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Space Traffic: आसमान में भयंकर ‘ट्रैफिक जाम’! अंतरिक्ष में तारों से ज्यादा इंसानी कबाड़, क्यों खतरे में दुनिया?

Space Traffic: धरती के बाद अब अंतरिक्ष को भी कबाड़खाना बना दिया है। धरती की कक्षा में 35,000 से ज्यादा सैटेलाइट्स और मलबे से भयंकर ट्रैफिक जाम लग गया है, जो हमारे भविष्य के इंटरनेट और स्पेस मिशन के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।

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अंतरिक्ष के सैटेलाइट्स

Space Traffic: हम जब भी रात में आसमान की तरफ देखते हैं, तो हमें टिमटिमाते हुए तारे दिखाई देते हैं। उन तारों के बीच अब एक-एक करके रॉकेट उड़ने लगे हैं, सैटेलाइट पहुंचने लगे हैं और हालत ये हो गई है कि धरती के ऊपर अंतरिक्ष में ट्रैफिक बढ़ता जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार 2026 तक के अपडेट धरती के चारों ओर चक्कर लगाने वाले ऑब्जेक्ट्स की संख्या रॉकेट की रफ्तार से बढ़ी है। इसमें सिर्फ काम करने वाली सैटेलाइट्स ही नहीं हैं, बल्कि खराब हो चुके रॉकेट के हिस्से, टुकड़े और पुराने मिशन्स का मलबा भी शामिल है। आने वाले समय में यही भीड़ दुनिया के इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क, GPS और स्पेस मिशनों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

अंतरिक्ष में हजारों टन मलबा

धरती के बहुत पास एक तय ऑर्बिट (Orbit) में हजारों सैटेलाइट्स दिनरात घूम रहे हैं। जिसे लो अर्थ ऑर्बिट (Low Earth Orbit) कहा जाता है। यह इलाका धरती से लगभग 400 से 2000 किलोमीटर की ऊंचाई पर है। यह जगह सीमित है और हर देश, हर प्राइवेट कंपनी अपनी सैटेलाइट्स इसी इलाके में भेजता है। आंकड़ों के अनुसार 2026 तक पृथ्वी की कक्षा में 40,000 से ज्यादा ऑब्जेक्ट घूम रहे हैं। इनमें काम करने वाले सैटेलाइट भी हैं और हजारों टन बेकार मलबा भी। वैज्ञानिकों की चिंता अब सिर्फ नए मिशन भेजने की नहीं, बल्कि अंतरिक्ष को सुरक्षित रखने की भी है।

अंतरिक्ष की शुरुआत

वैज्ञानिकों ने 1960 के दशक में पहली बार आसमान की सीमाओं को पार कर अंतरिक्ष में कदम रखने का सपना देखा था। उस समय अंतरिक्ष विज्ञान नया-नया था। पूरी दुनिया में सिर्फ दो ही ताकतें थीं- अमेरिका और रूस। इन दोनों के बीच एक-दूसरे से आगे निकलने की रेस मची थी। पूरी पृथ्वी के चारों ओर मुश्किल से 200 से 300 सैटेलाइट और उनके ही घूम रहे थे। आसमान एकदम खाली और साफ था। यह अंतरिक्ष के इतिहास का वह शुरुआती पन्ना था जहां से आधुनिक युग की नींव पड़ी।

लॉन्चिंग की रफ्तार बढ़ी

1960 के दशक की शुरुआती कामयाबी के बाद, 1970 तक दुनिया भर के देशों को यह समझ आ गया कि अंतरिक्ष के सैटेलाइट्स बहुत काम की चीज है। सैटेलाइट्स का इस्तेमाल रोजमर्रा की जरूरतों के लिए होने लगा जैसे मौसम का पूर्वानुमान लगाना ताकि तूफानों का पता चल सके, और सेना द्वारा एक-दूसरे की जासूसी करना। जैसे-जैसे तकनीक बेहतर हुई, लॉन्चिंग की रफ्तार भी बढ़ गई। देखते ही देखते अंतरिक्ष में 1,500 के पार सैटेलाइट्स पहुंच चुके थे।

सैटेलाइट्स की बढ़ी मांग

साल 1980 के आते-आते अंतरिक्ष में कई देश पहुंच गए थे। अमेरिका और रूस के अलावा दुनिया के कई और देशों ने भी अपनी ताकत दिखाना शुरू कर दिया। संचार और टीवी सिग्नल जैसी नई तकनीकों के आने से सैटेलाइट्स की मांग अचानक बढ़ गई। अंतरिक्ष में हलचल पहले के मुकाबले कई गुना तेज हो गई और वहां चक्कर काट रही सैटेलाइट्स की संख्या 4,000 से 5,000 के बीच पहुंच गई।

हजारों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष में उड़ रहा मलबा

साल 1990 में अंतरिक्ष की तस्वीर बदलने लगी थी। जितने भी मिशन भेजे गए थे, उनमें से कई सैटेलाइट्स ने काम करना बंद कर दिया था। दिक्कत यह थी कि उन पुरानी सैटेलाइट्स को वापस धरती पर लाने का कोई तरीका नहीं था। इसी दौरान वैज्ञानिकों ने पहली बार अंतरिक्ष में मौजूद कचरे (Space Debris) को गंभीरता से समझा, यह कचरा सिर्फ खराब सैटेलाइट्स तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें रॉकेटों के अलग हुए हिस्से और उनके टूटे हुए टुकड़े भी शामिल थे। धरती पर भी तो कचरा पड़ा रहता है, लेकिन अंतरिक्ष का कचरा धरती के कचरे से बिल्कुल अलग है। धरती के चारों ओर चक्कर लगा रही कोई भी चीज लगभग 27,000 से 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रही होती है। यह रफ्तार बंदूक से निकली गोली से भी कई गुना ज्यादा है। आसमान में लगभग वस्तुएं 7,000 से 8,000 के पार पहुंच गई।

सैटेलाइट्स बना रोजमर्रा की जरूरत

साल 2000 के दशक की शुरुआत के साथ ही दुनिया में तकनीक का एक नया दौर शुरू हुआ। घर-घर में टीवी चैनल्स की बाढ़ आ गई और मोबाइल फोन हर हाथ की जरूरत बन गए। लेकिन इन सबको चलाने के लिए जिस सिग्नल और इंटरनेट की जरूरत थी, वह सीधे अंतरिक्ष से आ रहा था। दुनिया भर की कंपनियों ने 'कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स' लॉन्च करनी शुरू कर दीं। अंतरिक्ष की भीड़ लगभग 9,000 से 10,000 के आंकड़े को छूने लगी। अंतरिक्ष सिर्फ विज्ञान की प्रयोगशाला नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की जरूरी हिस्सा बन चुका था।

प्राइवेट कंपनियों ने अंतरिक्ष को बनाया बड़ा बाजार

दुनिया इंटरनेट और जीपीएस (GPS) पर पूरी तरह निर्भर हो गई, जिसने अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स की मांग बढ़ती ही जा रही है । 2010 तक अंतरिक्ष में करीब 15,000 वस्तुएं चक्कर काट रही थीं और वैज्ञानिकों को पहली बार वहां ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति का डर सताने लगा। रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 में अंतरिक्ष में एलन मस्क और जेफ बेजोस जैसी बड़ी प्राइवेट कंपनियों की एंट्री हुई। इन कंपनियों ने अंतरिक्ष को एक बड़ा बाजार बना दिया और एक साथ सैकड़ों सैटेलाइट्स लॉन्च करना शुरू कर दिया। अंतरिक्ष में लगभग 19,000 के पार वस्तुएं पहुंच गई। अंतरिक्ष सिर्फ सरकारों का मिशन नहीं, बल्कि प्राइवेट कंपनियों की एक ऐसी रेस बन चुका है, जिसने हमारी धरती के ऊपर मौजूद उस खाली इलाके को एक व्यस्त और भीड़भाड़ वाले शहर में बदल दिया है।

असली खतरा 1.2 मिलियन से ज्यादा छोटे मलबों से

2022 से 2024 के बीच सैटेलाइट इंटरनेट की दौड़ ने अंतरिक्ष की तस्वीर ही बदल दी। दुनिया भर में इंटरनेट पहुंचाने के लिए हजारों छोटे सैटेलाइट्स तेजी से लॉन्च हुए और कुल संख्या करीब 22,000 से 28,000 के पार पहुंच गई। यूरोपियन स्पेस एजेंसी (European Space Agency) के अनुसार 2026 में अंतरिक्ष इतना भीड़भाड़ वाला हो चुका है कि हर नई सैटेलाइट भेजने से पहले टक्कर का खतरा बड़ा सवाल बन गया है।

इस समय करीब 40,000 वस्तुओं पर नजर रखी जा रही है, जिनमें लगभग 11,000 सक्रिय सैटेलाइट्स हैं, लेकिन असली खतरा उन 1.2 मिलियन से ज्यादा छोटे मलबों से है जो 1 सेंटीमीटर से बड़े हैं और भारी नुकसान कर सकते हैं। खासतौर पर 550 किमी की ऊंचाई वाली लो-अर्थ ऑर्बिट में मलबा और सैटेलाइट्स लगभग बराबर हो चुके हैं, जबकि अब एक बड़ा हिस्सा 500 किमी से भी कम ऊंचाई पर काम कर रहा है।

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