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25 डिसमिल जमीन पर बॉयोफ्लॉक का नया प्रयोग, ग्रामीण युवक बना मत्स्य उद्यमिता की नई मिसाल

Biofloc fish farming: छत्तीसगढ़ में बॉयोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन ग्रामीण युवाओं के लिए लाभकारी व्यवसाय बन रहा है। कम पानी और कम भूमि में अधिक उत्पादन से किसानों की आय बढ़ रही है।

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बॉयोफ्लॉक मछली पालन (photo source- Patrika)

बॉयोफ्लॉक मछली पालन (photo source- Patrika)

Biofloc fish farming: छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना गांव के युवाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते खोल रही है। कोरबा जिले के बरमार गांव के रहने वाले संजय सुमन ने मॉडर्न बायोफ्लॉक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके, कम जमीन और संसाधनों के साथ मछली पालन को एक फायदेमंद बिजनेस में बदलकर सफलता की मिसाल कायम की है, जिससे उन्हें हर साल ₹320,000 का नेट प्रॉफिट हो रहा है।

आधुनिक तकनीक से आत्मनिर्भरता की ओर

छत्तीसगढ़ में मछली पालन को मॉडर्न टेक्नोलॉजी के साथ जोड़कर, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना गांव के युवाओं के लिए रोज़ी-रोटी का एक मज़बूत और भरोसेमंद ज़रिया बन रही है। कोरबा ज़िले के करतला डेवलपमेंट ब्लॉक के बड़मार गांव के रहने वाले संजय सुमन, कम रिसोर्स के बावजूद ज़्यादा प्रोडक्शन और बेहतर इनकम की मिसाल हैं। उन्होंने बायोफ्लॉक टेक्नोलॉजी अपनाकर मछली पालन को एक सफल और फ़ायदेमंद बिज़नेस में बदल दिया है।

सीमित भूमि, अधिक उत्पादन

संजय सुमन ने अपनी प्राइवेट ज़मीन के सिर्फ़ 25 डेसिमल पर बायोफ़्लोक तालाब बनाया। इस मॉडर्न टेक्नोलॉजी में एक खास लाइनर बिछाकर तालाब को कंट्रोल्ड माहौल में पानी से भरा जाता है, जिससे मछलियों के लिए सही हालात बनते हैं। तेज़ी से बढ़ने वाली, एडवांस्ड मछली की किस्में पाली जाती हैं, जिससे कम समय में ज़्यादा प्रोडक्शन हो पाता है।

बायोफ़्लोक टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि यह कम पानी और कम ज़मीन में भी पारंपरिक तालाबों से कई गुना ज़्यादा प्रोडक्शन कर सकती है। इसीलिए किसान साल में दो बार कटाई करके अपनी इनकम काफ़ी बढ़ा सकते हैं।

शासन की योजना बनी संबल

संजय सुमन को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत सरकार से ₹840,000 की ग्रांट मिली। इस फाइनेंशियल मदद और टेक्निकल गाइडेंस से, उन्होंने मॉडर्न टेक्नोलॉजी पर आधारित मछली पालन शुरू किया। इस स्कीम के तहत मिली ट्रेनिंग और सलाह ने उन्हें कमर्शियली आत्मनिर्भर बनने में मदद की।

आंकड़ों में सफलता की कहानी

पिछले साल, संजय सुमन के बायोफ्लोक तालाब में लगभग 6 मीट्रिक टन मछली पैदा हुई। मछलियों को बाज़ार में बेचने से कुल ₹720,000 की कमाई हुई। प्रोडक्शन कॉस्ट घटाने के बाद, उन्होंने ₹320,000 का नेट प्रॉफ़िट कमाया, जो ग्रामीण इलाकों में सेल्फ़-एम्प्लॉयमेंट का एक बड़ा उदाहरण है।

भविष्य की बड़ी योजना

अपनी सफलता से उत्साहित होकर, संजय सुमन अब आने वाले साल में प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ाकर अपनी इनकम दोगुनी करने के प्लान पर काम कर रहे हैं। उनका मानना ​​है कि सरकारी स्कीमों और टेक्निकल गाइडेंस के सही इस्तेमाल से, पारंपरिक खेती के साथ-साथ एक्वाकल्चर भी किसानों और युवाओं के लिए एक टिकाऊ और फायदेमंद बिज़नेस बन सकता है।

युवाओं के लिए प्रेरणा

संजय सुमन की सफलता सिर्फ़ एक अपनी कहानी नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण युवाओं के लिए आत्मनिर्भर भारत की ओर एक मज़बूत संदेश है। उनकी पहल इलाके के दूसरे किसानों और युवाओं को मॉडर्न टेक्नोलॉजी अपनाने और सेल्फ़-एम्प्लॉयमेंट करने के लिए प्रेरित कर रही है।

संजय सुमन ने कहा कि मेरे पास ज्यादा जमीन नहीं थी, इसलिए मैं कुछ ऐसा करना चाहता था जिसमें कम जगह में अच्छा मुनाफा हो। बॉयोफ्लॉक तकनीक के बारे में जानकारी मिली और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से सहयोग मिला। तकनीकी प्रशिक्षण लेकर मैंने पानी की गुणवत्ता और फीड पर खास ध्यान दिया। आज इसी तकनीक से मुझे साल भर की आमदनी हो रही है और गांव में रहकर ही रोजगार मिल रहा है। मेरा मानना है कि अगर युवा सही जानकारी और मेहनत के साथ आगे आएं, तो गांव से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

जानें क्या है बॉयोफ्लॉक ?

बॉयोफ्लॉक एक आधुनिक और वैज्ञानिक मछली पालन तकनीक है, जिसमें तालाब या टैंक के पानी में मौजूद अपशिष्ट (मछलियों का मल, बचा हुआ चारा) को उपयोगी प्रोटीन में बदल दिया जाता है। इस तकनीक में पानी में लाभकारी सूक्ष्मजीव (बैक्टीरिया) विकसित किए जाते हैं, जिन्हें फ्लॉक कहा जाता है।

बॉयोफ्लॉक कैसे काम करता है?

टैंक/तालाब में लगातार एरेशन (ऑक्सीजन सप्लाई) दी जाती है

पानी में कार्बन स्रोत (जैसे गुड़, आटा, चोकर) मिलाया जाता है

इससे लाभकारी बैक्टीरिया बढ़ते हैं

ये बैक्टीरिया गंदगी और अमोनिया को खाकर फ्लॉक बनाते हैं

मछलियां इन्हीं फ्लॉक को खाकर अतिरिक्त पोषण प्राप्त करती हैं

बॉयोफ्लॉक तकनीक के फायदे

कम पानी की जरूरत

कम भूमि में अधिक उत्पादन

चारे की लागत में कमी

पानी बार-बार बदलने की जरूरत नहीं

तेजी से मछलियों की वृद्धि

वर्ष में 2–3 बार उत्पादन संभव