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अजित पवार ने चाचा शरद पवार से सिखी राजनीति, दो बार किया भीतरघात और फिर हथिया ली उनकी पार्टी

अजित पवार ने दशकों के अपने राजनीतिक करियर में अपने चाचा शरद पवार से अलग हट कर अपनी एक पहचान बनाई और देखते ही देखते उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि उन्होंने शरद पवार से उनकी ही पार्टी एनसीपी का चिह्न छीन लिया।

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भारत

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Himadri Joshi

Jan 28, 2026

Ajit Pawar

अजित पवार (फोटो- फाइल फोटो)

महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार का 66 वर्ष की उम्र में एक प्लेन दुर्घटना में निधन हो गया है। उनकी मौत की खबर से पूरा देश सदमे में है और उनकी पार्टी, परिवार और समर्थकों के बीच शोक की लहर है। अजित भले ही अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं लेकिन उनका राजनीतिक सफर पीढ़ियों तक लोगों का मार्गदर्शन करेगा। अपने चाचा शरद पवार की उंगली पकड़ कर राजनीति में कदम रखने वाले अजित ने समय के साथ अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनके इस सफर में कई उतार-चढ़ाव भी आए जिसके चलते उन्होंने अपने ही चाचा का साथ छोड़ कर विपक्षी भाजपा का हाथ थाम लिया। आइए जानते हैं कि अजित के राजनीतिक सफर में कौन-कौन से यादगार पल रहे हैं और किस तरह वे पिछले 13 सालों में पांच बार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री बने।

1982 में राजनीति में कदम रखा

अजित का जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के देवलाली प्रवरा में हुआ। उनके पिता अनंतराव पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके शरद पवार के बड़े भाई थे। अजित की कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उनके पिता का निधन हुआ जिसके बाद 1982 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा। सालों के संघर्ष के बाद 1991 में पहली बार अजित सांसद चुने गए लेकिन बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा को दे दी। पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में शरद पवार रक्षा मंत्री बनकर केंद्र की राजनीति में सक्रिय हुए और अजित ने चाचा की पार्टी एनसीपी की कमान अपने हाथों में संभाल ली।

1995 में वे पहली बार बारामती से विधायक बने

अजित ने खुद को जमीनी स्तर पर मजबूत किया और राज्य में पार्टी के उत्तराधिकारी के रूप में पहचान बनाई। 1995 में वे पहली बार बारामती विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक बने। बता दें कि यही आज उनका विमान दुर्घटना में निधन हो गया है। 1995 से 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 तक अजित इस सीट से जीत हासिल करते रहे और बारामती उनका गढ़ बन गया। अपने राजनीतिक सफर के दौरान अजित ने राज्य सरकार में कृषि, ऊर्जा और योजना राज्य मंत्री जैसे कई पद संभाले। 1992 और 1993 में शरद पवार के मुख्यमंत्री रहते हुए अजित महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने।

2019 में शरद पवार पर पहला भीतरघात

दशकों तक चाचा के साथ राजनीति करने के बाद 2019 वह साल था जब राजनीति के लिए एनसीपी पार्टी और पवार परिवार में दरार आने लगी। अजित पवार ने रातों-रात चाचा का साथ छोड़कर बीजेपी का हाथ थाम लिया और अपने समर्थक विधायकों को लेकर बीजेपी से गठबंधन कर लिया। 23 नवंबर की सुबह बिना किसी सुगबुगाहट के देवेन्द्र फड़नवीस ने सीएम पद की शपथ ली और अजित महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने। अजित के इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया। अजित के इस फैसले को चाचा का समर्थन नहीं मिला और उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह साफ किया कि एनसीपी पार्टी इस फैसले के समर्थन में नहीं है यह अजित का निजी फैसला है।

तीन दिन में शरद पवार ने इस्तीफा देने पर किया मजबूर

इस दौरान अजित पर अपने चाचा और पार्टी के साथ-साथ महाराष्ट्र की जनता को धोखा देने का आरोप लगा और उनकी सत्ता ज्यादा दिन नहीं टिक पाई। शरद पवार ने अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई और उनके कहने पर सभी विधायकों ने अजित का साथ छोड़ दिया और महज तीन दिन में अजित को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन इतने बड़े भीतरघात के बावजूद शरद पवार ने अपने भतीजे का साथ नहीं छोड़ा और कुछ महीनों बाद जब एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना ने मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई तो अजित को फिर से उप मुख्यमंत्री का पद सौंपा गया।

2023 में दोगुनी ताकत के साथ फिर किया प्रहार

जहां देखने में लगा कि अब पवार परिवार के रिश्ते सुधर गए हैं और एनसीपी एक बार फिर एकजुट है तभी एक बार फिर अजित ने अपने चाचा शरद पवार को बड़ा झटका दिया। बात थी 2023 के चुनावों की और जहां पिछली बार शरद पवार की ताकत ने अजित का रास्ता रोका था वहीं इस बार अजित ने अपनी मजबूत पकड़ से पार्टी का एक बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में लिया। इस बार की अजित की ताकत इतनी मजबूत थी कि उन्होंने न सिर्फ अपने चाचा की पार्टी के विधायक तोड़ें बल्कि उनकी ही पार्टी का चिह्न उनसे हथिया लिया। शरद पूरी तरह लाचार हो गए और अजित ने बीजेपी और एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई और फिर से राज्य के उप मुख्यमंत्री बने।

राजनीति के अजातशत्रु बन गए अजित

2024 के चुनावों में भी इसी गठबंधन के साथ अजित ने प्रचंड जीत हासिल की और फिर से उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जिसके बाद से अब तक वह पद पर कार्यरत थे। पार्टी पर पूरी तरह पकड़ साबित करने और लगातार चुनावों में जीत के साथ अजित ने यह साबित कर दिया कि उन्होंने अपने चाचा की पहचान से अलग एक मजबूत पहचान बनाई है और वह महाराष्ट्र की राजनीति का एक मजबूत हिस्सा है। अजित की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र में सत्ता किसी की भी हो या नेता कोई भी हो अजित हमेशा पावर में रहे और इसी कारण से उनकी मौत के बाद आज उनकी विरोधी नेता भी उन्हें अजातशत्रु तक कहकर संबोधित कर रहे हैं।

#AjitPawarDeathमें अब तक