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30 लाख का मेडिकल रिइम्बर्समेंट घोटाला… बिना इलाज फर्जी बिलों से साफ किया सरकारी खजाना, ऐसे हुआ खुलासा

स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सा प्रतिपूर्ति के नाम पर करीब 30 लाख रुपये के घोटाले का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने अस्पतालों में इलाज कराए बिना ही फर्जी बिल लगाकर सरकारी धन हड़प लिया।

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शाहजहांपुर। स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सा प्रतिपूर्ति के नाम पर करीब 30 लाख रुपये के घोटाले का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने अस्पतालों में इलाज कराए बिना ही फर्जी बिल लगाकर सरकारी धन हड़प लिया। वित्त मंत्री के निर्देश पर हुई जांच में पूरा खेल उजागर हुआ तो प्रशासन में हड़कंप मच गया। जिलाधिकारी ने मामले में एफआईआर, धन की रिकवरी और दोषी कर्मचारियों की सेवा समाप्ति तक के निर्देश दिए हैं।

वित्त मंत्री के निर्देश पर खुला घोटाले का राज

मामले का खुलासा तब हुआ जब वर्ष 2025 में अक्टूबर से दिसंबर के बीच 12 कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति के रूप में 29 लाख 93 हजार 943 रुपये का भुगतान किए जाने का विवरण वित्त मंत्रालय तक पहुंचा। वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने भुगतान पर संदेह जताते हुए डीएम धर्मेंद्र प्रताप सिंह को जांच के निर्देश दिए। इसके बाद डीएम ने सीडीओ डा. अपराजिता सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति गठित कर पूरे मामले की पड़ताल कराई।

जांच में सामने आया फर्जी बिलों का खेल

जांच टीम में वरिष्ठ कोषाधिकारी अमरेश बहादुर और मेडिकल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. पंकज भी शामिल थे। जांच के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। सेवानिवृत्त कर्मचारी कुसुमलता रस्तोगी के स्थान पर उनके बेटे विशाल कुमार जांच टीम के सामने पहुंचे और बताया कि उनकी मां का इलाज लखनऊ के लाइफ केयर अस्पताल में हुआ था और तीन बार चिकित्सा प्रतिपूर्ति मिली। लेकिन जब अस्पताल से सत्यापन कराया गया तो अस्पताल प्रबंधन ने साफ कहा कि उनके यहां आईपीडी सुविधा ही नहीं है और सूची में शामिल किसी भी व्यक्ति का इलाज वहां नहीं हुआ।

कई अस्पतालों के नाम भी निकले फर्जी

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि मिशन अस्पताल प्रबंधन ने भी इन कर्मचारियों के इलाज से इनकार कर दिया। वहीं सरस्वती हार्ट केयर एंड मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल नाम से लखनऊ में कोई अस्पताल ही नहीं मिला। इससे साफ हो गया कि **बिल और इलाज के दस्तावेज पूरी तरह फर्जी तैयार किए गए थे।

एक कर्मचारी ने वापस किए रुपये

जांच के दौरान सेवानिवृत्त जिला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी राजेश भटनागर ने टीम को बताया कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने कोई इलाज नहीं कराया और न ही प्रतिपूर्ति के लिए बिल लगाए। उन्होंने बताया कि उनके खाते में जो धनराशि भेजी गई थी, उसे उन्होंने 28 फरवरी को वापस जमा करा दिया।

एफआईआर, रिकवरी और नौकरी खत्म

जांच में अनियमितता साबित होने के बाद डीएम धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने निर्देश दिए कि सरकारी धन हड़पने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाए, सभी दोषियों को रकम वापस करने का नोटिस दिया जाए, 15 दिन में पैसा जमा न करने पर आरसी जारी की जाए और भुगतान प्रक्रिया में शामिल कर्मचारियों की तीन दिन में सेवा समाप्त कर विभागीय कार्रवाई की जाए।

सीएमओ कार्यालय पर भी उठे सवाल

चिकित्सा प्रतिपूर्ति की पूरी प्रक्रिया सीएमओ कार्यालय से संचालित होती है। कर्मचारी को अस्पताल का सत्यापित बिल और वाउचर जमा करना होता है, जिसके बाद फाइल लेखा विभाग भेजी जाती है और भुगतान जारी होता है। इस फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद सीएमओ कार्यालय में तैनात कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है। सीएमओ डॉ. विवेक मिश्र ने बताया कि मामले की विभागीय जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम गठित कर दी गई है।

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