
एसआईआर पर संगठन बनाम सरकार: पंकज चौधरी के बयान से यूपी भाजपा में खुला टकराव (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
Organization vs. Government on SIR: उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन--SIR ) को लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर सरकार और संगठन के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा SIR में लगभग चार करोड़ मतदाताओं के नाम कम होने के लिए संगठन को जिम्मेदार ठहराने के बाद अब भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने पलटवार करते हुए स्पष्ट रूप से इसकी जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी है। पंकज चौधरी का यह बयान न केवल संगठनात्मक असंतोष को उजागर करता है, बल्कि इसे ‘टीम गुजरात’ बनाम ‘टीम योगी’ के रूप में भी देखा जा रहा है।
13 जनवरी को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में प्रदेश भर से आए भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पंकज चौधरी ने कहा कि एसआईआर सरकार की जिम्मेदारी है और संगठन हर संभव सहयोग देने को तैयार है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि “ड्राइविंग सीट पर सरकार है।” इस बयान को दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के तुरंत बाद दिया जाना राजनीतिक हलकों में कई संकेत दे रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही SIR में भारी संख्या में मतदाताओं के नाम कटने के लिए संगठन की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का सार्वजनिक मंच से सरकार को जिम्मेदार ठहराना पार्टी के भीतर गंभीर मतभेद का संकेत माना जा रहा है। बैठक में पंकज चौधरी ने यह भी कहा कि पार्टी द्वारा जिन कार्यकर्ताओं को बीएलओ-2 बनाया गया था, कई जगह उनकी लापरवाही और दगाबाजी भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि “ताली एक हाथ से नहीं बजती।”
SIR को लेकर भाजपा संगठन और सरकार की ओर से जिस स्तर पर प्रचार-प्रसार किया गया था, जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल अलग दिख रही है। पंकज चौधरी ने 27 दिसंबर को मथुरा से अपने प्रदेश दौरे की शुरुआत की थी। ब्रज क्षेत्र, पश्चिमी यूपी, गोरखपुर, काशी और अवध के दौरे के दौरान उन्हें जिलाध्यक्षों और क्षेत्रीय अध्यक्षों से जो फीडबैक मिला, उसमें सबसे बड़ी शिकायत पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को लेकर रही।
पार्टी संगठन की राजनीति से अपेक्षाकृत नए माने जा रहे पंकज चौधरी कार्यकर्ताओं से जुड़ने के प्रयास में लगातार एक संवाद दोहरा रहे हैं-“मैं कार्यकर्ताओं के लिए लड़ूंगा भी और अड़ूंगा भी।” लेकिन सवाल यह है कि प्रदेश में सरकार भी भाजपा की है और संगठन के मुखिया भी वही हैं, तो फिर यह लड़ाई किससे है? उनके इस बयान ने कार्यकर्ताओं में उत्साह के साथ-साथ भ्रम भी पैदा किया है।
लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को उत्तर प्रदेश में अप्रत्याशित झटका लगा था। कई सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। जानकारों के अनुसार इसकी एक बड़ी वजह मतदाता सूची में गड़बड़ियां रहीं। कई लोकसभा क्षेत्रों में पोलिंग पार्टियों को दी गई मतदाता सूची में हजारों मतदाताओं के नाम के आगे ‘डिलीट’ लिखा था, जबकि पार्टी और प्रत्याशियों के पास मौजूद सूची में वही मतदाता शामिल थे। इससे चुनावी रणनीति और मतदान प्रबंधन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
भाजपा नेतृत्व को आशंका है कि यदि एसआईआर में यही स्थिति दोहराई गई तो आगामी चुनावों में पार्टी को फिर नुकसान हो सकता है। इसी कारण पंकज चौधरी ने स्पष्ट कर दिया है कि एसआईआर की जिम्मेदारी सरकार की है, ताकि भविष्य में इसका ठीकरा संगठन के सिर न फोड़ा जाए।
पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के दिन से ही यह चर्चा तेज हो गई थी कि यह ‘टीम गुजरात’ की ओर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घेराबंदी का हिस्सा है। गोरखपुर से जुड़े नेताओं को लगातार राष्ट्रीय और संवैधानिक पदों पर भेजे जाने को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पहले डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को राज्यसभा भेजा गया, फिर उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया। इससे पहले शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा, फिर केंद्रीय मंत्री और बाद में हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। गोरखपुर की संगीता यादव को भी राज्यसभा भेजा गया।
आलोचकों का कहना है कि कैडर बेस पार्टी में गोरखपुर एक अपवाद बनता जा रहा है। स्वयं पंकज चौधरी के पास भी संगठन चलाने का लंबा अनुभव नहीं है। वे इससे पहले केवल प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष जैसा महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया। एसआईआर को लेकर प्रशासन और भाजपा के बीच टकराव की स्थिति भी बनती जा रही है। 11 जनवरी को चुनाव आयोग द्वारा सभी बूथों पर विशेष शिविर लगाए गए, लेकिन भाजपा संगठन को इसकी समुचित जानकारी नहीं दी गई। नतीजतन कई बूथों पर पार्टी के बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) मौजूद नहीं रहे। इसको लेकर कई जिलाध्यक्षों ने शिकायत दर्ज कराई है।
मतदाता सूची में एक ही परिवार के सदस्यों के अलग-अलग बूथों पर नाम दर्ज किए जाने से भी विवाद खड़ा हो गया है। प्रशासन का तर्क है कि प्रति बूथ 1200 मतदाताओं की सीमा तय होने के कारण ऐसा किया गया, जबकि पार्टी का कहना है कि यदि एक परिवार के सदस्य अलग-अलग बूथों पर जाएंगे तो एसआईआर का उद्देश्य ही क्या रह जाता है। इसके अलावा गैरमौजूद, स्थानांतरित और मृत (एएसडी) मतदाताओं की सूची में भी गंभीर खामियां सामने आ रही हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी अपने काम को सही ठहराते हुए राजनीतिक दलों के सहयोग की कमी की बात कह रहे हैं, जबकि भाजपा इसे प्रशासनिक लापरवाही बता रही है।
इन सबके बीच भाजपा का आम कार्यकर्ता खुद को सबसे ज्यादा ठगा हुआ महसूस कर रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2017 और 2022 में सरकार बनाने के बावजूद उन्हें न तो सत्ता में हिस्सेदारी मिली और न ही सम्मान। आज भी वे निगमों, बोर्डों और समितियों में पद मिलने का इंतजार कर रहे हैं। दूसरी ओर कई पदाधिकारी जमीन पर उतरने के बजाय केवल डाटा और रिपोर्ट के सहारे अभियानों को सफल दिखाने में लगे रहे।
सूत्रों के अनुसार संगठन हित में काम करने वाले कुछ कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को ई-मेल भेजकर यूपी के कुछ जिम्मेदार पदाधिकारियों की कार्यशैली की विस्तृत जानकारी दी है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में एसआईआर का मुद्दा केवल मतदाता सूची तक सीमित न रहकर संगठनात्मक पुनर्गठन और जवाबदेही तक पहुंचेगा।
स्पष्ट है कि एसआईआर ने उत्तर प्रदेश भाजपा में लंबे समय से दबे असंतोष को सतह पर ला दिया है। अब देखना यह है कि पार्टी नेतृत्व इस टकराव को कैसे संभालता है और क्या सरकार व संगठन के बीच समन्वय स्थापित हो पाता है या यह खाई और गहरी होती जाएगी।
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Published on:
15 Jan 2026 08:45 am
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