# Patrika Special News

Pituitary Gland Tumor: मास्टर ग्लैंड में ‘ट्यूमर’ क्यों बन जाता है, क्या होते हैं इनके साइलेंट लक्षण? डॉक्टर से समझें इसका समाधान

Pituitary Gland Tumor: मटर के दाने जैसी मास्टर ग्लैंड में यह ट्यूमर क्यों बनता है? वरिष्ठ डॉक्टर डॉ. हेमा सिंह ने बताया कि इसके 99 प्रतिशत मामले नॉन-कैंसरस होते हैं। यह समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक देखी जाती है। लगातार सिरदर्द, आंखों की रोशनी धुंधली होना और अचानक हार्मोनल असंतुलन इसके मुख्य 'साइलेंट' लक्षण हैं। वक्त पर सही इलाज के लिए शरीर के इन संकेतों को कभी इग्नोर न करें।

7 min read
जानिए क्यों पिट्यूटरी ट्यूमर के 99% मामले कैंसरमुक्त होते हैं और सही समय पर पहचानना क्यों जरूरी है। (Photo: AI Generated)

Pituitary Gland Tumor : हमारे मस्तिष्क में आंखों के ठीक पीछे, मटर के दाने जितने आकार की एक बेहद छोटी संरचना होती है, जिसे हम पिट्यूटरी ग्लैंड (Pituitary Gland) या पीयूष ग्रंथि कहते हैं। आकार में भले ही यह छोटा लगे, लेकिन आयुर्वेद से लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तक, इसे 'मास्टर ग्लैंड' का दर्जा दिया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह छोटी सी ग्रंथि शरीर के लगभग सभी मुख्य हार्मोन्स (जैसे- ग्रोथ हार्मोन, थायराइड को कंट्रोल करने वाले हार्मोन और रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स) को नियंत्रित करती है। जब किसी व्यक्ति को यह पता चलता है कि उसकी इस मटर के दाने जैसी ग्रंथि में 'ट्यूमर' (गांठ) हो गया है, तो वह डर जाता है। मस्तिष्क के इतने संवेदनशील हिस्से में ट्यूमर होना निश्चित रूप से चिंता का विषय है, लेकिन इसके 'साइलेंट' लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है।

What is Pituitary Tumor : क्या होता हैं पिट्यूटरी ग्लैंड ट्यूमर?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पिट्यूटरी ग्लैंड में होने वाले 99% से अधिक ट्यूमर 'बिनाइन' (नॉन-कैंसरस) होते हैं। इसका मतलब यह है कि ये कैंसर की गांठें नहीं होतीं और ये शरीर के अन्य हिस्सों (जैसे फेफड़ों, लीवर या हड्डियों) में नहीं फैलतीं। ये बहुत धीमी गति से बढ़ते हैं। हालांकि, कैंसर न होने के बावजूद ये खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि इनका बढ़ता आकार मस्तिष्क की नसों पर दबाव डालता है और शरीर के पूरे हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ देता है।

Causes: मटर के दाने जितनी ग्रंथि में ट्यूमर क्यों बनता है?

एंडोक्रिनोलॉजिस्ट्स (हार्मोन विशेषज्ञों) के अनुसार, पिट्यूटरी ट्यूमर होने का कोई एक निश्चित या सटीक कारण अभी तक सामने नहीं आया है। हालांकि, आणविक जीव विज्ञान (Molecular Biology) और जेनेटिक्स के आधार पर इसके पीछे कुछ मुख्य कारण माने जाते हैं।

  • जेनेटिक म्यूटेशन (Genetic Mutations) : हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार पुरानी कोशिकाओं को बदलकर नई कोशिकाएं बनाती हैं। इस प्रक्रिया को नियंत्रित करने का काम कोशिकाओं के भीतर मौजूद DNA करता है। जब पिट्यूटरी ग्लैंड की किसी एक कोशिका के DNA में अचानक कोई गड़बड़ी या 'म्यूटेशन' हो जाता है, तो वह कोशिका शरीर के सिग्नल्स को मानना बंद कर देती है। नतीजा यह होता है कि वह कोशिका अनियंत्रित रूप से विभाजित होने लगती है और धीरे-धीरे एक गांठ या ट्यूमर का रूप ले लेती है।
  • आनुवंशिक विकार (Hereditary Syndromes) : हालांकि यह केवल 5% से 10% मामलों में ही देखा जाता है, लेकिन कुछ लोगों को यह समस्या अपने माता-पिता से विरासत में मिलती है। कुछ खास आनुवंशिक सिंड्रोम इसके लिए जिम्मेदार होते हैं।
  • MEN 1 (Multiple Endocrine Neoplasia, Type 1): यह एक ऐसा वंशानुगत विकार है, जिसमें पिट्यूटरी के साथ-साथ पैराथायराइड और पैंक्रियाज (अग्न्याशय) में भी ट्यूमर बनने की प्रवृत्ति होती है।
  • कार्नी कॉम्प्लेक्स (Carney Complex): यह भी एक दुर्लभ आनुवंशिक स्थिति है जो त्वचा के रंग और विभिन्न ग्रंथियों में ट्यूमर का कारण बनती है।
  • कोशिकाओं की अत्यधिक संवेदनशीलता : चूंकि यह मास्टर ग्लैंड है, इसलिए इसकी कोशिकाएं शरीर की रासायनिक मांगों के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। कभी-कभी हाइपोथैलेमस (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो पिट्यूटरी को नियंत्रित करता है) से मिलने वाले रसायनों का संतुलन बिगड़ने के कारण भी ये कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं।

डॉ. हेमा सिंह के साथ पत्रिका के सवाल-जवाब

जब भी कोई 'ट्यूमर' शब्द सुनता है, तो वह इसे सीधे कैंसर से जोड़ लेता है। पिट्यूटरी ट्यूमर के मामले में यह डर कितना सही है?

आम तौर पर लोग 'ट्यूमर' का मतलब 'कैंसर' समझ लेते हैं, लेकिन पिट्यूटरी ट्यूमर के 99 प्रतिशत से अधिक मामले 'बिनाइन' (नॉन-कैंसरस) यानी गैर-कैंसरयुक्त होते हैं। यह शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं फैलता और न ही जानलेवा होता है। हालांकि, कैंसर न होने के बावजूद इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चूंकि पिट्यूटरी ग्लैंड दिमाग के बेहद संवेदनशील हिस्से में होती है, इसलिए इसका बढ़ता आकार आंखों की नसों पर दबाव डाल सकता है और शरीर का हार्मोनल संतुलन बिगाड़ सकता है। इसलिए डरने की नहीं, बल्कि सही समय पर सही इलाज की जरूरत होती है।

क्या हमारी आधुनिक लाइफस्टाइल, तनाव या खान-पान का भी इस ग्रंथि के असंतुलन से कोई संबंध है?

सीधे तौर पर कहें तो खराब लाइफस्टाइल, तनाव या जंक फूड खाने से पिट्यूटरी ट्यूमर नहीं बनता, इसका मुख्य कारण कोशिकाओं में जेनेटिक बदलाव (DNA म्यूटेशन) ही है। लेकिन, अत्यधिक मानसिक तनाव और असंतुलित खान-पान हमारे हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) को प्रभावित करते हैं, जो सीधे पिट्यूटरी ग्लैंड को सिग्नल्स भेजता है। इसके कारण हॉर्मोन्स का संतुलन (जैसे कोर्टिसोल या प्रोलैक्टिन का बढ़ना) बिगड़ जाता है। संक्षेप में, मॉडर्न लाइफस्टाइल ट्यूमर तो नहीं बनाती, लेकिन यह शरीर के हार्मोनल सिस्टम को कमजोर जरूर कर देती है, जिससे पहले से मौजूद ट्यूमर के लक्षण और गंभीर हो सकते हैं।

अगर किसी मरीज को 'फंक्शनिंग पिट्यूटरी ट्यूमर' (Functioning Tumor) डायग्नोज होता है, तो यह मुख्य रूप से किन-किन हार्मोन्स को प्रभावित करता है?

  • प्रोलेक्टिन हार्मोन की अधिकता (Prolactinoma): यह सबसे आम पिट्यूटरी ट्यूमर है।
  • महिलाओं में: पीरियड्स का अचानक अनियमित होना या पूरी तरह बंद हो जाना, और बिना प्रेग्नेंसी या स्तनपान के भी स्तनों से दूध जैसा सफेद स्राव (Galactorrhea) होना।
  • पुरुषों में: टेस्टोस्टेरोन का स्तर गिर जाना, दाढ़ी-मूंछ के बालों का कम होना, पुरुषों में स्तनों का आकार बढ़ना (Gynecomastia) और कामेच्छा में भारी कमी आना।
  • ग्रोथ हार्मोन की अधिकता (Acromegaly): यदि वयस्कों में यह ट्यूमर ग्रोथ हार्मोन को बढ़ा दे, तो उनकी हड्डियां चौड़ी होने लगती हैं। मरीज के हाथ और पैरों का आकार असामान्य रूप से बढ़ने लगता है (पुरानी अंगूठियां या जूते छोटे होने लगते हैं), चेहरे के फीचर्स भारी हो जाते हैं और जबड़ा बाहर की ओर निकल आता है।
  • ACTH हार्मोन की अधिकता (Cushing's Disease): यह हार्मोन एड्रिनल ग्लैंड को कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) बनाने के लिए उकसाता है। इसके कारण मरीज का वजन तेजी से बढ़ता है, विशेषकर पेट और गर्दन के पीछे (Buffalo Hump), चेहरा गोल और लाल (Moon Face) हो जाता है, और त्वचा पर बैंगनी रंग के स्ट्रेच मार्क्स आ जाते हैं।

इसमें इलाज के मुख्य तरीके क्या है ?

  • दवाइयां (Medical Therapy): प्रोलेक्टिनोमा जैसे ट्यूमर को केवल गोलियों (जैसे कैबरगोलिन) से पूरी तरह सिकोड़ा और ठीक किया जा सकता है, इसमें सर्जरी की जरूरत भी नहीं पड़ती।
  • एंडोस्कोपिक सर्जरी (Transsphenoidal Surgery): आज के समय में बिना सिर खोले, नाक के रास्ते (Endoscopic) एक पतली ट्यूब डालकर ट्यूमर को बेहद सुरक्षित तरीके से बाहर निकाल लिया जाता है। मरीज 2-3 दिनों में घर वापस आ जाता है।
  • रेडिएशन थेरेपी (Stereotactic Radiosurgery): यदि ट्यूमर का कुछ हिस्सा बच जाता है, तो हाई-टार्गेटेड रेडिएशन किरणों (जैसे गामा नाइफ) से उसे नष्ट कर दिया जाता है।
  • मस्तिष्क का MRI स्कैन: यह ट्यूमर के सटीक आकार और स्थिति को देखने का सबसे बेहतरीन जरिया है।
  • ब्लड और यूरिन टेस्ट: इससे यह पता लगाया जाता है कि शरीर में कौन से हार्मोन्स का स्तर असामान्य है।

क्या यह बीमारी पूरी तरह आनुवंशिक (Genetic) है? अगर परिवार में किसी को पिट्यूटरी ट्यूमर रहा हो, तो क्या अगली पीढ़ी को पहले से ही सजग हो जाना चाहिए?

यह बीमारी पूरी तरह आनुवंशिक नहीं है। लगभग 90 प्रतिशत से 95 प्रतिशत मामलों में यह ट्यूमर 'स्पोरेडिक' (Sporadic) होता है, यानी यह किसी को भी अचानक जीन म्यूटेशन के कारण हो सकता है, जिसका परिवार से कोई लेना-देना नहीं होता। केवल 5 से 10 प्रतिशत मामलों में ही यह जेनेटिक होता है, जो MEN 1 (Multiple Endocrine Neoplasia) जैसे दुर्लभ विकारों से जुड़ा होता है। अगर किसी के परिवार में एक से अधिक सदस्यों को पिट्यूटरी या अन्य ग्रंथियों का ट्यूमर रहा हो, तब अगली पीढ़ी को सजग रहना चाहिए और जेनेटिक काउंसलिंग या नियमित ब्लड-हॉर्मोन टेस्ट करवाने चाहिए।

इसके कई लक्षण जैसे थकान, वजन बढ़ना या पीरियड्स का अनियमित होना बहुत सामान्य है, जिन्हें महिलाएं अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं। वे कौन से संकेत हैं जब मरीज को बिना देरी किए एंडोक्रिनोलॉजिस्ट के पास जाना चाहिए?

जब सामान्य दिखने वाले लक्षणों के साथ कुछ गंभीर संकेत जुड़ जाएं, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। पहला और सबसे बड़ा संकेत है- आंखों की रोशनी में अचानक बदलाव आना, जैसे साइड का न दिखना (टनल विजन) या धुंधलापन, क्योंकि यह नस पर दबाव को दर्शाता है। दूसरा, असहनीय और लगातार रहने वाला सिरदर्द जो पेनकिलर से भी ठीक न हो। तीसरा, महिलाओं में बिना प्रेग्नेंसी या स्तनपान के ब्रेस्ट से मिल्क डिस्चार्ज होना और चौथा, अचानक चेहरे का अत्यधिक गोल होना और पेट पर स्ट्रेच मार्क्स आना। ये संकेत सीधे तौर पर पिट्यूटरी की खराबी की ओर इशारा करते हैं।

कई बार यह ट्यूमर किसी दूसरी बीमारी के लिए कराए गए MRI स्कैन में अचानक पकड़ में आता है । ऐसे मामलों में क्या तुरंत इलाज की जरूरत होती है या सिर्फ निगरानी रखी जाती है?

जब कोई ट्यूमर बिना किसी लक्षण के किसी दूसरे कारण (जैसे सिर की चोट या माइग्रेन) से कराए गए MRI में अचानक मिलता है, तो उसे 'इंसिडेंटलोमा' कहते हैं। ऐसे हर मामले में तुरंत इलाज या सर्जरी की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। हम पहले दो चीजें देखते हैं, ट्यूमर का आकार और ब्लड टेस्ट में हार्मोन्स का स्तर। अगर ट्यूमर छोटा है (माइक्रोएडेनोमा, 1 सेमी से कम) और हार्मोन्स सामान्य हैं, तो हम सिर्फ 'वॉचफुल वेटिंग' (निगरानी) की सलाह देते हैं। मरीज को हर 6 या 12 महीने में MRI और ब्लड टेस्ट कराने को कहा जाता है। इलाज की जरूरत तभी होती है जब ट्यूमर बढ़ने लगे या हार्मोन्स बिगड़ने लगें।

यह बीमारी किस आयु वर्ग या जेंडर (पुरुष या महिला) में सबसे ज्यादा देखी जा रही है?

पिट्यूटरी ट्यूमर किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन क्लिनिकल तौर पर यह सबसे ज्यादा 30 से 50 वर्ष की उम्र के वयस्कों (Adults) में डायग्नोज होता है। बच्चों और बुजुर्गों में इसके मामले काफी कम देखे जाते हैं।अगर जेंडर की बात करें, तो महिलाओं में यह समस्या पुरुषों की तुलना में थोड़ी अधिक देखी जाती है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि महिलाओं में प्रोलैक्टिन हार्मोन का संतुलन बिगड़ते ही पीरियड्स का रुकना या अनियमित होना जैसे लक्षण तुरंत सामने आ जाते हैं, जिससे वे जल्दी डॉक्टर के पास पहुंच जाती हैं। इसके विपरीत, पुरुषों में लक्षण (जैसे मांसपेशियों की कमजोरी या कामेच्छा में कमी) बहुत धीरे-धीरे उभरते हैं, इसलिए उनका डायग्नोसिस अक्सर देर से होता है।

'एंडोस्कोपिक नेजल सर्जरी' (नाक के रास्ते होने वाली सर्जरी) ने इस बीमारी के इलाज को कितना आसान और सुरक्षित बना दिया है? क्या इसके बाद सिर पर कोई टांका आता है?

एंडोस्कोपिक नेजल सर्जरी (Transsphenoidal Surgery) ने पिट्यूटरी ट्यूमर के इलाज में क्रांति ला दी है। पहले इसके लिए पूरा सिर खोलना पड़ता था (Craniotomy), लेकिन अब अत्याधुनिक एंडोस्कोप की मदद से हम नाक के रास्ते सीधे ट्यूमर तक पहुंच जाते हैं। इस आधुनिक तकनीक के दो सबसे बड़े फायदे हैं- पहला, इसमें सिर या चेहरे पर एक भी टांका या निशान नहीं आता। दूसरा, यह बेहद सुरक्षित है क्योंकि इसमें मस्तिष्क के स्वस्थ हिस्सों को छुए बिना केवल ट्यूमर को निकाला जाता है। इससे मरीज को दर्द बहुत कम होता है। ब्लीडिंग न के बराबर होती है और मरीज मात्र 2 से 3 दिनों में अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर लौट जाता है।

कुछ ट्यूमर (जैसे प्रोलेक्टिनोमा) केवल दवाइयों से ठीक हो जाते हैं। इसके क्या साइड-इफेक्ट्स होते हैं?

प्रोलेक्टिनोमा (Prolactinoma) के अधिकांश मामलों में दवाइयां इतनी असरदार होती हैं कि ट्यूमर पूरी तरह सिकुड़ जाता है। अच्छी बात यह है कि हर मरीज को ये दवाइयां जिंदगी भर नहीं खानी पड़तीं। अगर 2 से 3 साल तक हार्मोन का स्तर सामान्य रहे और MRI में ट्यूमर गायब हो जाए, तो हम धीरे-धीरे दवा बंद कर देते हैं। शुरुआती दौर में इन दवाओं के कुछ सामान्य साइड-इफेक्ट्स जैसे चक्कर आना, जी मिचलाना (Nausea), सिरदर्द या अचानक ब्लड प्रेशर कम होना देखे जा सकते हैं। लेकिन समय के साथ शरीर इन दवाओं के अनुकूल हो जाता है और ये साइड-इफेक्ट्स खत्म हो जाते हैं।