
डॉ. भुवनेश जैन - पूर्व निदेशक, मेरा युवा भारत, युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार,
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को गति और मजबूती देने वाली दांडी यात्रा ऐतिहासिक थी, जिसने संपूर्ण भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध अहिंसात्मक प्रतिरोध की आंधी तो पैदा की, साथ ही शांति और अहिंसा के मूल्यों से युवाओं को जोड़कर ब्रिटिश हुकूमत को बेचैन कर दिया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में, जो 78 अनुयायी दांडी यात्रा में सहभागी बने, उसमें से 16-30 आयु वर्ग के करीब 66 युवा एवं विद्यार्थी थे। मेहता एवं देसाई लिखित पुस्तक दांडी कूच (1969) में उल्लेखित है। इस पुस्तक के अनुसार इसमें सबसे कम उम्र का अनुयायी 16 वर्ष का खादी बुनकर विट्ठल लीलाधर था। साबरमती आश्रम से शुरू हुई यात्रा में इन युवा विद्यार्थियों में अधिकतर खादी के छात्र, बुनकर थे। इन युवा विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षक, किसान, गोपालन-डेयरी विशेषज्ञ, संगीत आदि से जुड़े सत्याग्रही थे। सत्याग्रही विभिन्न धर्मों, क्षेत्रों, वर्गों से सम्मिलित हुए।
साबरमती आश्रम जहां से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नया सूरज उगने को बेताब था, वह जगह पौराणिक कथाओं के अनुसार दधीचि ऋषि की स्थली थी, जिन्होंने लोक कल्याण और धर्म के खातिर अपनी हड्डियां तक दान में दे दीं। इसी भूमि पर महात्मा गांधी ने आश्रमवासियों को साहस, सहनशीलता, श्रम, आत्मनिर्भरता, मानवीय मूल्यों, सत्य, शांति, विनम्रता, निर्भय, अहिंसा, न्याय आदि की शिक्षा दी और देश के लिए न्योछावर होने का जज्बा दिया, जो अंतत: दांडी यात्रा में देश के लिए संकल्प के साथ सम्मिलित हुए। गांधी जी के इस प्रयोग ने ब्रिटिश राज की नैतिकता को दुनिया के सामने रख दिया। नैतिकता से ब्रिटिश हार ने भारत की स्वतंत्रता के द्वार खोल दिए। गांधी जी दांडी यात्रा में सामाजिक कुरीतियों, मद्य निषेध, स्वच्छता, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार एवं खादी की बात करते थे। सरल बातों को आसान तरीके से जनमानस में बिठा देते और उतने ही सरल तरीके से ब्रिटिश हुकूमत से लडऩे के अहिंसात्मक सूत्र देते थे। इससे जनमानस आंदोलित हो उठा, लेकिन यात्रा में आवेश, गुस्सा, बदले की भावना, प्रतिपक्षी के अपमान की कोई जगह नहीं थी। उनका उद्देश्य तो प्रेम और आत्म पीडऩ से प्रतिपक्षी के हृदय में परिवर्तन लाना था।
नमक कर का ब्रिटिश कानून जन विरोधी, गरीब विरोधी था। नमक उत्पादन का एकाधिकार केवल सरकार का था। कोई भी नमक नहीं बना सकता था। कानून विरोधी नमक उत्पादन कार्य में छह माह की जेल और नमक जब्त का प्रावधान था। नमक की हजारों खाने बंद, हजारों लोग बेरोजगार हो गए। गांधी जी को सार्वजनिक रूप से नमक कानून तोडऩा था, ताकि भारतीय खुद नमक बनाकर उसका उपयोग कर सकें। 12 मार्च १९३० से पांच अप्रेल 1930 तक चली 240 मील यात्रा के बाद 6 अप्रेल को सुबह गांधी जी ने दांडी गांव में अरब सागर की लहरों और हवाओं के बीच समन्दर के तट पर मु_ी भर नमक अपने हाथ में लेकर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत कर दी। अरब सागर से उठी बदलाव की लहर देश के हर कोने मे पहुंच गई और देशभर में नमक कानून का विरोध, नमक तैयार करने, उसे वितरित करने की हवा चल पड़ी।
दांडी यात्रा ने दुनिया को न्याय प्राप्ति का रास्ता दिखाया कि शांति और अहिंसा से जनता को, खासतौर से युवाओं को आंदोलन के लिए तैयार किया जा सकता है और बताया कि आततायी सत्ता को आसानी से चुनौती दी जा सकती है। आज देश-दुनिया में युद्ध, हिंसा, बदले की भावना, संसाधनों पर अनैतिक रूप से कब्जे के दौर में गांधी जी के स्थापित मूल्य, विचार, रणनीति अंधेरे में उम्मीद की लौ जलाते हैं।
Published on:
13 Mar 2026 01:44 pm
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