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संपादकीयः अफवाहों पर ध्यान न दें, सरकार कालाबाजारी रोके

बड़े शहरों में बाहर खाना खाने वालों की संख्या भी करोड़ों में है। इनमें ज्यादातर ऐसे विद्यार्थी या बैचलर नौकरीपेशा हैं जो हॉस्टल्स या पीजी में रहते हैं। इसका असर गिग वर्कर्स पर तो तुरंत दिखने लगा है, जो दिनभर में 25-30 खाने का ऑर्डर पहुंचाकर अपना पेट भरते थे।

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जयपुर

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arun Kumar

Mar 13, 2026

अमरीका- इजरायल व ईरान युद्ध के कारण देश में रसोई गैस सिलेंडरों की किल्लत जितनी है, उससे ज्यादा बना दी गई है। एलपीजी का वास्तविक संकट न होने के सरकार के दावों पर भरोसा करने की बजाय लोग जरूरत से ज्यादा एलपीजी जमा करने में जुट गए हैं और डीलरों-वितरकों को कालाबाजारी का मौका मिल गया है। यह स्थिति चिंताजनक है, खासकर तब, जब स्थानीय प्रशासन लाचार नजर आने लगे। एलपीजी का आगामी बीस दिन का स्टॉक उपलब्ध होने और घरेलू कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के निर्देश के बावजूद लोग 'पैनिक बुकिंग' करने लगे हैं। एलपीजी वितरण में घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने और कॉमर्शियल गैस की आपूर्ति सीमित करने के सरकारी निर्देश से घरेलू सिलेंडरों का व्यावसायिक प्रयोजन में अवैध इस्तेमाल बढ़ गया है, जो संकट को गंभीर बना रहा है। ऐसे में आपूर्ति व्यवस्था में जुटे लोगों का पहला दायित्व तो यही था कि अफवाहों को दूर करने का प्रयास करते, पर वे विफल रहे। नतीजतन, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, दिल्ली-एनसीआर, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों में एलपीजी किल्लत को लेकर घबराहट है।

भारत अपनी जरूरत की 60 प्रतिशत से अधिक एलपीजी आयात करता है। इस आयात का बड़ा हिस्सा हार्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है, जो युद्ध के कारण कुछ हद तक बाधित जरूर हुआ है। जाहिर है समुचित प्रबंधन का अभाव रहा तो न तो घरेलू रसोई गैस सिलेंडरों की किल्लत से जुड़ी अफवाहों को दूर करना आसान होगा और न ही कालाबाजारी की प्रभावी रोकथाम संभव हो पाएगी। संतोष इस बात का जरूर है कि राज्य सरकारें अपने स्तर पर रसोई गैस संकट के समाधान में जुटी ही हैं, केंद्र सरकार ने भी गैस आपूर्ति की निगरानी के निर्देश देते हुए इसकी कालाबाजारी पर अंकुश लगाने को कहा है। रिफाइनरियों को अधिक एलपीजी उत्पादन करने एवं घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता देने के निर्देश इसी कवायद के अंग हैं।

युद्ध लंबा चला तो रसोई गैस आपूर्ति को लेकर स्थिति एक हद तक जरूर बिगड़ सकती है। रेस्टोरेंट-होटलों के साथ-साथ विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की कैंटीनों को भी भोजन पकाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, जिसका असर कई स्तरों पर पड़ेगा। बड़े शहरों में बाहर खाना खाने वालों की संख्या भी करोड़ों में है। इनमें ज्यादातर ऐसे विद्यार्थी या बैचलर नौकरीपेशा हैं जो हॉस्टल्स या पीजी में रहते हैं। इसका असर गिग वर्कर्स पर तो तुरंत दिखने लगा है, जो दिनभर में 25-30 खाने का ऑर्डर पहुंचाकर अपना पेट भरते थे। ऑर्डर कम होने से उनके लिए तो रोजी-रोटी का संकट पैदा हो रहा है। इससे पहले कि देर हो जाए सरकारों को स्टॉक और वितरण की पारदर्शी व्यवस्था बनाकर तुरंत इस स्थिति को संभालने का प्रयास करना चाहिए। किसी भी अफवाह का कारगर इलाज पारदर्शिता ही है। प्रशासनिक तंत्र जितना जल्दी समझेगा और कालाबाजारियों पर कार्रवाई करेगा, उतनी जल्दी इस समस्या का हल निकलेगा।