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वैश्विक व्यवस्था बनाम ताकत: खतरनाक मोड़ पर दुनिया

चार साल से रूस-यूक्रेन युद्ध और दो साल से गाजा में नरसंहार जारी है और नीति-निर्माता व हम लोग इसे रोज की बात मान रहे हैं। वैश्विक तंत्र की नींव धसक रही है। नियम, नैतिकता और सहभागिता इस बुनियाद के मानक हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन मानकों को बिना प्रतिरोध टूटने देता है, तो वह क्षण दूर नहीं जब दुनिया 'जंगल राज' में लड़ते हुए खत्म हो जाएगी।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 10, 2026

रजत मिश्रा - लेखक, उद्यमी एवं शोधार्थी,

आठ दशकों से वैश्विक व्यवस्था बेहद नाजुक पर महत्वपूर्ण सिद्धांत पर टिकी हुई है: शक्ति को नियमों के जरिये नियंत्रण में रखा जाए. संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, सैकड़ों अन्य संस्थाएं, संधियां और सम्मेलन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 'मत्स्य-न्याय' को रोकने के लिए बने। ये सभी पूर्णत: कारगर नहीं रहे, परन्तु फिर भी न्याय और नियम का आवरण तो दुनिया पर था ही। अमरीका, जो कभी इसी विश्व-व्यवस्था का सह-निर्माता था, अब डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में सहयोग, कूटनीति और सिद्धांतों के स्थान पर एकपक्षीय कार्रवाई, तड़क-भड़क तथा पाशविक बल को वरीयता दे रहा है। ये सिर्फ अमरीकी राजनीति की बात नहीं है। ऐसे हालात का जानबूझकर निर्माण किया जा रहा है जहां 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' ही सामान्य और शासकीय तर्क प्रतीत होने लगे। ट्रंप के सचिव 'धर्मयुद्ध' का अफसाना सुना रहे हैं और 'श्वेत राष्ट्रवाद' को बढ़ावा दे रहे हैं। न्याय विभाग बच्चों के शोषकों को बचा रहा है और गृह-सुरक्षा विभाग 'अप्रवासी' बच्चों को गिरफ्तार कर रहा है।

ट्रंप ने पहले कार्यकाल में ही इशारा कर दिया था। पेरिस क्लाइमेट डील, ईरान न्यूक्लियर डील, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनेस्को, मानव अधिकार काउंसिल जैसे दर्जनों समझौतों और बहुपक्षीय संस्थाओं से अलग किया गया। अमरीकी निवेश खत्म हुआ। इस बार ट्रंप की गति कहीं अधिक है। ये सिर्फ इंस्टीट्यूशंस से छुटकारा पाना नहीं है। ये इस विचार का ही परित्याग है कि वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए सामूहिक समाधानों की आवश्यकता है और जब बड़े, धनी देश ही सहभागी वादों को छोड़कर संकीर्ण स्वार्थ देखें, तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता ही ध्वस्त हो जाती है। संस्थाओं के परे शक्ति प्रदर्शन का भी वही हाल है। सैनिक हस्तक्षेप, हमले और यहां तक की राष्ट्राध्यक्ष का अपहरण और कत्ल बिना किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अनुमति अथवा सहमति के हो जाते हैं। विश्व व्यापार संगठन, जहां जीवनरक्षी दवाओं के एक पत्ते के निर्यात के लिए भी वर्षों बातचीत होती थी, आज दुबका हुआ ट्रंप के एकतरफा टैरिफ देख रहा है। संदेश साफ है: अगर हमारा त्वरित लाभ सिद्ध हो जाए तो नियम कायदे कूड़ेदान में जाएं।

'टेक्निकैलिटी' के नाम पर मानवता के विरुद्ध हो रहे अपराधों पर आंखें नहीं मूंदी जा सकती। ईरान में नागरिक स्वतंत्रता और महिला अधिकारों को लेकर लंबे समय से आलोचनाएं होती रही हैं। पर मानवाधिकारों की बहस तभी सार्थक होगी जब वैश्विक समुदाय हर देश के संदर्भ में एक समान मानदंड अपनाए। यदि किसी एक व्यवस्था की आलोचना की जाती है तो अन्य देशों चाहे वे किसी भी शक्ति के सहयोगी हों, के विवादास्पद या अमानवीय कृत्यों पर भी उतनी ही स्पष्टता से सवाल उठाए जाने चाहिए। चुनिंदा आलोचना मानवाधिकारों को सार्वभौमिक सिद्धांत के बजाय भू-राजनीतिक बहस का औजार बना देती है। इतिहास के असंख्य अध्याय हैं कि शासकीय संरचना को बाहरी बल प्रयोग के जरिये तबाह करने से राजनीतिक संस्कृति व सामाजिक सोच में बदलाव स्वत: नहीं आ जाता। समस्या हिपोक्रेसी नहीं है। यह तो राजनीति का दाल-भात है।

समस्या यह है कि इस तरह के कृत्य, गैरकानूनी गतिरोध, आर्थिक हमले, जंग और यहां तक की युद्ध-अपराध भी धीरे-धीरे 'नॉर्मलाइज' हो रहे हैं। युद्ध भी किसी अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि घरेलू मतदाता के बीच छवि निर्माण के लिए, शक्ति के भौंडे प्रदर्शन के लिए, भ्रष्टाचार के मुकदमे को टरकाने के लिए या फिर एप्सटीन फाइल से ध्यान हटाने के लिए किए जा रहे हैं। चार साल से रूस-यूक्रेन युद्ध और दो साल से गाजा में नरसंहार जारी है और नीति-निर्माता व हम लोग इसे रोज की बात मान रहे हैं। वैश्विक तंत्र की नींव धसक रही है। नियम, नैतिकता और सहभागिता इस बुनियाद के मानक हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन मानकों को बिना प्रतिरोध टूटने देता है, तो वह क्षण दूर नहीं जब दुनिया 'जंगल राज' में लड़ते हुए खत्म हो जाएगी। भारत ऐतिहासिक रूप से संप्रभुता, 'नॉन-इंटरवेंशन' और 'मल्टीलेटरलिस्म' का पैरोकार रहा है। हमारी रणनीतिक साझेदारी हमारे ही सिद्धांतों की बलिवेदी पर नहीं आनी चाहिए। वैश्विक नियमों और नैतिक मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए।