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सम्पादकीयः जातिविहीन समाज की रचना नई सोच से ही संभव

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, 'हमारा लक्ष्य जातिविहीन समाज बनाना है, क्या इसके बदले हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं?’

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शैक्षणिक संस्थानों में जातीय भेदभाव रोकने के मकसद से बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों (यूजीसी समता विनियम- 2026) पर रोक लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की वह महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। न सिर्फ शैक्षणिक संस्थानों के लिए बल्कि कैम्पस से बाहर सक्रिय विभिन्न समाजों के लिए भी। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, 'हमारा लक्ष्य जातिविहीन समाज बनाना है, क्या इसके बदले हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं?’ हमें उस दिशा में नहीं जाना चाहिए, जहां अलग-अलग स्कूल बना दिए जाएं, जैसे अमरीका में होता है- श्वेत और अश्वेत बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल। अदालत में यूजीसी समता विनियम के 'सेक्शन- 3सी' को चुनौती दी गई है, जिसमें एसटी, एससी और ओबीसी के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव को परिभाषित किया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को गलत तरीके से फंसाया जा सकता है। नए प्रावधान सामने आने के बाद से ही इसका देशव्यापी विरोध हो रहा था। अब एक विशेषज्ञ समिति नए नियमों के प्रावधानों और इसकी भाषा पर पुनर्विचार करेगी।
एक समय था जब मान लिया गया था कि जातीय भेदभाव का शिकार केवल वंचित तबके के लोग ही होते हैं। यह सच भी था। आजादी के बाद समानता मूलक समाज बनाने की दिशा में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर काफी प्रयास हुए हैं। इनमें आरक्षण जैसे उपाय शामिल हैं। राजनीतिक तौर पर भी वंचित तबकों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। सरकार ने हाल में संसद में बताया कि निचली अदालतों में नियुक्त 46 फीसदी जज एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के हैं। कमोबेश यह स्थिति अन्य क्षेत्रों में भी देखी जा सकती है। वंचित समाज से आने वालों की प्रताडऩा रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, जिनके दुरुपयोग की शिकायतें भी आती रहती हैं। हालांकि, इन सबके बावजूद हम यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि समाज से जातीय भेदभाव समाप्त हो गए हैं। उल्टा यह देखा जा रहा है कि विभिन्न समाजों की जातीय चेतना मजबूत ही हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जाति के आधार पर छात्रावास की कल्पना को खतरनाक माना है, लेकिन आज भी यह हकीकत है। न सिर्फ छात्रावास बल्कि, घरों और गाडिय़ों में भी लोग जातीय पहचान का प्रदर्शन करते दिख रहे हैं।
ऐसे माहौल में यह जरूरी है कि पढ़ाई के बाद विश्वविद्यालयों से बाहर आने वाले युवा समाज में जागृति लाएं और बंटे हुए नहीं बल्कि, एकजुट देश का निर्माण करें। शैक्षणिक संस्थानों के कैंपस ही जातिविहीन समाज की स्थापना की प्रयोगशाला हो सकते हैं। हालांकि अब तक हुआउल्टा ही है। समय आ गया है कि जातीयता से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों को तवज्जो दी जाए। इसकी शुरुआत पीडि़त या प्रताडि़त की जाति पर गौर किए बिना, सिर्फ मानवीय आधार पर, कार्रवाई सुनिश्चित कर हो सकती है। जातिविहीन समाज की रचना जातीय जड़ों को मजबूती देकर नहीं हो सकती।

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