
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
Budget 2026: दुनिया में आर्थिक उथल-पुथल और भू-राजनैतिक तनावों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी की रफ्तार कायम है लेकिन इसे सतर्क रहने की जरूरत है। भारत की अर्थव्यवस्था इस साल (2025-26) सात फीसदी से ऊपर की दर से तथा अगले साल 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से गुरुवार को संसद पेश देश के आर्थिक सर्वेक्षण, 2026 में यह अनुमान लगाया गया है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि इस समय वैश्विक हालात ऐसे हैं, जिसमें मजबूत वृहद आर्थिक आधार के बावजूद भारत को बाहरी निवेश के रूप में वांछित प्रतिफल नहीं मिल रहा है। सर्वेक्षण में समावेशी विकास पर जोर देते हुए देश के अर्थव्यवस्था की मिली-जुली तस्वीर पेश की गई है।
सर्वे में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण बताया गया है। वहीं शिक्षा-स्वास्थ्य पर अहम सुझाव दिए गए हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी.अनंत नागेश्वरन द्वारा लिखित इस सर्वे में कहा गया है, वैश्विक स्तर पर भू-राजनैतिक समीकरण में बदलाव को देखते हुए अल्पकालिक दबाव के समाधान खोजने की बजाय मजबूती, सतत नवाचार और विकसित भारत के रास्ते पर बढ़ते रहने का विकल्प चुनना चाहिये। भारत को फर्राटा और मैराथन दौड़ एक साथ दौड़नी है। वहीं सर्वे में राज्यों की ओर से बांटी जा रही 'फ्रीबीज' पर चेतावनी दी गई है।
1.शिक्षा: ड्रॉप आउट चिंता, स्कूलों में हो स्किल डवलपमेंट:
44 फीसदी किशोरों में स्कूली पढ़ाई छोड़ने का प्रमुख कारण परिवार की आर्थिक समस्याओं के लिए धन जुटाना है। इसके लिए स्कूल स्तर पर व्यावसायिक व कौशल विकास शिक्षा जरूरी।
2.जंक फूड: खराब हो रही सेहत, उपयोग व विज्ञापन पर लगे रोक
जंक फूड की बढ़ती खपत चिंताजनक। ऐसे खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक सभी मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगे। जंक फूड के पैकेट पर आगे की तरफ पोषण चेतावनी लेबल लगाए जाएं। शिशु और छोटे बच्चों के दूध उत्पादों और पेय पदार्थों के प्रचार पर भी सख्त रोक लगे। जंक फूड से मोटापा, डायबिटीज और अन्य गंभीर बीमारियां और देश में स्वास्थ्य असमानता भी बढ़ रही है। लोगों की खाने की आदत बदलने से समस्या का समाधान नहीं, सरकार को खाद्य उत्पादन, मार्केटिंग और नीतियों के स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे।
3.सस्ती खाद समस्या: यूरिया का दाम बढ़ाकर नकद सब्सिडी दें
सस्ती खाद और यूरिया ज्यादा इस्तेमाल के कारण मिट्टी की सेहत के लिए मुसीबत बन गया है। पिछले 10 साल से यूरिया के दाम नहीं बढ़े हैं, इसलिए दामों में थोड़ी बढ़ोतरी की जाए और किसानों को प्रति एकड़ जमीन के हिसाब से राशि उनके खातों में दी जाए। इससे किसानों पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और यूरिया के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर रोक लगेगी।
4.सोशल मीडिया मुसीबत: बच्चों के इस्तेमाल पर लगे रोक, सदुपयोग हो
बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग से आगे आएंगी समस्याएं, इनके इस्तेमाल और उपयोग और उन्हें लक्षित विज्ञापनों पर आयु-आधारित सीमा लागू करने सुझाव। डिजिटल प्लेटफॉर्म को उम्र सत्यापन, डिफॉल्ट सेटिंग्स, कंटेंट फिल्टर लागू करने के साथ बेसिक फोन जैसे साधारण उपकरण या केवल शिक्षा के लिए बने टैबलेट को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
5.अनिश्चितता: निवेश प्रभावित, कैपिटल मार्केट मजबूत हो
सर्वे ने चेतावनी दी कि अगर बाजार में लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहती है, तो इसका असर सिर्फ शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अनिश्चितता के कारण निवेश घटता है और बाजार में बड़ी गिरावट और वित्तीय संकट का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए भारत को अपने लॉन्ग-टर्म कैपिटल मार्केट को मजबूत करना चाहिए और सिर्फ बैंकों पर निर्भर रहने के बजाय फंडिंग के अन्य ऑप्शन भी विकसित करने चाहिए।
1.केंद्र में राजकोषीय अनुशासन बेहतर, राज्यों में मुफ्त रेवड़ी पर चेतावनी
केंद्र सरकार ने अपनी वित्तीय स्थिति को सुधारा है। 2025 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.8% रहा, जो बजट अनुमानों से बेहतर है। अगले साल इसे 4.4% तक लाने का लक्ष्य है। राज्यों में लोकलुभावनवाद के चलते मुफ्त योजनाओं की प्रवृत्ति चिंताजनक है। इससे विकास खर्च प्रभावित हो रहा है।
2.इंफ्रास्ट्रक्चर और कैपेक्स की लंबी छलांग
अर्थव्यवस्था को गति देने में बुनियादी ढांचे का बड़ा हाथ है।केंद्र सरकार का पूंजीगत खर्च 2018 में 2.63 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2025 में 11.21 लाख करोड़ रुपए हो गया है। सड़क, रेलवे के क्षेत्र में पूंजीगत खर्च में बड़ा उछाल आया है।
3.विदेशी मुद्रा भंडार का कवच
बाहरी झटकों से निपटने के लिए भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार का पर्याप्त 'बफर' है। गत सप्ताह तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 701.4 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया जो 11 महीने के आयात के लिए पर्याप्त है।
4.जीएसटी सुधार से मांग बढ़ी, जीएसटी संग्रह रहेगा स्थिर
जीएसटी दरों में बदलाव से देश में मांग बढ़ी है जिससे देश में विनिर्माण को मजबूती मिली है। दवाओं, गाडि़यों, खिलौनों व हस्तशिल्प पर टैक्स घटने से लोगों की आय व रोजगार बढ़ेंगे। आने वाली तिमाहियों में जीएसटी संग्रह सुदृढ़ रहने की उम्मीद।
5.बेरोजगारी-गरीबी नियंत्रण में, महिला रोजगार बढ़ा
देशे में बेरोजगारी व गरीबी पर नियंत्रण किया जा रहा है। वर्ष 2017-18 की बेरोजगारी दर 5.6 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में मात्र 3.2 प्रतिशत रह गई है। इसी अवधि में रोजगार में महिलाओं की भागीदारी 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई है। इसी तरह गरीबी 2005-06 के 55.3% से घटकर 2022-23 में 11.28% रह गई है।
सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी.अनंत नागेश्वरन ने कहा कि सोने-चांदी की कीमतों में आई तेजी चिंताजनक जताई। यह तेजी सिर्फ युद्ध या जियो-पॉलिटिक्स तनाव की वजह से नहीं है, बल्कि लोग दुनिया की फिएट करेंसी (जैसे डॉलर, यूरो आदि) की वैल्यू को लेकर भी सवाल उठाने लगे हैं। इसी वजह से लोग सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में ज्यादा खरीद रहे हैं। विश्व में इस प्रवृत्ति के कारण सोने-चांदी में आगे भी मजबूती रह सकती है।
सर्वे में कहा गया है कि रुपया वैश्विक भू-राजनैतिक परिस्थितियों और रणनीतिक स्थिति में अंतर का शिकार है। उसकी मौजूदा विनिमय दर देश की आर्थिक स्थिति का सही चित्रांकन नहीं करती है। भारत के घरेलू फंडामेंटल मजबूत हैं, लेकिन विदेश की घटनाओं के कारण जोखिम बरकरार हैं। पूंजी प्रवाह और करेंसी पर दबाव चिंता का विषय है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक सर्वेक्षण पर कहा कि भारत की सुधार यात्रा की पूरी तस्वीर दिखाता है। कठिन वैश्विक हालात के बावजूद देश लगातार आगे बढ़ रहा है। सर्वेक्षण से मिले निष्कर्ष नीतियां बनाने में मदद करेंगे और भारत के आर्थिक भविष्य को लेकर भरोसा और मजबूत करेंगे। भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है, विकास की रफ्तार बनी हुई है और नवाचार, उद्यमिता तथा बुनियादी ढांचे की भूमिका देश के निर्माण में लगातार बढ़ रही है। सर्वेक्षण में समावेशी विकास पर खास जोर देते हुए विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने, उत्पादकता बढ़ाने और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का रोडमैप दिया गया है।
देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी.अनंत नागेश्वरन ने शेयर बाजार और फाइनेंशियल मार्केट को लेकर सावधान रहने की सलाह दी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में नागेश्वरन ने कहा कि पिछले कई सालों से दुनिया भर में ब्याज दरें बहुत कम रहीं और पैसे की उपलब्धता बहुत आसान रही।
इसका असर यह हुआ कि शेयर, प्रॉपर्टी और अन्य एसेट्स की कीमतें जरूरत से ज्यादा तेजी से बढ़ गईं। उन्होंने समझाया कि जब पैसा आसानी से मिलता है, तो लोग ज्यादा जोखिम लेते हैं और ज्यादा निवेश करते हैं। इससे बाजार की कीमतें असली वैल्यू से ऊपर चली जाती हैं। नागेश्वरन के मुताबिक, आज की स्थिति ऐसी है कि शेयर बाजार काफी महंगा हो चुका है और इसमें गिरावट का जोखिम भी बढ़ गया है।
Published on:
30 Jan 2026 06:35 am
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