20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

क्या शांति का प्रतीक सत्ता-समीकरण का उपकरण बन गया?

ट्रंप की नोबेल के प्रति पिपासा आधुनिक राजनीति की उस प्रवृत्ति को दर्शाती है, जहां नैतिक सम्मान भी सत्ता की मुद्रा बन जाता है। यहां पुरस्कार साध्य नहीं, साधन बन जाता है- वैश्विक वैधता पाने का, इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने का।

3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Jan 20, 2026

-सुखवीर सिंह लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं

नोबेल शांति पुरस्कार को लंबे समय तक मानवता की अंतरात्मा की आवाज माना गया। यह पुरस्कार उन व्यक्तियों और आंदोलनों को दिया जाता रहा है, जिन्होंने हिंसा, सत्ता और स्वार्थ के विरुद्ध खड़े होकर करुणा, संवाद और नैतिक साहस को चुना। किंतु समय के साथ-साथ यह पुरस्कार भी राजनीति, प्रतीकवाद और वैश्विक शक्ति-संतुलन की जटिलताओं में उलझता गया। हाल ही वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो द्वारा अपने नोबेल शांति पुरस्कार का पदक अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को प्रतीकात्मक रूप से सौंपना इसी उलझन का नवीनतम उदाहरण है। नोबेल समिति ने तुरंत यह स्पष्ट किया है कि नोबेल शांति पुरस्कार न तो हस्तांतरित किया जा सकता है और न ही उसका अधिकार किसी अन्य को दिया जा सकता है। पदक भले ही भौतिक रूप से किसी को दे दिया जाए, पर पुरस्कार का नैतिक और ऐतिहासिक सम्मान मूल विजेता के साथ ही जुड़ा रहेगा।

इसके बावजूद यह घटना वैश्विक मीडिया में उथल-पुथल का कारण बनी है। प्रश्न यह नहीं है कि नियम क्या कहते हैं, बल्कि यह है कि इस प्रतीकात्मक कृत्य के पीछे निहित राजनीति क्या है। डॉनल्ड ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़ाव किसी से छिपा नहीं है और यह किसी रहस्य से भी कम नहीं रहा है। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में उन्होंने बार-बार यह जताया है कि उनके प्रयास नोबेल के योग्य हैं। उनके समर्थक इन्हें साहसिक कूटनीति मानते हैं, जबकि आलोचक इन्हें आत्म-प्रचार और अस्थायी राजनीतिक सौदे कहते हैं। ट्रंप की नोबेल के प्रति पिपासा आधुनिक राजनीति की उस प्रवृत्ति को दर्शाती है, जहां नैतिक सम्मान भी सत्ता की मुद्रा बन जाता है। यहां पुरस्कार साध्य नहीं, साधन बन जाता है- वैश्विक वैधता पाने का, इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने का। मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार उनके लोकतांत्रिक संघर्ष और तानाशाही विरोध के लिए मिला था। ऐसे में उनका पदक ट्रंप को देना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है। क्या यह मात्र कृतज्ञता थी या फिर अमरीकी सत्ता-केंद्र के साथ अपने संबंधों को सार्वजनिक रूप से मजबूत करने की एक रणनीति? वेनेजुएला जैसे देश में, जहां सत्ता परिवर्तन की लड़ाई अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर निर्भर करती है, वहां अमरीका का आशीर्वाद अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह कृत्य नैतिक कम और राजनीतिक अधिक प्रतीत होता है।

भारतीय संस्कृति में सम्मान और पुरस्कार को कभी भी प्रदर्शन या लेन-देन का साधन नहीं माना गया। भारतीय परंपरा में सच्चा सम्मान वह है, जो कर्म के साथ स्वत: जुड़ जाए, न कि जिसे प्रचार या प्रतीकात्मक प्रदर्शन द्वारा अर्जित किया जाए। महात्मा गांधी को कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला, फिर भी वे विश्व के सबसे बड़े शांति-प्रतीक बने। यह भारतीय दृष्टि का उदाहरण है- जहां पुरस्कार से बड़ा कर्म होता है। नोबेल शांति पुरस्कार की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रतीकवाद है। पर यही प्रतीकवाद तब संकट बन जाता है, जब वह सत्ता-राजनीति का उपकरण बन जाए। मचाडो द्वारा पदक सौंपना कानूनी रूप से अर्थहीन है, पर प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत प्रभावशाली भी है। यह मीडिया को आकर्षित करता है, विवाद पैदा करता है और अंतत: राजनीतिक लाभ की संभावना तलाश करता है। भारतीय संस्कृति में इसे 'यश का मोह' कहा जाएगा- जहां साधना की जगह प्रदर्शन आ जाए। मचाडो का यह कदम पूरी तरह आडंबर है या आंशिक रणनीति- यह इतिहास तय करेगा। पर यह स्पष्ट है कि नोबेल शांति पुरस्कार अब केवल नैतिकता का प्रतीक नहीं रहा, वह वैश्विक राजनीति का दर्पण भी बन गया है। भारतीय दर्शन हमें सिखाता है कि सम्मान साधन नहीं, परिणाम होना चाहिए। जब पुरस्कार को साधन बना लिया जाता है, तब उसकी आत्मा खो जाती है। ट्रंप की नोबेल-आकांक्षा और मचाडो की प्रतीकात्मक भेंट इसी खोती हुई आत्मा के संकेत हैं। यदि नोबेल को सचमुच शांति का प्रतीक बने रहना है, तो उसे फिर से कर्म, करुणा और नि:स्वार्थता से जोड़ा जाना होगा- अन्यथा वह केवल सत्ता-राजनीति का एक चमकदार आभूषण बनकर रह जाएगा।