीय संघ की राजनीतिक दिशा तय करने में उसकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है। जर्मनी के साथ सहयोग भारत को उन्नत तकनीक, औद्योगिक दक्षता और हरित परिवर्तन के अनुभव से जोड़ता है, वहीं जर्मनी के लिए भारत एक विशाल बाजार व भविष्य की विकास क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि जर्मनी बार-बार भारत से आग्रह कर रहा है कि वह रूसी ऊर्जा और हथियारों पर अपनी निर्भरता को क्रमश: कम करे, जो इतना आसान नहीं है। मर्ज की यात्रा के ठीक बाद आने वाला दूसरा बड़ा संकेत 26 जनवरी को दिखाई देगा, जब भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय संघ के शीर्ष नेता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्ता की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक नहीं है।

गणतंत्र दिवस भारत का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक-सांस्कृतिक मंच होता है, जहां देश अपनी संप्रभुता, लोकतांत्रिक मूल्यों और वैश्विक दृष्टि को प्रदर्शित करता है। ऐसे मंच पर यूरोपीय संघ के नेतृत्व को आमंत्रित करना यह स्पष्ट संदेश देता है कि भारत अब यूरोप को एक सामूहिक रणनीतिक भागीदार के रूप में महत्व दे रहा है। यह परिवर्तन अचानक नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत तेज हुई है। आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण, सेमीकंडक्टर उद्योग, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल नियमों पर दोनों पक्षों के हित काफी हद तक मेल खाते हैं। यूरोप, चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहता है और भारत इस संदर्भ में एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में उभरता है। दूसरी ओर भारत को यूरोपीय बाजारों, पूंजी और तकनीक की आवश्यकता है, जो उसके दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति दे सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए अमरीका की वर्तमान भूमिका पर भी दृष्टि डालना आवश्यक है। डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमरीका की विदेश नीति अप्रत्याशित और अंतर्मुखी होती दिख रही है। व्यापार शुल्क, गठबंधनों के प्रति अनिश्चितता और 'अमरीका फस्र्ट' की आक्रामक नीति ने विश्व राजनीति में अस्थिरता को बढ़ाया है। भारत और अमरीका के संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारत यह भली-भांति समझता है कि किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। ट्रंप काल की यही अनिश्चितता भारत को अपने विकल्पों को विस्तार देने के लिए प्रेरित कर रही है। यूरोप इस संदर्भ में एक अपेक्षाकृत स्थिर और नियम-आधारित साझेदार के रूप में सामने आता है। यूरोपीय संघ की निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है, लेकिन उसमें निरंतरता और संस्थागत भरोसा है। लोकतंत्र, बहुपक्षीयता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के प्रति सम्मान जैसे मूल्य भारत और यूरोप को एक साझा मंच पर लाते हैं, भले ही मानवाधिकार या पर्यावरण जैसे कुछ मुद्दों पर मतभेद बने रहें। भारत अब इन मतभेदों को टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाने की नीति अपना रहा है। भारत का यूरोप की ओर झुकाव किसी एक देश के खिलाफ नहीं है। यह न तो अमरीका से दूरी बनाने की घोषणा है और न ही किसी नए गुट में शामिल होने की इच्छा। यह एक संतुलित, बहुआयामी और यथार्थवादी विदेश नीति का विस्तार है। भारत यह स्वीकार करता है कि आज की दुनिया में शक्ति का केंद्र एक जगह स्थिर नहीं है और आने वाले वर्षों में आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक प्रभाव कई दिशाओं से आएगा। यूरोप के साथ मजबूत संबंध भारत को इस बहुध्रुवीय विश्व में अधिक आत्मविश्वास के साथ खड़ा होने की क्षमता देते हैं।

भारत केवल उभरती शक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति बनना चाहता है जो संतुलन साधे, संवाद करे और वैश्विक व्यवस्था को अधिक स्थिर बनाने में योगदान दे। भारत का यूरोप की ओर बढऩा एक स्वाभाविक रणनीतिक कदम है। यह उस आत्मविश्वास का परिणाम है जो भारत ने आर्थिक मजबूती, राजनीतिक स्थिरता और कूटनीतिक अनुभव से अर्जित किया है। जब वैश्विक राजनीति में पुराने भरोसे डगमगा रहे हों और नई अनिश्चितताएं जन्म ले रही हों, तब भारत का यूरोप के साथ हाथ मिलाना आने वाले समय की स्पष्ट घोषणा है कि भारत अपने भविष्य को व्यापक साझेदारियों और संतुलित दृष्टि के साथ गढऩा चाहता है।