
गेहूं-चावल पर निर्भरता के कारण पोषण असंतुलन बढ़ा है।
प्रियंक कानूनगो - सदस्य, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
शिवानी सिंह - सहायक प्रोफेसर (एसजीटी विवि),
भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) दुनिया के सबसे बड़े खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों में से एक है, जिसके तहत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम ग्रामीण आबादी के लगभग 75 प्रतिशत और शहरी आबादी के 50 प्रतिशत तक को सब्सिडी दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था करता है और प्राथमिकता परिवारों को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम अनाज का अधिकार प्रदान किया गया है।
यह व्यवस्था भूख से सुरक्षा देने और न्यूनतम खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, किंतु बेहतर और संतुलित पोषण की दृष्टि से यह अब भी पर्याप्त नहीं है, विशेषकर उस स्थिति में जब भारत में कुपोषण एक व्यापक और गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्व के कुल कुपोषित लोगों में लगभग एक-तिहाई भारत में निवास करते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि केवल कैलोरी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि खाद्य टोकरी की गुणवत्ता पर भी गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। ऐसे संदर्भ में मिलेट्स, जिन्हें अब 'श्री अन्न' के रूप में नई पहचान दी गई है, एक बेहतर और उपयोगी विकल्प के रूप में सामने आते हैं।
पोषण की दृष्टि से 'श्री अन्न' गेहूं और पॉलिश किए हुए चावल की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध माने जाते हैं, क्योंकि इनमें कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स, अधिक फाइबर तथा आवश्यक पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इन गुणों के कारण यह रक्त शर्करा के बेहतर नियंत्रण, मोटापे के जोखिम में कमी और पाचन स्वास्थ्य में सुधार जैसे लाभ प्रदान करते हैं, फिर भी गौर करने वाली बात यह है कि भारत में इनका उपभोग 1960 के दशक में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष लगभग 30.1 किलोग्राम से घटकर 2022 में 3.9 किलोग्राम से भी कम रह गया है। आहार संबंधी इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण हरित क्रांति के दौरान चावल और गेहूं के उत्पादन, समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद पर दिया गया नीतिगत जोर रहा, जबकि पीडीएस के माध्यम से मुख्य रूप से इन्हीं दो अनाजों का नियमित वितरण होने से उपभोक्ताओं की खाद्य आदतें भी धीरे-धीरे उन्हीं पर केंद्रित हो गईं।
इस व्यवस्था का प्रभाव केवल उपभोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों की फसल पद्धति भी सरकारी खरीद के अनुरूप बदलती चली गई, जिसके परिणामस्वरूप 'श्री अन्न' जैसी परंपरागत और जलवायु-अनुकूल फसलें कृषि परिदृश्य से लगातार पीछे हटती गईं। सिर्फ जागरूकता अभियानों से इस स्थिति को बदलना संभव नहीं है, क्योंकि जनस्वास्थ्य की मौजूदा हालत ज्यादा व्यापक है और ठोस कदमों की मांग करती है। अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान के विश्लेषण के अनुसार यदि 20 करोड़ पीडीएस लाभार्थी प्रतिवर्ष केवल एक किलोग्राम चावल के स्थान पर 'श्री अन्न' का उपयोग करें, तो देश लगभग 1.37 अरब डॉलर की बचत कर सकता है।
'श्री अन्न' को तुरंत चावल और गेहूं के स्थान पर पूरी तरह प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि चरणबद्ध और सुविचारित रणनीति तरीके से इसे लागू किया जा सकता है। शुरुआत में प्रति परिवार प्रति माह 1-2 किलोग्राम 'श्री अन्न' मौजूदा राशन के साथ प्रदान किया जा सकता है। जिन राज्यों में उत्पादन अधिक है, वे पहले इसे शुरू कर सकते हैं। इससे दूसरे राज्यों को खरीद, भंडारण और वितरण की प्रक्रिया समझने में मदद मिलेगी। साथ ही, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद से किसानों को बाजार का भरोसा मिलेगा और स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण सुविधाएं बनने से यह आसानी से पकाने और उपयोग करने लायक रूप में उपलब्ध हो सकेगा।
'श्री अन्न' को बढ़ावा देना अतीत की ओर लौटने का प्रयास नहीं है, बल्कि वर्तमान की पोषण, कृषि व जलवायु संबंधी चुनौतियों के बीच संतुलित और व्यावहारिक समाधान की दिशा में कदम है। क्योंकि पीडीएस केवल अनाज बांटने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह लोगों के खाने की आदतों, किसानों की खेती के तरीकों और देश की पूरी खाद्य प्रणाली की दिशा को भी प्रभावित करता है। अब जरूरत इस बात की है कि इन्हें राष्ट्रीय खाद्य टोकरी का स्थायी हिस्सा बनाया जाए और हर पीडीएस लाभार्थी तक पहुंचाया जाए।
Published on:
16 Feb 2026 03:36 pm
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