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निगहबान- नहरों की सांसें टूटी तो तड़प उठा सागर

हमारी धरोहरों में से एक है उम्मेद सागर, जो आज अतिक्रमण, उपेक्षा और प्रदूषण की मार से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कभी शहर की जीवनरेखा माने जाने वाले इस विशाल जलाशय की सांसें थमने के कगार पर है।

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उम्मेद सागर। फाइल फोटो- पत्रिका

संदीप पुरोहित
धमनियों में अगर रक्त का प्रवाह रोक दिया जाए तो परिणाम क्या होगा? हम सब जानते हैं। ठीक ऐसे ही अगर किसी सागर या तालाब तक पानी लाने वाली नहरों का गला घोंट दिया जाए, उसके जल प्रवाह मार्ग पर कब्जे हो जाए, पानी के बहाव क्षेत्र में बस्तियां बस जाए तो सागर को सूखने से कौन रोक पाएगा। हमारा उम्मेद सागर इसी दिशा में बढ़ रहा है। जोधपुर की पहचान नीली बस्तियों, भव्य हवेलियों और किले के साथ साथ उसकी दूरदर्शी जल-संरचना से भी रही है।

हमारी धरोहरों में से एक है उम्मेद सागर, जो आज अतिक्रमण, उपेक्षा और प्रदूषण की मार से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कभी शहर की जीवनरेखा माने जाने वाले इस विशाल जलाशय की सांसें थमने के कगार पर है। समय रहते अगर हमने आवश्यक कार्रवाई नहीं की तो आने वाले पीढिय़ों को यही सुनने को मिलेगा एक था उम्मेद सागर…। इसमें पानी के आवक के लिए दो नहरें प्रमुख हैं। पहली नहर कायलाना सर्कल के सामने माचिया वनखंड के गेंवा बागा स्थित अभय सागर से शुरू होकर अखेराज का तालाब, गुरों का तालाब, चांदणा भाखर और सूथला होते हुए यहां तक पहुंचती थी। आज यह नहर कई स्थानों पर अतिक्रमण और मलबे के कारण नाले में तब्दील हो चुकी है।

दूसरी नहर बुझावड़ गांव के दो बांधों से शुरू होकर कदमखंडी मार्ग से जलाशय तक आती थी। इसका अधिकांश हिस्सा भी क्षतिग्रस्त और अवरुद्ध है। जलग्रहण क्षेत्र और बहाव क्षेत्र में निर्माण कानूनन अपराध है, फिर भी अतिक्रमण और मलबा डालने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, जो प्रशासनिक उदासीनता की ओर इशारा करती हैं। वर्ष 1935-36 में तत्कालीन शासक महाराजा उम्मेद सिंह का यह जलाशय उस समय की इंजीनियरिंग और जल-प्रबंधन दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण था। लगभग 315-348 एमसीएफटी पानी की भराव क्षमता, 30 फीट की अधिकतम गहराई और 2.5 किमी लंबाई-चौड़ाई वाला यह जलाशय गेज 38 फीट तक पहुंचने की क्षमता रखता है। आज यह जलाशय पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है, इसका जलग्रहण क्षेत्र ही क्षतिग्रस्त हो गया है तो इसके जिम्मेदार कोई और नहीं जोधपुर के वाशिंदे ही हैं।

लगातार सिमटते क्षेत्रफल, घटते जलस्तर और पानी की बिगड़ती गुणवत्ता का आलम यह है कि आने वाले प्रवासी पक्षियों ने भी मुंह मोड़ लिया है। अगर हालात सही होते तो इको-टूरिज्म और बर्ड-वॉचिंग जोन हो सकता था। आज सूखते जलाशय के साथ जैव-विविधता भी संकट में है। यह केवल एक तालाब का संकट नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का प्रश्न है। आज आवश्यकता है उम्मेद सागर के सरंक्षण और इसके जल प्रबंधन का नए सिरे से एक ब्लू प्रिंट तैयार किया जाए। उसी के अनुरूप चरणबद्ध तरीके से काम को अंजाम दिया जाए। दोनों ऐतिहासिक नहरों की खुदाई, सफाई और पुनर्निर्माण किया जाए। जहां संभव हो, उन्हें पक्का न कर पारंपरिक स्वरूप में बहाल किया जाए ताकि प्राकृतिक जल-प्रवाह बना रहे।

आज आवश्यकता है कि इसके कैचमेंट एरिया पर ध्यान दिया जाए। वैज्ञानिक ढंग से मैपिंग की जाए। ड्रोन सर्वे और राजस्व अभिलेखों के आधार पर जलग्रहण क्षेत्र की स्पष्ट सीमांकन प्रक्रिया की जाए। अवैध निर्माण चिन्ह्ति कर हटाए जाएं, ताकि पानी के रास्ते में कोई बाधा नहीं आए। मलबा और मूर्ति विसर्जन पर सख्ती करनी होगी। विसर्जन के लिए वैकल्पिक कृत्रिम कुंड बनाए जा सकते हैं। यह इस समस्या का अच्छा स्थायी समाधान हो सकता है। अगर सरकार इस दिशा में कदम उठाती है तो जनता को भी कदम से कदम मिलाना होगा। सामुदायिक भागीदारी मॉडल के बिना कुछ भी संभव नहीं है। स्थानीय नागरिक समितियां, पर्यावरणविद और शैक्षणिक संस्थान अभियान के तहत संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाएं, तभी जाकर सूरत बदलेगी।

जोधपुर की प्यास बुझाने के लिए कायलाना और तख्त सागर का स्टोरेज अब काफी नहीं रहा है। आए दिन पानी स्टोरेज करने के लिए क्लोजर लिए जा रहे हैं। नए स्टोरेज के रूप में कोई विकसित हो सकता है तो वह उम्मेद सागर है। वॉटर रिजरवायर स्टोरेज सर्वे करवा कर इस दिशा में आगे बढऩा होगा, तभी बढ़ते जोधपुर की प्यास बुझेगी।

sandeep.purohit@in.patrika.com