6 मार्च 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जब मंझला व्यापारी मजबूत होगा तभी सशक्त हो पाएगा भारत

प्रशासनिक अधिकारियों के लिए मंझले व्यापारी 'ईजी टारगेट' यानी आसान शिकार होते हैं। बड़े समूहों पर हाथ डालने के लिए 'ऊपर' से अनुमति लेनी पड़ती है और लंबी कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ती है।

3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Mar 06, 2026

विजय गर्ग - आर्थिक विशेषज्ञ, भारतीय एवं विदेशी कर प्रणाली के जानकार

किसी भी राष्ट्र की प्रगति का इंजन उसके व्यापारिक गलियारों से होकर गुजरता है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां जीडीपी में मंझले व्यापारियों का योगदान लगभग आठ प्रतिशत तक है, वहां व्यापारी को 'राष्ट्र निर्माता' का दर्जा मिलना चाहिए। आज का व्यापारिक परिदृश्य एक ऐसे 'पिरामिड' की तरह है, जहां शीर्ष पर बैठे कॉर्पोरेट दिग्गज सुरक्षा के अभेद्य किलों में सुरक्षित हैं और बीच में फंसा 'मंझला व्यापारी' आज व्यवस्था की चक्की में सबसे निर्दयी तरीके से पिसा जा रहा है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि नीति-निर्माण में यह अक्सर 'बीच का खोया हुआ वर्ग' बन जाता है।

छोटे व्यापारियों के लिए सब्सिडी और संरक्षण योजनाएं हैं, जबकि बड़े कॉर्पोरेट समूहों के लिए निवेश प्रोत्साहन और कर रियायतें उपलब्ध हैं, लेकिन मंझले व्यापारियों के लिए समर्पित नीति ढांचा लगभग अनुपस्थित है। यही कारण है कि आर्थिक झटकों जैसे महामारी, बाजार मंदी या नीतिगत बदलाव का सबसे अधिक असर इसी वर्ग पर पड़ता है। मंझले व्यापारिक उद्यम कुल एमएसएमई निर्यात का लगभग 20-25 प्रतिशत हिस्सा संभालते हैं, जबकि राष्ट्रीय निर्यात में इनकी हिस्सेदारी करीब 8-10 प्रतिशत तक पहुंचती है। आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत की उपस्थिति को मजबूत करने में मंझले व्यापारी एक मौन, लेकिन निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

रोजगार सृजन के मामले में मंझले व्यापारियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनुमान है कि यह वर्ग सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से 2.5 से 3 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है। जीएसटी नेटवर्क के आंकड़े इस वर्ग की वास्तविक उपस्थिति को और स्पष्ट करते हैं। लगभग 25 लाख व्यापारी ऐसे हैं, जिनका वार्षिक कारोबार 5 करोड़ रुपए से अधिक है। इनमें से करीब 6 से 7 लाख व्यापारी ऐसे हैं, जिनका टर्नओवर 50 करोड़ रुपए से ऊपर है, जो स्पष्ट रूप से मंझले व्यापारियों की श्रेणी में आते हैं।

अक्सर यह सवाल उठता है कि जब कोई आर्थिक संकट आता है या नियमों का उल्लंघन होता है तो बड़े नामचीन औद्योगिक घरानों के मालिक सलाखों के पीछे क्यों नहीं दिखते? इसका उत्तर केवल 'धन' नहीं, बल्कि 'तंत्र पर पकड़' है। बड़े व्यापारियों के पास विशेषज्ञों, पूर्व नौकरशाहों और नामी वकीलों की एक ऐसी सेना होती है, जो किसी भी सरकारी फाइल के चलने से पहले ही उसके संभावित खतरों को भांप लेती है। प्रशासनिक अधिकारियों के लिए मंझले व्यापारी 'ईजी टारगेट' यानी आसान शिकार होते हैं। बड़े समूहों पर हाथ डालने के लिए 'ऊपर' से अनुमति लेनी पड़ती है और लंबी कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ती है। वहीं, मंझले व्यापारी के पास न तो इतना कानूनी बैकअप होता है और न ही समय। आज भी जमीनी स्तर पर 'इंस्पेक्टर राज' का अंत नहीं हुआ है, बल्कि उसने अपना स्वरूप बदल लिया।

व्यापारियों को एक समान देखने और अनावश्यक उत्पीडऩ रोकने के लिए जवाबदेही का विकेंद्रीकरण जरूरी है। डिजिटल एवं फेसलेस सिस्टम की जरूरत है। मानवीय हस्तक्षेप को पूरी तरह खत्म करना होगा। जांच और ऑडिट का चयन रैंडम तरीके से सॉफ्टवेयर के जरिये होना चाहिए। व्यापारी सुरक्षा कानून आवश्यक है। जिस तरह डॉक्टरों या सरकारी सेवकों के लिए विशेष सुरक्षा कानून हैं, उसी तरह 'राजस्व दाताओं' के लिए भी एक सुरक्षा कानून होना चाहिए। नियमों का सरलीकरण भी होना चाहिए। मंझले व्यापारियों के लिए 'कम्प्लायंस' का बोझ कम होना चाहिए। लोकतंत्र में न्याय तभी सार्थक है, जब वह समाज के हर वर्ग के लिए एक समान हो। उसे 'शिकार' समझने की मानसिकता का अंत होना चाहिए। व्यवस्था को यह समझना होगा कि यदि यह वर्ग टूट गया तो अर्थव्यवस्था का पूरा ढांचा ढह जाएगा। सरकार को चाहिए कि वह 'व्यापारी सम्मान' को केवल नारों तक सीमित न रखे, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही तय कर एक ऐसा माहौल बनाए, जहां व्यापारी डर के साये में नहीं, बल्कि स्वाभिमान के साथ अपना काम कर सके। यदि भारत को वास्तव में एक मजबूत, संतुलित और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनानी है तो मंझले व्यापारियों के लिए विशेष नीति ढांचे, सरल नियमों और वित्तीय सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता को प्राथमिकता देनी होगी।