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Thai Boxing Gold Medalist: बचपन में उठा पिता का साया, लेकिन नहीं टूटा हौसला… बेटी बनी गोल्डन गर्ल

Priyanka Sahu Thai Boxing: रायपुर की खिलाड़ी प्रियंका साहू ने हैदराबाद में आयोजित नेशनल थाई बॉक्सिंग प्रतियोगिता में दो गोल्ड मेडल जीतकर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया।

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प्रियंका साहू ने हैदराबाद में जीते दो गोल्ड (photo source- Patrika)

प्रियंका साहू ने हैदराबाद में जीते दो गोल्ड (photo source- Patrika)

Thai Boxing Gold Medalist: रायपुर के गंगानगर भनपुरी की रहने वाली प्रियंका साहू की कहानी सिर्फ खेल की जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की मिसाल है। बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया। वर्ष 2005 में पिता के निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। चार बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी अकेले मां के कंधों पर आ गई।

मां नीरा साहू ने मजदूरी कर बेटियों को पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और कभी हिम्मत नहीं हारी। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन सपने बड़े थे। इन्हीं सपनों को साकार करने की ठानी सबसे छोटी बेटी प्रियंका ने।

Thai Boxing Gold Medalist: तंग हालात, लेकिन सपनों में नहीं आई कमी

पिता की मौत के बाद जहां कई बच्चे टूट जाते हैं, वहीं प्रियंका ने हालातों को अपनी ताकत बना लिया। घर चलाने के लिए मां दिन-रात मेहनत करती रहीं और प्रियंका खेल के मैदान में पसीना बहाती रहीं। थाई बॉक्सिंग जैसा कठिन खेल चुनना आसान नहीं था, लेकिन उनके जज्बे के आगे मुश्किलें छोटी पड़ गईं। कोच अनीश मेमन के मार्गदर्शन में उन्होंने लगातार अभ्यास किया। कई बार संसाधनों की कमी आड़े आई, लेकिन परिवार और रिश्तेदारों के सहयोग से उन्होंने सफर जारी रखा।

हैदराबाद में लहराया परचम

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में आयोजित नेशनल थाई बॉक्सिंग प्रतियोगिता में प्रियंका ने दो स्वर्ण पदक जीतकर न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर दिया। यह जीत सिर्फ मेडल की नहीं, बल्कि संघर्षों पर जीत की कहानी है।

प्रियंका ने प्रतियोगिता में जाने से पहले भरोसा दिलाया था कि वह गोल्ड मेडल जीतकर ही लौटेंगी। उन्होंने अपना वादा निभाया। आज जब वह मेडल गले में पहनकर घर लौटीं, तो मां की आंखों में खुशी के आंसू थे।

बेटियां बोझ नहीं, परिवार की ताकत हैं…

Thai Boxing Gold Medalist: प्रियंका की कहानी यह साबित करती है कि बेटियां भी परिवार का नाम रोशन करने में कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती हैं। कठिन परिस्थितियां अगर हौसले को नहीं तोड़ पातीं, तो वही हालात इंसान को और मजबूत बना देते हैं। अब प्रियंका का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलकर देश और प्रदेश का नाम ऊंचा करना है। उनकी यह यात्रा हर उस बेटी के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किलों के बावजूद अपने सपनों को उड़ान देना चाहती है।

खेल के प्रति समर्पण और वादा पूरा

थाई बॉक्सिंग में करियर बनाना आसान नहीं था, लेकिन प्रियंका ने हर मुश्किल को चुनौती की तरह लिया। सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले उन्होंने रायपुर नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी से सहायता की अपील की थी। स्थिति को समझते हुए उन्होंने तुरंत मदद का आश्वासन दिया। कहा जाता है कि जब प्रियंका के पास प्रतियोगिता में जाने के लिए किराया तक नहीं था, तब 13,500 रुपये गुपचुप तरीके से उस बिटिया को दे दिए गए, ताकि उसका सपना अधूरा न रह जाए। इस सहयोग ने प्रियंका का हौसला और मजबूत कर दिया।

प्रियंका ने तब भरोसा दिलाया था कि वह गोल्ड मेडल जीतकर ही लौटेंगी — और उन्होंने अपना वादा निभाया। अपनी मेहनत, लगन और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने न सिर्फ स्वर्ण पदक जीता, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि सच्ची लगन और सही समय पर मिला सहयोग किसी भी सपने को साकार कर सकता है।

नगर निगम में हुआ सम्मान

जीत के बाद नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने प्रियंका और उनके परिवार को सम्मानित किया। प्रियंका को ग्लव्स, शॉल और ट्रैक सूट भेंट कर सम्मान दिया गया, जबकि उनकी माता को भी शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर प्रियंका ने कहा कि कठिन समय में मिली मदद ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया।

इंटरनेशनल स्तर की तैयारी

प्रियंका अपने कोच अनीश मेमन और टिकेश्वरी साहू सहित अन्य खिलाड़ियों के साथ नेशनल प्रतियोगिता में शामिल हुई थीं। अब उनका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश और प्रदेश का नाम रोशन करना है। प्रियंका साहू की कहानी इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियां भी प्रतिभा को रोक नहीं सकतीं। दृढ़ संकल्प और परिवार के सहयोग से बेटियां भी अपने सपनों को साकार कर नई मिसाल कायम कर रही हैं।