
Karpoor Chandra Kulish Birth Centenary
Karpoor Chandra Kulish Birth Centenary: युगद्रष्टा और राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्म शताब्दी केवल एक शीर्ष पत्रकार की जयंती भर नहीं है, बल्कि यह उस युगद्रष्टा के स्मरण का पावन अवसर है, जिसने भारतीय पत्रकारिता, भाषा और समाज को एक नई और स्पष्ट दिशा दी। राजस्थान के टोंक जिले के सोडा गांव में जन्मे कुलिश जी (जिन्हें बचपन में प्यार से 'कोका' कहा जाता था) का जीवन एक निरंतर बहती नदी के समान था। उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम भी 'धाराप्रवाह' रखा था, जो उनके जीवन और उनकी भाषा, दोनों की अबाध गति को चरितार्थ करता है। पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में उनके अवदान से पूरा देश परिचित है, लेकिन भाषा के प्रति उनका मौलिक दृष्टिकोण, विदेशी मंचों पर भारतीय भाषाओं का शंखनाद और भाषा के माध्यम से आमजन से जुड़ने की उनकी अनूठी कला उन्हें एक असाधारण संचारक बनाती है।
कुलिश जी का मानना था कि भाषा संवाद का सबसे सशक्त सेतु होनी चाहिए, न कि बौद्धिक अहंकार या दिखावे का साधन। उनके दौर की हिंदी पत्रकारिता में अक्सर संस्कृतनिष्ठ और क्लिष्ट शब्दावली का प्रयोग 'विद्वता' का पैमाना माना जाता था, लेकिन कुलिश जी ने इस परिपाटी को पूरी तरह से नकार दिया। उन्होंने अखबार की भाषा को आम आदमी की 'बोलचाल की भाषा' के करीब ला खड़ा किया। उनका तर्क अत्यंत व्यावहारिक और सीधा था, 'एक अखबार को सड़क पर खड़ा रिक्शा चालक भी पढ़ता है और विश्वविद्यालय का कुलपति भी। भाषा ऐसी होनी चाहिए जो बिना किसी भारी-भरकम शब्दकोश की मदद के, दोनों वर्गों को समान रूप से समझ में आ जाए।'
उनका मानना था कि जब एक आम पाठक अखबार में अपनी टूटी सड़क या पानी की समस्या की खबर अपनी ही रोजमर्रा की भाषा में पढ़ता है, तो उसे एक 'अपनापन' महसूस होता है। यही कारण है कि जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा और निराला जैसे महान साहित्यकारों को गहराई से पढ़ने के बावजूद, कुलिश जी ने अपने लेखन का मूल उद्देश्य 'पाठक को आनंद और सही सूचना' देना ही रखा।
सिनेमा और पत्रकारिता के दो अलग-अलग ध्रुवों के बीच का यह अनछुआ और बेहद दिलचस्प किस्सा कुलिश जी की आत्मकथा 'धाराप्रवाह' में विस्तार से मिलता है। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि 'शोले' फिल्म में 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं' जैसे कालजयी संवादों से दर्शकों को गुदगुदाने वाले और भारतीय सिनेमा के महान हास्य अभिनेता रहे गोवर्धन असरानी ने हिंदी भाषा के शुद्ध उच्चारण और प्रवाह के गुर कर्पूर चन्द्र कुलिश जी से ही सीखे थे। असरानी का मूल संबंध भी जयपुर से ही था। अपनी युवावस्था में, जब असरानी रंगमंच और अभिनय की दुनिया में अपने कदम जमाने की कोशिश कर रहे थे, तब संवाद अदायगी और भाषा की स्पष्टता उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। कुलिश स्वयं शब्दों के जादूगर और भाषा के मर्मज्ञ थे, उन्होंने असरानी को हिंदी भाषा की बारीकियां सिखाईं। कुलिश जी ने उन्हें यह समझाया कि भाषा केवल रटे-रटाए शब्दों का उच्चारण मात्र नहीं है; यह तो भावों की जीवंत अभिव्यक्ति है। उन्होंने असरानी को शब्दों के सही ठहराव, आरोह-अवरोह और वाक्य विन्यास का वह 'धाराप्रवाह' रूप सिखाया, जिसने आगे चलकर असरानी की संवाद अदायगी को बॉलीवुड में सबसे विशिष्ट बना दिया। यह प्रसंग इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि कुलिश जी भाषा को केवल अखबार के पन्नों में कैद नहीं मानते थे, बल्कि उसे कला, सिनेमा और जीवन के हर क्षेत्र का प्राणतत्व मानते थे।
कुलिश जी जब भी विदेशी मंचों पर गए या विदेशी शिष्टमंडलों से संवाद किया, उन्होंने कभी भी अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों को नहीं छोड़ा। पश्चिमी देशों के दौरों पर, जहां आमतौर पर लोग अंग्रेजी के प्रभाव में आ जाते हैं या पश्चिम की नकल करने लगते हैं, उन्होंने बड़े गर्व और आत्मविश्वास के साथ भारतीय भाषाओं, वैदिक दर्शन और संस्कृत के महत्व को विश्व पटल पर रखा। उनका मानना था कि हम ज्ञान प्राप्ति के लिए किसी भी भाषा को सीखें, 'चाहे वह अंग्रेजी हो या कोई अन्य विदेशी भाषा' लेकिन हमारी स्वदेशी भाषाएं ही हमारी संस्कृति का वास्तविक हृदय हैं। विदेशों में भाषा पर बोलते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि 'किसी पिछली या वर्तमान विदेशी प्रणाली से चिपके रहना हमारे लिए अनिवार्य नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम अपनी संस्कृत और मातृभाषाओं का कैसे उपयोग करें ताकि हम अपनी संस्कृति के अंतर्तम तक पहुंच सकें।' कुलिश जी ने विदेशी 'अंधानुकरण' का सदैव सख्त विरोध किया। उनका संदेश था कि वैश्विक मंच पर भारत की पहचान किसी उधार ली गई भाषा से नहीं, बल्कि उसकी अपनी भाषाई विविधता और वैदिक ज्ञान-संपदा से ही स्थापित होगी। विदेशी मंचों से उन्होंने यह उद्घोष किया कि भाषा के बिना संस्कृति जीवित नहीं रह सकती, और जो राष्ट्र अपनी भाषा खो देता है, वह अंततः अपना अस्तित्व ही खो बैठता है।
कुलिश जी ने अपने जीवन में हमेशा 'स्वाध्याय' पर जोर दिया। उनका मानना था कि पत्रकारों और लेखकों में पढ़ने-लिखने की आदत कम नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा था, 'पत्रकार मानव जाति का दैनिक इतिहास लिखता है, ऐसा व्यक्ति अगर पढ़ने के प्रति उदासीन रहेगा तो वह समाज के साथ न्याय नहीं कर पाएगा।' वे भाषा को 'सत्य' के प्रकटीकरण का सबसे मारक अस्त्र मानते थे। उनके लिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद 'नागरिक' का था, और सरल, स्पष्ट भाषा उस नागरिक का सबसे बड़ा हथियार। जब भाषा सत्ता के प्रभाव में आकर झुकने लगती है, तो वह अपना तेज खो देती है। कुलिश जी ने कभी ऐसी भाषा का समर्थन नहीं किया जो चाटुकारिता करे; इसके विपरीत, उनकी भाषा सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने का साहस रखती थी।
कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्म शती हमें यह याद दिलाती है कि एक अकेला व्यक्ति अपने दृढ़ संकल्प, स्वाध्याय और भाषा-प्रेम से कैसे एक पूरे युग को स्पंदित कर सकता है। उनका जीवन 'अस्तित्व से जीवन' तक की एक ऐसी यात्रा है, जो 'धाराप्रवाह' बहती रही और आज भी बह रही है। चाहे वह असरानी जैसे दिग्गज कलाकार को भाषा का ककहरा सिखाना हो, विदेशी धरती पर सीना तानकर भारतीय ज्ञान-परंपरा और स्वदेशी भाषाओं का गौरवगान करना हो, या फिर अपने अखबार की भाषा के माध्यम से एक आम पाठक को यह महसूस कराना हो कि यह 'उसकी अपनी आवाज' है कुलिश जी हर मोर्चे पर खरे उतरे। आज के दौर में जब हम भाषाओं का बाजारीकरण और शब्दों के गिरते स्तर को देखते हैं, तो कर्पूर चन्द्र कुलिश जी का भाषा-दर्शन हमें एक प्रकाश स्तंभ की तरह राह दिखाता है। उनकी जन्म शती पर उन्हें हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अपनी भाषा का सम्मान करें, उसे सहज बनाएँ और उसके माध्यम से समाज में सत्य का प्रवाह निरंतर बनाए रखें।
Published on:
06 Mar 2026 09:58 pm
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