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Maha Shivratri 2026: बेहद अनोखा और चमत्कारी है जोधपुर का यह महादेव मंदिर, यहां लटकते शिवलिंग की होती है पूजा

Maha Shivratri: तख्त सागर की पहाड़ियों में बसा सिद्धनाथ धाम आस्था, वास्तु कला और प्राकृतिक चमत्कार का अनोखा संगम है। यहां गुफा में प्राकृतिक रूप से बने लटकते शिवलिंग और कलात्मक मंदिर संरचना श्रद्धालुओं को विशेष रूप से आकर्षित करती है।

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सिद्धनाथ महादेव मंदिर। फाइल फोटो- पत्रिका

जोधपुर। शहर की तख्त सागर पहाड़ियों में स्थित सिद्धनाथ धाम आस्था और प्राकृतिक चमत्कार का अद्भुत संगम है। यहां की गुफा में प्राकृतिक रूप से बने लटकते शिवलिंग और कलात्मक मंदिर संरचना के कारण यह धाम श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

अनूठी है बनावट

सिद्धनाथ धाम में स्थित सिद्धनाथ महादेव मंदिर अपनी अनूठी बनावट के लिए जाना जाता है। मंदिर के पत्थरों पर शेषनाग और भगवान शिव की आकृतियां उकेरी गई हैं, जबकि गुंबद पर भगवान राम, कृष्ण और शिव के नाम छह अलग-अलग भाषाओं में लिखे गए हैं, जो इसे भव्य रूप प्रदान करते हैं। धाम की एक छोटी गुफा में प्राकृतिक रूप से पत्थर का बना गाय के थन जैसी आकृति वाला लटकता शिवलिंग है, जिसे देखने दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और इसे कुदरत का चमत्कार मानते हैं।

क्या है सिद्धनाथ धाम की कहानी

साल 1932 में परम योगी संत नारायण स्वामी, संत एकनाथ रानाडे के साथ जोधपुर पहुंचे थे। उन्होंने सिद्धनाथ पहाड़ियों में बने छोटे महादेव मंदिर और गुफा के दर्शन किए। यहां का शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें इतना भाया कि उन्होंने इसे अपनी तपोस्थली बना लिया और साधना में लीन हो गए।

उनके ब्रह्मलीन होने के बाद शिष्य गौरी शंकर को उत्तराधिकारी बनाया गया, जो आगे चलकर संत नेपाली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। नेपाली बाबा ने यहां भव्य समाधि स्थल का निर्माण शुरू कराया और सिद्धनाथ मंदिर का विस्तार कर उसे नया कलात्मक रूप दिया। साथ ही पुराने मंदिर के पास सिद्धेश्वर महादेव के नाम से एक नया मंदिर भी बनवाया गया।

यह मंदिर छीतर के पत्थरों से निर्मित है और इसके बाहर सफेद ग्रेनाइट पत्थर की नंदी प्रतिमा स्थापित है। महाशिवरात्रि पर यहां विशेष अभिषेक और पूजा-अर्चना होती है। सिद्धनाथ मंदिर में प्राकृतिक 12 ज्योतिर्लिंग भी स्थापित माने जाते हैं।

355 सीढ़ियों का निर्माण

धाम तक पहुंच को सुगम बनाने के लिए नेपाली बाबा ने पहाड़ी के पथरीले रास्ते पर अपने अथक परिश्रम से 355 सीढ़ियों का निर्माण कराया था। बताया जाता है कि वे दिव्यांग होते हुए भी हाथों में छेनी-हथौड़ा लेकर पत्थरों को तराशते थे। मंदिर परिसर में एक गौशाला भी संचालित है, जहां 300 से अधिक गायों की सेवा होती है। इसके अलावा परिसर और आसपास की पहाड़ियों में बड़ला, बेलपत्र, पीपल सहित हजारों औषधीय पौधे लगाए गए हैं, जिससे यह धाम धार्मिक के साथ प्राकृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है।

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