
ईरान में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल भारत के लिए सिर्फ एक विदेशी संकट नहीं है, बल्कि यह भारत की सुरक्षा, व्यापार और रणनीति से सीधे जुड़ा मामला बनता जा रहा है। ईरान और भारत के रिश्ते दशकों पुराने हैं। ये रिश्ते सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं, बल्कि भूगोल, रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय पहुंच से जुड़े हैं। अगर ईरान कमजोर हुआ या वहां सत्ता परिवर्तन हुआ, तो इसका नुकसान भारत को हो सकता है। भारत के लिए ईरान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि पश्चिम की ओर खुलने वाला एकमात्र भरोसेमंद दरवाजा है।
पाकिस्तान ने अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए भारत के जमीनी रास्ते बंद कर रखे हैं। ऐसे में ईरान ही भारत को उस क्षेत्र से जोड़ता है, जहां से ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक पहुंच मिलती है। लेकिन, ट्रंप की अतिवादी नीतियों ने जिस तरह ईरान में सत्ता परिवर्तन और उसे आर्थिक रूप से कमजोर बनाने का खेल शुरू किया है, यह सीधे तौर पर भारत के लिए भी एक और मुसीबत खड़ी कर सकता है। अगर ईरान की स्थिति नियंत्रण से बाहर होती है, तो इससे वैश्विक स्तर पर तेल और वित्तीय बाजारों पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। वेनेजुएला में निकोलस मादुरो को हटाए जाने के बाद ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन ईरान के मामले ने सभी को चिंता में डाल दिया है क्योंकि ईरान, वेनेजुएला की तुलना में चार गुना अधिक तेल का उत्पादन करता है। ओपेक देशों में ईरान तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। दुनिया की कुल तेल मांग का लगभग चार फीसदी हिस्सा ईरान से आता है, जबकि वेनेजुएला सिर्फ एक फीसदी ही उत्पादन करता है।
क्रूड की कीमतों में उथल-पुथल का असर भारत पर सीधे पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा आयात से पूरा करता है। इस भारी निर्भरता के कारण उसे अपने विदेशी मुद्रा भंडार का काफी बड़ा खर्च इस पर करना पड़ता है। इससे भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जरा भी तेजी भारत में पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ा देती है। इससे महंगाई बढ़ती है। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य (जो उत्तर में ईरान और दक्षिण में अरब प्रायद्वीप के बीच स्थित है) एक महत्वपूर्ण चोक पॉइंट बना हुआ है। यहां से वैश्विक एलएनजी व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत और कच्चे तेल के निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है। ईरान इस रास्ते को बंद कर सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास किसी भी तरह की बाधा से इराक, सऊदी अरब और यूएई से तेल की खेप प्रभावित हो सकती है। इन देशों से भारत को तेल की बड़ी मात्रा सप्लाई की जाती है। इस रास्ते में बाधा आने से तेल लाने की लागत बढ़ जाएगी। इससे समय के साथ-साथ लागत के मामले में भारत के निर्यात को नुकसान हो सकता है। ईरान ने पहले इस रास्ते को बंद करने की धमकी दी है।
साफ है, यदि सत्ता परिवर्तन हिंसक होता है, तो ईरान में लंबे समय तक अस्थिरता रह सकती है। इससे भारत के करोड़ों डॉलर के निवेश (जैसे चाबहार और आइएनएसटीसी) अधर में लटक सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि स्थिर ईरान भारत के लिए बहुत मायने रखता है। ईरान में सत्ता परिवर्तन यदि लोकतांत्रिक तरीके से होता है तो यह भारत के लिए दीर्घकालिक लाभ लेकर आएगा। लेकिन, यदि वहां लंबे समय तक संघर्ष चलता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक योजनाएं गंभीर संकट में पड़ सकती हैं। भारत की पूरे मामले पर सतर्क निगाह है।
Published on:
24 Jan 2026 01:07 pm
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