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पितृसत्ता से परिवर्तन तक: स्त्री अस्मिता का उत्कर्ष

समाज में व्याप्त दोहरे मापदंड ही महिलाओं की स्वतंत्रता को हनन करने के लिए उत्तरदायी हैं। दशकों के संघर्ष के बाद महिलाओं ने स्वयं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना शुरू किया है, परंतु इनमें भी उन्हें दोहरी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 06, 2026

डॉ. रानी दुबे - एसो. प्रोफेसर, डॉ. हरिसिंह गौर विवि, सागर (मप्र),

महिलाएं समाज की रचनात्मक शक्ति हैं। समाज में असमानता होना स्वाभाविक है, क्योंकि प्राकृतिक रूप से भी सभी व्यक्ति समान नहीं है। परंतु समाज में व्याप्त असमानता के आधार पर यदि जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है तो वह सामाजिक अन्याय की श्रेणी में आता है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि लिंग के आधार पर भेदभाव का बड़ा कारण यह है कि पुरुष और महिला की भूमिकाओं में निरंकुश तरीकों से विभाजन किया गया है।

सबसे क्रूरतम पहलू कन्या भ्रूण हत्या के रूप में रहा है। जन्म से पहले ही कन्या को जीने के अधिकार से वंचित किया कर दिया जाता था, जो बच जातीं उनका जीवन अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए एक संघर्ष बन जाता। महिलाओं की साक्षरता दर अब भी पुरुषों से कम बनी हुई है। समाज में व्याप्त दोहरे मापदंड ही महिलाओं की स्वतंत्रता को हनन करने के लिए उत्तरदायी हैं। दशकों के संघर्ष के बाद महिलाओं ने स्वयं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना शुरू किया है, परंतु इनमें भी उन्हें दोहरी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है। जिसके परिणामस्वरूप शोध बता रहे हैं कि महिलाओं में हृदय संबंधी बीमारियों में तेजी से वृद्धि हो रही है। महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण के प्रयास काफी तेजी से हो रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि इन सब की रोकथाम के लिए सरकार ने कोई प्रयास नहीं किए, 1994 में कन्या भ्रूण हत्या को कानून बनाकर प्रतिबंधित किया। वहीं बालिका शिक्षा के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही है। महिला साक्षरता दर में भी आशातीत वृद्धि हुई है। 2005 में सरकार द्वारा घरेलू हिंसा कानून बनाया गया, महिलाओं को संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया गया। कार्यस्थल पर महिलाएं स्वतंत्र और सुरक्षित रहें, इसके लिए कार्यस्थल पर यौनशोषण रोकने संबंधी कानून बनाया गया है। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय महिलाओं की स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं और यह परिवर्तन भी स्त्रियों ने ही किए हैं। इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का विषय है 'गिव टू गेन' दान केवल आर्थिक नहीं होता है। दान वास्तव में हमारे योगदान को चिह्नित कराना है।

यह योगदान हम सार्थक सहयोग प्रदान करके किसी भी रूप में दे सकते हैं, चाहे वह पूर्वाग्रहों की चुनौती देकर अपने अंदर के कौशलों को दूसरों से निशुल्क विस्तार करके, अपनी सफलता से किसी को प्रेरित करके। यदि हम स्त्रियां स्वयं का आत्मावलोकन करती हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं ना कहीं पितृसत्तात्मक समाज दोषी तो हैं ही, परन्तु स्त्रियों को भी अपना नजरिया बदलना ही होगा। स्त्रियों के लिए खड़े होना होगा। अगर स्त्री को अपनी अस्मिता और अस्तित्व को सुदृढ़ करना है तो स्त्री को स्त्री के साथ खड़े रहना होगा। तभी महिलाएं आधुनिक युग में अपनी विजय पताका फहरा पाएंगी।