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सुप्रीम कोर्ट ने BCCI मामले में याची को लगाई फटकार और सेल डीड की वैद्यता पर दिया बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने दो अहम फैसले सुनाए हैं। पहले मामले में BCCI को लेकर दायर की गई याचिका में याची को फटकार लगाई और दूसरे मामले में सेल डीड को एक महत्वपूर्ण दस्तावेज करार दिया।

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सुप्रीम कोर्ट की प्रतीकात्मक फोटो ( स्रोत Gemini )

Supreme Court सुप्रीम कोर्ट ने दो अहम फैसले सुनाते हुए BCCI मामले में याची को फटकार लगाई। याची की ओर से कहा गया था कि बीसीसीआई एक प्राइवेट संस्था है इसलिए भारतीय क्रिकेट टीम को राष्ट्रीय टीम ना कहा जाए। इस पर अदालत ने साफ किया कि भारतीय क्रिकेट टीम भारत का प्रतिनिधित्व करती है ऐसे में याचिका रद्द की जाती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के एक फैसले को निरस्त करते हुए कहा है कि, रजिस्टर सेल डीड आसानी से फर्जी घोषित नहीं की जा सकती। यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा सेल डीड महत्वपूर्ण दस्तावेज

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि रजिस्टर सेल डीड एक ऐसा दस्तावेज है जो वैधता और विश्वसनीयता की वकालत करता है। अदालतों को ऐसे मामलों में थोड़ा गहन मंथन करना चाहिए। रजिस्टर्ड सेल डीड को हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसको आसानी से फर्जी घोषित नहीं किया जा सकता। 22 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई चल रही थी। जस्टिस मनमोहन सिंह और जस्टिस राशि बिंदल की पीठ ने इस मामले को सुना और मूल प्रतिवादी हेमलता के कानूनी प्रतिनिधियों की ओर से दी गई अपील को स्वीकार कर लिया। इस मामले को सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 1971 के एक रजिस्टर्ड सेल डीड और किराया समझौते नामे को नाम मात्र और लागू नए करने योग्य घोषित करते हुए फैसला दिया गया था। इस निर्णय में हाइकोर्ट ने कहा था कि, सेल डीड कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मुद्दा रखा गया तो शीर्ष अदालत में हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। प्रथम अपीलीय न्यायालय के आदेश को बरकरार करते हुए कह दिया कि सेल डीड को आसानी से फर्जी करार नहीं दिया जा सकता ये एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

BCCI के मामले में याची को लगाई फटकार

इसी तरह से सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में BCCI की ओर से याचिका दाखिल करने वाले याची को फटकार भी लगाई। याची की ओर से मांग की गई थी कि भारतीय क्रिकेट टीम को भारतीय टीम या टीम इंडिया ना कहा जाए। इस मामले की सुनवाई जस्टिस जॉय माल्या बागची ने की। मामले को सुनते हुए उन्होंने कहा कि स्थिति कभी-कभी ऐसी हो जाती है कि जैसे पूछ ही कुत्ते को हिला रही हो। अदालत का दूसरे शब्दों में यह कहना था कि क्रिकेट में पैसा और ताकत इतना अधिक हो गया है कि यह सवाल भी उठने लगा है कि अली ताकत किसमें है। दरसल याची की ओर से ये याचिका दाखिल की गई थी कि बीसीसीआई एक निजी संस्था है जो तमिलनाडु रजिस्ट्रेशन सोसाइटी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड है। ऐसे में उसे भारतीय क्रिकेट टीम को राष्ट्रीय टीम कहने का आधिकार नहीं होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा समय ना खराब करें

इस दलील पर अदालत समहत नहीं हुई। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि वर्तमान समय में बीसीसीआई का क्रिकेट टीम पर नियंत्रण कानून रूप से भी स्वीकार किया जा चुका है। सरकार का भी बीसीसीआई को समर्थन में ऐसे में इस तरह की याचिका दाखिल करना कोर्ट का समय बर्बाद करने वाली याचिका है। अदालत ने याची को फटकार भी लगाई और कहा कि घर के कमरे में बैठकर कुछ भी ड्राफ्ट कर देना उचित नहीं होता। ऐसा करके कोर्ट का समय बर्बाद करना उचित नहीं है। फटकार लगाते हुए यह भी कहा कि इस मामले में कोर्ट का समय बर्बाद करने के एवज में तगड़ा जुर्माना भी लगाया जा सकता है।