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ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से क्यों पीछे हटी ममता ? पढ़िए इनसाइड स्टोरी

Political Survival: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Election 2026) के मुहाने पर खड़ी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने दिल्ली की राजनीति में एक ऐसा यू-टर्न लिया है, जिसने सियासी पंडितों को भी हैरान कर दिया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव (Om Birla No Confidence Motion) से ममता बनर्जी की […]

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भारत

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MI Zahir

Feb 11, 2026

Om Birla No Confidence Motion Mamata Banerjee

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (फोटो: AI)

Political Survival: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Election 2026) के मुहाने पर खड़ी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने दिल्ली की राजनीति में एक ऐसा यू-टर्न लिया है, जिसने सियासी पंडितों को भी हैरान कर दिया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव (Om Birla No Confidence Motion) से ममता बनर्जी की पार्टी ने खुद को अलग कर लिया है। ऊपरी तौर पर इसे 'रणनीति' कहा जा रहा है, लेकिन इनसाइड स्टोरी कुछ और ही है। सूत्रों की मानें तो इसके पीछे मोदी-शाह की जोड़ी का डर और केंद्रीय एजेंसियों (ED-CBI) की धमक है। गौरतलब है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion) के नोटिस पर विपक्ष के 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं।

अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion) के नोटिस पर इनके हस्ताक्षर

हस्ताक्षर करने वाले: कांग्रेस, डीएमके (DMK), समाजवादी पार्टी (SP), एनसीपी (शरद पवार) और अन्य 'इंडिया' गठबंधन के दलों के 118 सांसदों ने इस नोटिस पर दस्तखत किए।

किसने नहीं किए: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के किसी भी सांसद ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए। अभिषेक बनर्जी ने तर्क दिया कि पहले स्पीकर को सुधरने का मौका (Warning Letter) देना चाहिए था, सीधे अविश्वास प्रस्ताव लाना जल्दबाजी है।

नियम: स्पीकर को हटाने का संकल्प लाने के लिए कम से कम 50 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है, जो विपक्ष ने आसानी से जुटा लिए (118), लेकिन टीएमसी की गैर-मौजूदगी ने विपक्षी एकता पर सवाल खड़े कर दिए।

लोकसभा में टीएमसी के सांसदों की संख्या

वर्तमान में लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों की कुल संख्या 28 है।

2024 चुनाव परिणाम: साल 2024 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने पश्चिम बंगाल की कुल 42 सीटों में से 29 सीटें जीती थीं।

रिक्त सीट (Basirhat): बशीरहाट सीट से टीएमसी के सांसद हाजी नुरुल इस्लाम का सितंबर 2024 में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद से यह सीट खाली (Vacant) है।

मौजूदा संख्या: 29 (जीती गई सीटें) - 1 (रिक्त) = 28 सांसद।

दिल्ली में दोस्ती, बंगाल में कुश्ती ?

अविश्वास प्रस्ताव से टीएमसी के किनारा करने का सीधा मतलब है कि ममता बनर्जी चुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार से सीधा पंगा नहीं लेना चाहतीं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह ममता बनर्जी का 'सेफ गेम' है। टीएमसी जानती है कि लोकसभा में नंबर गेम उनके पक्ष में नहीं है, ऐसे में ओम बिरला के खिलाफ खड़ा होकर वो अपनी ही पार्टी के नेताओं के लिए मुसीबत नहीं बढ़ाना चाहतीं।

ED, CBI और इनकम टैक्स का डर

पार्टी के अंदरखाने से जो खबरें छन कर आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी के कई बड़े सांसद और विधायक केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। चुनाव से ठीक पहले अगर ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) की सक्रियता बढ़ती है, तो टीएमसी के लिए चुनाव प्रचार करना मुश्किल हो जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि, "ममता बनर्जी नहीं चाहतीं कि चुनाव से पहले उनके उम्मीदवारों और फाइनेंसरों के घर इनकम टैक्स की रेड पड़े। इसलिए, संसद में तटस्थ रह कर उन्होंने केंद्र को एक तरह का 'साइलेंट मैसेज' दिया है।"

बंगाल विधानसभा: सीटों का गणित और मौजूदा हाल

2026 के चुनाव में ममता बनर्जी की साख दांव पर है। आइए एक नजर डालते हैं विधानसभा के मौजूदा समीकरणों पर:

कुल विधानसभा सीटें: 294

बहुमत का जादुई आंकड़ा: 148

टीएमसी (मौजूदा स्थिति): 215+ (मजबूत स्थिति में, लेकिन एंटी-इनकंबेंसी का खतरा)

बीजेपी (मौजूदा स्थिति): 70+ (मुख्य विपक्षी दल, जो 100 पार करने को बेताब है)

अन्य (कांग्रेस/लेफ्ट): हाशिये पर।

हॉट सीटें (Hot Seats) जिन पर सबकी नजर

इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, नाक की है। कुछ सीटें 'हॉट केक' बनी हुई हैं:

भवानीपुर: सीएम ममता बनर्जी का गढ़।

नंदीग्राम: शुभेंदु अधिकारी का क्षेत्र, जहां पिछले चुनाव में कांटे की टक्कर थी।

डायमंड हार्बर: अभिषेक बनर्जी का प्रभाव क्षेत्र, जिसे भेदने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत लगा दी है।

मोदी-शाह का मनोवैज्ञानिक दबाव

भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल के लिए जो चक्रव्यूह रचा है, उससे टीएमसी खेमा सहमा हुआ है। ओम बिरला के खिलाफ प्रस्ताव में शामिल न होकर टीएमसी ने यह साबित कर दिया है कि वे दिल्ली की लड़ाई छोड़कर फिलहाल अपना कोलकाता का किला बचाने में जुटे हैं। पार्टी को डर है कि अगर दिल्ली में ज्यादा आक्रामकता दिखाई, तो बंगाल में उसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

ममता बनर्जी फूंक-फूंक कर कदम रख रहीं (Mamata Banerjee)

बहरहाल, ओम बिरला प्रकरण ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल चुनाव 2026 से पहले ममता बनर्जी फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। यह 'डर' है या चुनावी 'डिप्लोमेसी', इसका फैसला तो चुनाव के नतीजे ही करेंगे, लेकिन फिलहाल टीएमसी बैकफुट पर नजर आ रही है।

भाजपा का हमला: इस मामले पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने चुटकी लेते हुए कहा है कि "विपक्ष का गुब्बारा फूट चुका है। टीएमसी जानती है कि उनकी दाल नहीं गलने वाली, इसलिए उन्होंने मैदान छोड़ दिया।"

कांग्रेस की नाराजगी: वहीं, 'इंडिया गठबंधन' के सहयोगी दलों में टीएमसी के इस कदम से नाराजगी है। उनका मानना है कि ममता बनर्जी ने ऐन मौके पर साथ छोड़कर विपक्ष की एकता को कमजोर किया है।

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इन घटनाओं पर नजर

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विपक्ष में दरार: क्या 2026 में अकेले लड़ेगी ममता ?

ओम बिरला के मुद्दे पर टीएमसी का अलग-थलग पड़ना एक बड़े संकेत की ओर इशारा करता है। यह इस बात का सबूत है कि राष्ट्रीय स्तर पर भले ही विपक्ष एक हो, लेकिन राज्य स्तर पर हितों का टकराव जारी है। बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट के साथ ममता का तालमेल बैठना अब और मुश्किल लग रहा है। यह बिखराव अंततः भाजपा को ही फायदा पहुंचा सकता है।