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छत्तीसगढ़ में मिला निकेल-कॉपर का बड़ा संकेत, महासमुंद बन सकता है देश का नया मिनरल हब

Chhattisgarh Mineral Hub: छत्तीसगढ़ के महासमुंद के भालुकोना क्षेत्र में निकेल, कॉपर और PGE जैसे रेयर मिनरल्स के संकेत मिले हैं। शुरुआती ड्रिलिंग में सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद यह भारत की पहली निकेल-कॉपर-PGE खदान बनने की संभावना जताई जा रही है।

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छत्तीसगढ़ की धरती में मिला ‘भविष्य का खजाना’ (photo source- Patrika)

देवेंद्र गोस्वामी/महासमुंद जिले की धरती के नीचे रेयर मिनरल्स का बड़ा भंडार मिलने के संकेत ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा है। भालुकोना क्षेत्र में हुई शुरुआती ड्रिलिंग में निकेल, कॉपर और प्लैटिनम ग्रुप एलिमेंट्स (PGE) के महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं, जिन्हें भविष्य की सबसे कीमती धातुओं में माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आगे की जांच सफल रही, तो यह भारत की पहली निकेल-कॉपर-PGE खदान बन सकती है। इससे न सिर्फ छत्तीसगढ़ की पहचान बदलेगी, बल्कि रोजगार, उद्योग और निवेश के नए अवसर भी खुलेंगे।

भालुकोना में ड्रिलिंग से मिले अहम संकेत

जानकारी के मुताबिक, इस परियोजना के लिए बेंगलुरु स्थित Deccan Gold Mines Limited को ड्रिलिंग और खोज कार्य की जिम्मेदारी दी गई थी। कंपनी ने अब तक करीब 1200 मीटर ड्रिलिंग पूरी कर ली है। शुरुआती रिपोर्ट में 60 मीटर से अधिक क्षेत्र में खनिजयुक्त परतें मिलने की पुष्टि हुई है। वैज्ञानिकों को यहां निकेल और कॉपर से जुड़े महत्वपूर्ण सल्फाइड मिनरल्स भी मिले हैं। खास बात यह है कि ड्रिलिंग के पहले ही चरण में सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, जिससे परियोजना को लेकर उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।

क्यों खास हैं निकेल, कॉपर और PGE?

आज के दौर में निकेल और कॉपर को दुनिया की सबसे अहम धातुओं में गिना जाता है। इलेक्ट्रिक वाहन (EV), मोबाइल बैटरी, सोलर पैनल, रक्षा उपकरण और हाईटेक इंडस्ट्री में इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। प्लैटिनम ग्रुप एलिमेंट्स (PGE) का इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, मेडिकल उपकरण और ग्रीन टेक्नोलॉजी में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।

भारत फिलहाल इन महत्वपूर्ण खनिजों के लिए काफी हद तक विदेशों पर निर्भर है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में इस तरह के बड़े भंडार की संभावना देश की रणनीतिक और आर्थिक जरूरतों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत की पहली निकेल-कॉपर-PGE खदान बनने की संभावना

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आगे की जांच और सैंपलिंग में बड़े भंडार की पुष्टि होती है, तो महासमुंद देश के खनिज मानचित्र पर बड़ी पहचान बना सकता है। यह परियोजना भारत की पहली निकेल-कॉपर-PGE खदान के रूप में विकसित हो सकती है, जो देश को क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगी।

ड्रिलिंग का काम होगा तेज

डेक्कन गोल्ड माइंस लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डॉ. हनुमा प्रसाद मोदली ने बताया कि शुरुआती नतीजों ने परियोजना की संभावनाओं को और मजबूत किया है। अब कंपनी ड्रिलिंग और खोज कार्य में तेजी लाएगी, ताकि खनन योग्य संसाधनों का सही आकलन किया जा सके। उन्होंने कहा कि संसाधनों की पुष्टि के बाद माइनिंग लीज की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा, जिससे परियोजना जल्द जमीन पर उतर सके।

महासमुंद की बदल सकती है पहचान

अब तक महासमुंद की पहचान मुख्य रूप से कृषि और व्यापारिक गतिविधियों के लिए रही है, लेकिन रेयर मिनरल्स के संकेत मिलने के बाद यह जिला देश के महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्रों में शामिल हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे इलाके में बड़े उद्योग, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के नए रास्ते खुलेंगे।

स्थानीय युवाओं के लिए बढ़ेंगे रोजगार के अवसर

खनन परियोजना के आगे बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के बड़े अवसर पैदा होने की संभावना है। खदान, परिवहन, मशीनरी, निर्माण और सहायक सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

ऊर्जा संक्रमण में बढ़ेगी छत्तीसगढ़ की भूमिका

वैश्विक स्तर पर ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिफिकेशन की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी तकनीक की बढ़ती मांग के चलते निकेल और कॉपर जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की जरूरत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में खनिज संपन्न छत्तीसगढ़ भविष्य में देश की ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

सरकार ने जारी किया कंपोजिट लाइसेंस

राज्य सरकार ने 1 अप्रैल 2025 को इस ब्लॉक के लिए कंपोजिट लाइसेंस जारी किया था, जिसमें प्रॉस्पेक्टिंग से लेकर माइनिंग तक की अनुमति शामिल है। इससे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महासमुंद में बड़े पैमाने पर रेयर मिनरल्स की पुष्टि होती है, तो यह केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की आर्थिक और औद्योगिक दिशा बदलने वाली खोज साबित हो सकती है।

माइनिंग तक की प्रक्रिया को मिली गति

महासमुंद का भालुकोना क्षेत्र लंबे समय से खनिज संभावनाओं के लिए चर्चा में रहा है। भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में यहां अल्ट्रामैफिक चट्टानों और सल्फाइड मिनरल्स की मौजूदगी के संकेत पहले भी मिले थे, जिसके बाद विस्तृत जांच और ड्रिलिंग की प्रक्रिया शुरू की गई। इसी कड़ी में बेंगलुरु की डेक्कन गोल्ड माइंस लिमिटेड को क्षेत्र में निकेल, कॉपर और प्लैटिनम ग्रुप एलिमेंट्स (PGE) की संभावनाओं की खोज का जिम्मा सौंपा गया।

भारत फिलहाल निकेल और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सोलर एनर्जी, रक्षा और हाईटेक उद्योगों में इन धातुओं की बढ़ती जरूरत के कारण केंद्र और राज्य सरकारें अब देश में नए खनिज स्रोत तलाशने पर जोर दे रही हैं।

इसी रणनीति के तहत छत्तीसगढ़ जैसे खनिज संपन्न राज्यों में रेयर मिनरल्स की खोज को प्राथमिकता दी जा रही है। राज्य सरकार ने 1 अप्रैल 2025 को भालुकोना ब्लॉक के लिए कंपोजिट लाइसेंस जारी किया था, जिससे प्रॉस्पेक्टिंग से लेकर माइनिंग तक की प्रक्रिया को गति मिली। शुरुआती ड्रिलिंग में मिले सकारात्मक संकेतों ने अब इस परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बना दिया है।

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