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भारत, Jun 04, 2026

23 साल से अलग रह रहे दंपति को तलाक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा-‘पति-पत्नी को साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते’

Matrimonial Dispute: सुप्रीम कोर्ट ने 23 साल से अलग रह रहे एक दंपति को तलाक देते हुए कहा कि पति-पत्नी को साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है और दोनों पक्षों को अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार है।

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (ANI)

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब पति-पत्नी अपने-अपने रुख पर पूरी तरह अड़े हों तब न्यायिक प्रक्रिया के जरिए उन्हें वैवाहिक संबंध बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए 23 वर्षों से अलग रह रहे एक दंपति को तलाक दे दिया। जस्टिस ए. अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि दोनों पक्षों के सामने अपना-अपना जीवन है। उन्हें यह तय करने का अधिकार है कि वे उसे किस तरह जीना चाहते हैं। पति-पत्नी के रिश्ते को न्यायिक कार्यवाही के माध्यम से जबरन नहीं चलाया जा सकता।

पति ने आरोप लगाया था कि विदेश में रहने के दौरान पत्नी ने उस पर कई निराधार आरोप लगाए, जिसके कारण उसकी नौकरी चली गई। बाद में परिवार को कई बार स्थान बदलना पड़ा और हैदराबाद का मकान बेचना पड़ा। पत्नी ने तलाक का विरोध करते हुए कहा कि पति के आरोप झूठे हैं। वह सामाजिक दबाव के कारण विवाह समाप्त नहीं करना चाहती।

हालांकि जब अदालत ने दोनों के बीच मतभेदों और संबंध बहाल करने की संभावना के बारे में पूछा तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि व्यवहारिक रूप से यह विवाह पूरी तरह टूट चुका है।

AI के इस्तेमाल पर नियमों का मसौदा जारी

न्यायिक कामकाज में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के अनावश्यक इस्तेमाल और वकीलों की ओर से एआई जनित फर्जी नजीरों से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में एआई के उपयोग को लेकर नियमों का मसौदा जारी किया है। मोटे तौर पर इसमें कहा गया है प्रशासनिक गैर-न्यायिक कामकाज व सरलीकरण के लिए एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन न्यायिक विवेक के उपयोग में इसका प्रयोग प्रतिबंधित रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने देशभर की अदालतों और ट्रिब्युनलों में प्रस्तावित इन नियमों के मसौदे पर 20 जून तक समस्त हितधारकों व आम लोगों से सुझाव आपत्तियां मांगी है। इन पर विचार के बाद यह नियम लागू होंगे।

मसौदे में कहा गया है एआई सिस्टम केवल सहायक क्षमता में कार्य करेगा और न्यायिक अधिकारी द्वारा न्यायिक अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग को प्रतिस्थापित या बाधित नहीं करेगा। कानून, तथ्य और न्याय से संबंधित प्रश्नों का अंतिम निर्णय करने का अधिकार विशेष रूप से न्यायाधीशों के पास ही रहेगा। जहां एआई टूल्स का उपयोग किया जाता है, वहां भी निर्णयों के लिए जवाबदेही संबंधित न्यायिक अधिकारी पर ही रहेगी।

वकीलों को बताना होगा इस्तेमाल

नियमों के मसौदे में कहा गया है कि वकील दलीलें और साक्ष्य तैयार करने के लिए एआई टूल्स का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने पर अदालत को सूचित करना होगा।

इसकी अनुमति

  • कानूनी अनुसंधान और नजीरों की खोज, उनका सत्यापन
  • दलीलों, निर्णयों और दस्तावेजों का सारांश बनाना व अनुवाद
  • अदालती कार्यवाही की ऑटामैटिक स्कि्रप्ट
  • प्रारूप बनाना, नोटिस, समन और प्रशासनिक दस्तावेजों की तैयारी;
  • मुकदमों की सूची व तारीख तय करना
  • मुकदमों व रिकॉर्ड प्रबंधन, डिफेक्ट जांच का प्रबंधन और दोष जांच;
  • न्यायिक प्रशासन ये रहेंगे प्रतिबंधित
  • मुकदमों का निर्णय व सजा तय करना
  • जमानत पात्रता का निर्धारण- अपराधी के भागने के जोखिम या दोबारा अपराध की आशंका का आकलन- गवाहों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन
  • जजो, वकीलों व पक्षकारों की निगरानी
  • न्यायिक विचार-विमर्श
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