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Acid Attack Law: एसिड अपराधियों पर असाधारण दंड की जरूरत

एसिड की शिकार लड़कियां अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं, पर उनका मौन यही प्रश्न पूछता है कि क्यों एसिड अटैक करने वाले भयभीत नहीं हैं? क्या वे कानून की उन गलियों से परिचित हैं जो बच निकलने के रास्ते मजबूती से तैयार कर देती हैं या फिर कानून इतना सख्त नहीं है कि जो उन्हें डरा सके?

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 16, 2026

Supreme Court Acid Attack Verdict

क्यों एसिड अटैक करने वाले भयभीत नहीं हैं?

डॉ. ऋतु सारस्वत - समाजशास्त्री एवं स्तंभकार,

हाल में 'शाहीन मलिक बनाम भारत संघ' मामले में एसिड अटैक के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने प्रतिरोधक सिद्धांत (डिटरेंस थ्योरी) की प्रभावशीलता पर चिंता जताते हुए सुझाव दिया कि पीडि़त को मुआवजा देने के लिए दोषी अभियुक्तों की संपत्ति कुर्क की जानी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति एसिड अटैक का दोषी पाया जाता है, तो उसकी अचल संपत्तियां क्यों न अधिग्रहित कर पीडि़त को मुआवजा दिया जाए? असाधारण दंडात्मक कदम उठाने होंगे। जब तक कार्रवाई कठोर और पीड़ादायक नहीं होगी, तब तक यहां डिटरेंस थ्योरी लागू नहीं होगी।

उल्लेखनीय है कि 2009 में, 26 वर्षीय शाहीन पर उनके कार्यस्थल के बाहर तेजाब से हमला किया गया था। 42 वर्षीय शाहीन पर 26 वर्ष की आयु में एसिड अटैक हुआ था और 16 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद भी वह आपराधिक मुकदमे के निपटारे का इंतजार कर रही हैं। निचली अदालत ने हमलावरों को बरी कर दिया था और उनकी अपील दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित है, हालांकि उन्होंने मामले पर शीघ्र निर्णय लेने का अनुरोध किया है। शाहीन मलिक की जनहित याचिका पर अपने आदेश में शीर्ष न्यायालय ने कहा कि हम हाईकोर्ट से अनुरोध करते हैं कि वे एसिड अटैक से संबंधित मामलों को समयबद्ध तरीके से और प्राथमिकता के आधार पर तेजी से निपटाने के लिए निर्णय लेने की वांछनीयता पर विचार करें।

सभी राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों को निर्देश दिया जाता है कि वे एसिड अटैक पीडि़तों के पुनर्वास, मुआवजे या मेडिकल सहायता के लिए उनके द्वारा लागू की गई योजनाओं, यदि कोई हो, को प्रस्तुत करें। न्यायालय ने केंद्र सरकार को एसिड अटैक करने वाले अपराधियों के विरुद्ध सजा को सख्त बनाने पर विचार करने का परामर्श देते हुए कहा, 'कुछ कानूनी दखल के बारे में सोचें… यह दहेज हत्या से कम गंभीर नहीं है।'

गौरतलब है कि एसिड हमले की पीडि़ता लक्ष्मी अग्रवाल की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में एसिड की बिक्री को लेकर फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एसिड बेचने वाले प्रतिष्ठानों को ऐसा करने के लिए अनिवार्य रूप से लाइसेंस की आवश्यकता होगी और जहर अधिनियम के तहत पंजीकृत कराना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया था कि ऐसी दुकानों के मालिकों को एसिड खरीदने वाले ग्राहकों से एक पहचान पत्र मांगना होगा और उनसे एसिड खरीदने का कारण पूछना होगा। कोर्ट ने कहा था कि ऐसी दुकानों को अपने स्टॉक और एसिड की बिक्री का एक रजिस्टर भी बनाए रखने की जरूरत है।

उस याचिका पर फैसले के बाद सरकार ने भारतीय दंड संहिता में 326 ए और 326 बी धाराएं जोड़ी थीं। इन धाराओं के तहत एसिड हमले को गैर-जमानती अपराध मानते हुए इसके लिए न्यूनतम दस साल की सजा का प्रावधान रखा गया था। दुनिया का शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां पितृसत्तात्मक व्यवस्था अपने क्रोध, ईष्र्या, घृणा का प्रतिकार महिलाओं पर इस प्रकार हिंसात्मक व्यवहार के रूप में न निकालती हो। इंग्लैंड की केटी पाइपर की किताब 'ब्यूटीफुल' एसिड पीडि़तों के दर्द को बखूबी बयां करती है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008 में केटी पर उनके पूर्व साथी ने एसिड डाला था। केटी लिखती हैं कि मैंने एक भयानक चीख सुनी- ऐसी जैसे किसी जानवर को काटा जा रहा हो। फिर मुझे अहसास हुआ कि वह चीख मेरी ही थी। केटी के प्लास्टिक सर्जन ने कहा कि उसने अपने पूरे कॅरियर में केटी से अधिक भयावह रासायनिक जलन से झुलसा हुआ चेहरा कभी नहीं देखा। उसकी बायीं आंख की रोशनी चली गई, उसका अधिकांश बायां कान नष्ट हो गया, नाक का बड़ा हिस्सा गल गया, पलकें समाप्त हो गईं और तेजाब निगल जाने के कारण उसकी अन्ननली स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गई, जिसके चलते वह लंबे समय तक ठोस भोजन नहीं कर सकी।

केटी की कहानी एक खुशहाल और आशावादी बचपन से शुरू होती है, फिर ब्रिटेन में मीडिया हस्ती बनने के उसके प्रयासों, उसके चेहरे के भयावह विनाश और विकृति, प्रारंभिक अवस्था में मृत्यु की कामना, दर्जनों शल्य-चिकित्साओं, पुरुषों के प्रति गहरे भय और तीव्र सामाजिक एकांत-भय, अपने स्वरूप को पुन: प्राप्त करने के संघर्ष और अंतत: पुनर्निर्मित चेहरे को स्वीकार करने तथा सहायता करने वालों के प्रति कृतज्ञता तक पहुंचती है।

यह कहानी सिर्फ केटी की नहीं है, बल्कि भारत की लक्ष्मी अग्रवाल, ईरान की अमेनेह बहृमि, इटली की लूसिया एनिबली और कोलंबिया की नतालिया पोंसे दे लियोन की भी है। ये वे नाम हैं जिन्होंने अपनी अंतहीन पीड़ा को व्यक्तिगत नहीं रहने दिया। नतालिया के सतत सार्वजनिक और विधायी प्रयासों के परिणामस्वरूप कोलंबिया की संसद ने वर्ष 2016 में 'लेय नतालिया पोंसे दे लियोन' पारित किया। इस कानून के माध्यम से एसिड अटैक को स्वतंत्र और जघन्य अपराध के रूप में परिभाषित किया गया तथा दोषियों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया।

भारत में भी एसिड अटैक पीड़ित महिलाओं ने अपने संघर्ष को मौन पीड़ा में नहीं बदला। आगरा स्थित 'शीरोज हैंगआउट' वे महिलाएं संचालित करती हैं, जिनके चेहरों पर हिंसा के निशान हैं, पर आत्मसम्मान अक्षुण्य है। समाज में एक बार फिर से सभी को यह संदेश दे रही हैं कि जिन अपराधियों ने उनके साथ ऐसी घटना की है, उससे इनके हौसले टूटे नहीं हैं। ये फिर से खुद को खड़ा कर अपने हौसलों को उड़ान दे रही हैं। एसिड की शिकार लड़कियां अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं, परंतु उनका मौन हर बार यही प्रश्न पूछता है कि क्यों एसिड अटैक करने वाले भयभीत नहीं हैं? क्या वे कानून की उन गलियों से बखूबी परिचित हैं, जो उनको बच निकलने के रास्ते बड़ी मजबूती से तैयार कर देती हैं या फिर कानून इतना सख्त नहीं है, जो उन्हें भयभीत कर सके?