
निजी जानकारी अनावश्यक रूप से साझा न करें, मजबूत पासवर्ड रखें
डीपफेक से फैलने वाली भ्रामक जानकारी समाज और देश के माहौल को प्रभावित कर सकती है। इसलिए कानूनी, तकनीकी और व्यवहारिक स्तर पर समन्वित प्रयास जरूरी हैं। एआई से तैयार सामग्री पर वॉटरमार्क या मेटाडेटा अनिवार्य किया जाए, ताकि उसकी पहचान संभव हो सके। संदिग्ध फोटो और वीडियो की जांच के लिए रिवर्स इमेज सर्च जैसे साधनों का उपयोग बढ़ाया जाए। सक्रिय मॉडरेशन तकनीक से फर्जी कंटेंट को वायरल होने से पहले हटाया जा सकता है। साथ ही नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। निजी और उच्च गुणवत्ता की तस्वीरें अनावश्यक रूप से साझा न करें और किसी भी संदिग्ध सामग्री की तुरंत रिपोर्ट करें। - लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़
डीपफेक कंटेंट मुख्य रूप से दो तरह का होता है- वीडियो और ऑडियो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से किसी व्यक्ति की शक्ल या आवाज में बदलाव कर ऐसा कंटेंट तैयार कर दिया जाता है, जो देखने-सुनने में असली लगे, लेकिन होता पूरी तरह नकली है। कई बार इसका इस्तेमाल भ्रामक या आपत्तिजनक सामग्री फैलाने में किया जाता है। इसे रोकने के लिए सख्त नियम बनाना बेहद जरूरी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए लाइसेंस व्यवस्था और अनुचित सामग्री पर तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही आम लोगों को भी सतर्क रहना होगा। निजी जानकारी अनावश्यक रूप से साझा न करें, मजबूत पासवर्ड रखें और किसी भी साइबर अपराध की तुरंत शिकायत दर्ज कराएं। - निर्मला वशिष्ठ, राजगढ़ (अलवर)
डिजिटल दौर में डीपफेक तकनीक एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। यह सिर्फ तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि ऐसा औजार है जो सच और झूठ की सीमा को धुंधला कर देता है। इससे किसी व्यक्ति की साख को गहरा नुकसान पहुंच सकता है और समाज में भ्रम व अविश्वास फैल सकता है। इसलिए कड़े कानून और सख्त सजा का प्रावधान जरूरी है, ताकि दुरुपयोग करने वालों पर लगाम लग सके। सोशल मीडिया कंपनियों को उन्नत एआई टूल्स से संदिग्ध सामग्री की पहचान कर उसे तुरंत हटाना चाहिए। साथ ही डिजिटल साक्षरता पर जोर देना होगा, ताकि लोग हर वायरल वीडियो या तस्वीर को बिना जांचे-परखे सच न मानें। - शेख आरिफ, गांधीनगर
एआई तकनीक के विस्तार के साथ डीपफेक कंटेंट की संख्या तेजी से बढ़ी है। अब यह समझ पाना मुश्किल होता जा रहा है कि जो हम देख या सुन रहे हैं, वह वास्तविक है या कृत्रिम रूप से तैयार किया गया है। यह स्थिति आम लोगों के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में साइबर विशेषज्ञों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्नत तकनीकी जांच और विश्लेषण के जरिए ही फर्जी वीडियो और ऑडियो की पहचान की जा सकती है। - संजय डागा, इन्दौर
तकनीक ने संचार को आसान बनाया है, लेकिन इसके दुरुपयोग ने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। डीपफेक के जरिए बनाए गए नकली वीडियो और ऑडियो किसी व्यक्ति की छवि खराब कर सकते हैं और समाज में अविश्वास पैदा कर सकते हैं। इसकी रोकथाम के लिए सरकार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और मीडिया संस्थानों को मिलकर काम करना होगा। फर्जी सामग्री की त्वरित पहचान और उसे हटाने की प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। साथ ही दोषियों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। आम नागरिकों को भी बिना सत्यापन के कोई वीडियो या खबर साझा नहीं करनी चाहिए। जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार ही इस समस्या से निपटने का मजबूत आधार बन सकता है। - डॉ. दीपिका झंवर, जयपुर
डीपफेक से निपटने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना जरूरी है। आपत्तिजनक या फर्जी सामग्री को तय समयसीमा में हटाने का स्पष्ट नियम होना चाहिए। एआई से तैयार कंटेंट पर स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य किया जाए, ताकि दर्शक समझ सकें कि सामग्री कृत्रिम है। लोगों को भी डीपफेक पहचानने के तरीके सीखने होंगे और अपने परिवार व दोस्तों को जागरूक करना होगा। 'भरोसा करें, लेकिन जांच जरूर करें' जैसी आदत विकसित करना समय की जरूरत है। निजता सेटिंग्स की नियमित जांच और संदिग्ध सामग्री की रिपोर्टिंग से भी इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। - प्रवेश भूतड़ा, सूरत
डीपफेक पर प्रभावी रोक के लिए कानूनों को समय के अनुसार सशक्त बनाना होगा। दोषियों पर त्वरित और कड़ी कार्रवाई का प्रावधान हो, ताकि संदेश जाए कि इस तरह की हरकत बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की स्पष्ट जवाबदेही तय हो और फर्जी सामग्री हटाने की पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाए। तकनीकी निगरानी को भी मजबूत बनाना आवश्यक है। इसके साथ ही नागरिकों को डिजिटल साक्षरता दी जानी चाहिए, ताकि वे सच और झूठ के बीच फर्क समझ सकें। जब तकनीक का जिम्मेदारी से उपयोग होगा, तभी समाज में विश्वास कायम रह सकेगा। - राकेश खुडिया, श्री गंगानगर
Published on:
16 Feb 2026 04:37 pm
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