1 मार्च 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

चंग थे कभी होली की शान..नहीं रहे अब कद्रदान: कारीगरों के हाथ थमे, सीमित समूहों व मोहल्लों में ही सिमटा

चंग की थाप से धडकऩे वाली गलियां और गेरियों की टोलिया अब विरले ही नजर आती हैं। एक दौर था जब होली का मतलब सामूहिक उत्सव होता था।

less than 1 minute read
Google source verification

चंग की थाप से धडकऩे वाली गलियां और गेरियों की टोलिया अब विरले ही नजर आती हैं। एक दौर था जब होली का मतलब सामूहिक उत्सव होता था। चंग की लय पर कदम थिरकते थे, फाग गाते रसिया घर-घर पहुंचते थे और पूरा शहर एक रंग में रंग जाता था। आज मस्ती का दायरा सिमटकर कुछ मोहल्लों और सीमित समूहों तक रह गया है। उत्सव का स्वर निजी होता जा रहा है, सामूहिकता कमजोर पड़ रही है। चंग बनाने वाले कारीगरों की व्यथा भी कम नहीं है। उनका कहना है कि पहले होली से कई दिन पूर्व ही चंग की मांग इतनी बढ़ जाती थी कि हाथों को फुर्सत नहीं मिलती थी। अब गिनती के ग्राहक ही पहुंचते हैं। घटती मांग के कारण कई परिवारों ने यह परंपरागत काम छोड़ दिया है। वर्षों से सहेजा गया हुनर धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहा है।

बाजार में कृत्रिम चंगों और आधुनिक साधनों की भरमार ने भी परंपरागत वाद्य को पीछे धकेला है। सस्ती और दिखावटी वस्तुओं ने असली चंग की पहचान को धुंधला कर दिया है। परिणामस्वरूप होली का वह जीवंत लोकस्वर, जो कभी जैसलमेर की पहचान था, अब कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।

ऐसे तैयार होता है चंग

-मृत नर भेड़ की खाल को सुखाकर कठोर किया जाता है।

-लकड़ी के गोल घेरे पर खाल को कसकर चढ़ाया जाता है।

-अंत में हल्दी और सुगंधित लेप लगाया जाता है, जिससे ध्वनि में गूंज और स्थायित्व आता है।