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लोकसभा में गूंजा सवाल, बरेली में गूंगी रहीं फाइलें, पांच साल जमीन खोजते रहे अफसर, हेल्थ प्रोजेक्ट लखनऊ उड़ गया

स्थानीय डॉक्टर लॉबी की सांठगांठ कहें या अफसरों की घोर लापरवाही का नमूना। पांच साल तक फाइलें धूल फांकती रही और बरेली में अफसरो को जमीन तक नहीं मिली।

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बरेली। स्थानीय डॉक्टर लॉबी की सांठगांठ कहें या अफसरों की घोर लापरवाही का नमूना। पांच साल तक फाइलें धूल फांकती रही और बरेली में अफसरो को जमीन तक नहीं मिली। हम बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के तहत बरेली में प्रस्तावित क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक और एकीकृत जन स्वास्थ्य प्रयोगशाला का, जो अब लखनऊ शिफ्ट कर दी गई है।

यह खुलासा तब हुआ जब सपा सांसद नीरज मौर्य ने लोकसभा में स्वास्थ्य मंत्री से सीधा सवाल दागा। जवाब आया तो बरेली के प्रशासनिक दावों की परतें खुलती चली गईं। स्वास्थ्य राज्य मंत्री के लिखित उत्तर में साफ कहा गया कि वर्ष 2021 से 2026 के बीच बरेली में भूमि उपलब्ध न हो पाने के कारण यहां प्रस्तावित परियोजना को लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया।

बरेली में खोली जानी थी प्रयोगशाला

उत्तर प्रदेश में 75 एकीकृत जन स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं और 74 गहन चिकित्सा (क्रिटिकल केयर) ब्लॉक स्थापित होने थे। बरेली का नाम भी सूची में था, लेकिन जमीन की अनुपलब्धता ने पूरे प्रस्ताव को पटरी से उतार दिया।
सवाल यह है कि जिस जिले को रुहेलखंड का मेडिकल हब बनाने की बात होती रही, वहां एक अस्पताल ब्लॉक के लिए भी जमीन तय नहीं हो सकी?

तराई में संक्रमण का खतरा, जवाब में सिर्फ पोर्टल का जिक्र

स्वास्थ्य राज्य मंत्री ने जवाब में बताया कि बरेली क्षेत्र में मलेरिया, डेंगू, जापानी एन्सेफलाइटिस, एंटरोवायरस, स्क्रब टाइफस, लेप्टोस्पाइरोसिस और सेरेब्रल मलेरिया की निगरानी के लिए एकीकृत रोग निगरानी पोर्टल का उपयोग किया जा रहा है।
लेकिन तराई क्षेत्र में हर साल बढ़ते संक्रमण के जोखिम के बीच स्थानीय स्तर पर अत्याधुनिक लैब और त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकी, इसका सीधा उत्तर नहीं मिला। पोर्टल पर निगरानी का दावा है, मगर जमीन पर बुनियादी ढांचा नहीं, यही सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरा है।

डायलिसिस-कीमोथेरेपी पर भी गेंद राज्यों के पाले में

डायलिसिस और कीमोथेरेपी सेवाओं के विस्तार पर मंत्री ने कहा कि यह राज्यों की मांग और संसाधनों के आकलन पर निर्भर करता है। यानी केंद्रीय योजना हो या उपचार सेवाएं, स्थानीय स्तर की सक्रियता ही निर्णायक है।
ऐसे में बरेली में भूमि तक चिन्हित न हो पाना प्रशासनिक सुस्ती या आपसी तालमेल की कमी की ओर इशारा करता है।

सांसद का हमला: स्वास्थ्य जैसी जरूरी योजना भी जमीन के अभाव में अटकी

आंवला सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि अगर स्वास्थ्य संबंधी जरूरी योजनाओं के लिए भी सरकार और प्रशासन भूमि उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, तो यह स्थानीय प्रशासन की विफलता है। उन्होंने कहा कि बजट आवंटन और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अब भी बड़ा अंतर है। स्वीकृत परियोजनाएं कागजों में रह जाती हैं और जनता को सिर्फ घोषणाएं मिलती हैं। सांसद ने स्पष्ट किया कि वह प्रदेश सरकार से मिलकर योजना को दोबारा बरेली में स्थापित कराने का प्रयास करेंगे और समयबद्ध निगरानी की मांग करेंगे।

सवालों के घेरे में स्थानीय प्रशासनिक तंत्र

बरेली में हर साल डेंगू, वायरल बुखार और संक्रामक बीमारियों के मामलों में बढ़ोतरी होती रही है। गंभीर मरीजों को लखनऊ या बड़े मेडिकल संस्थानों का रुख करना पड़ता है। ऐसे में प्रस्तावित क्रिटिकल केयर ब्लॉक स्थानीय स्तर पर जीवनरक्षक साबित हो सकता था। अब यह परियोजना दूसरे शहर को मिल गई है और बरेली के हिस्से आई है सिर्फ एक स्वीकारोक्ति, भूमि उपलब्ध नहीं थी।