
फाइल फोटो पत्रिका
Winter Holidays Controversy : राजस्थान में सर्दियों का मिजाज बीते कुछ वर्षों में बदल चुका है। अब ठंड केवल दिसम्बर तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि जनवरी के मध्य तक शीतलहर और कोहरा आम बात हो चुका है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग अब भी पुराने शीतकालीन अवकाश कैंलेंडर पर अड़ा हुआ है।
राजस्थान में शिक्षा विभाग की ओर से इस साल भी शीतकालीन अवकाश 25 दिसंबर से 5 जनवरी तक घोषित किया गया जबकि असली सर्दी उसके बाद शुरू हुई है। 5 जनवरी के बाद प्रदेश के कई जिलों जयपुर, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, नागौर सहित अन्य क्षेत्रों-में सर्दी और शीतलहर का असर तेज हो गया। ठंड के कारण छोटे बच्चों को स्कूल भेजना जोखिम भरा हो गया है। जिससे अभिभावक में स्वाभाविक चिंता देखी गई है।
हालात को देखते हुए जिला कलक्टरों को अपने स्तर पर स्कूलों के शीतकालीन अवकाश 14 जनवरी तक बढ़ाने पड़े। इस स्थिति में शिक्षा व्यवस्था में असमानता पैदा कर दी है। कहीं स्कूल खुले रहे कहीं बंद, जिससे न तो समान पाठ्यक्रम चल पाए और न ही शैक्षणिक निरंतरता बनी रही।
शिक्षक और निजी स्कूल प्रबंधन इस अव्यवस्था के लिए सीधेतौर पर शिक्षा विभाग को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं क्योंकि विभाग ने मौसम के बदलते पैटर्न को नजरअंदाज किया। जब हर साल यही स्थिति दोहराई जा रही है तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि शीतकालीन अवकाश की तिथियां की पुनर्समीक्षा क्यों नहीं की जा रही है।
संयुक्त अभिभावक संघ के प्रवक्ता अभिषेक जैन का कहना है कि छोटे बच्चों को शीतलहर में स्कूल भेजना जोखिम भरा है। जब मौसम की स्थिति स्पष्ट रूप से प्रतिकूल है, तो शिक्षा विभाग को जमीनी हालात के अनुसार अवकाश तय करना चाहिए, न कि कैलेंडर देखकर फैसले लेने चाहिए।
इस पूरे विवाद के बीच शिक्षा मंत्री की पिछली घोषणा भी सवालों के घेरे में है। पिछले वर्ष मंत्री ने कहा था कि कड़ाके की ठंड पड़ने पर ही शीतकालीन अवकाश घोषित किए जाएंगे। लेकिन इस बार भी वही पुराना शेड्यूल लागू कर दिया गया। शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह घोषणा सिर्फ बयानबाजी बनकर रह गई, जबकि विभाग ने जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया।
स्कूल क्रांति संघ की प्रदेशाध्यक्ष हेमलता शर्मा का कहना है कि फरवरी से वार्षिक परीक्षाएं शुरू होनी हैं। अवकाश बढ़ने से कोर्स पूरा करना चुनौती बन गया है। मजबूरी में ऑनलाइन कक्षाएं चलानी पड़ रही हैं।
शिक्षा विभाग की शीतकालीन अवकाश को लेकर बार-बार हो रही किरकिरी के पीछे एक बड़ी वजह उसका पुराना और अप्रासंगिक का अकादमिक कैलेंडर भी है। जानकारों का कहना है कि विभाग का मौजूदा कैलेंडर आज भी काफी हद तक अंग्रेजों के दौर की सोच पर आधारित है, जिसमें मौसम, भारतीय पर्व और सामाजिक परिस्थितियों को प्राथमिकता नहीं दी गई। भारतीय परंपरा और सामाजिक जीवन के अनुरूप देखें तो स्कूल कैलेंडर में भारतीय पर्वों, मौसमी बदलाव और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार लचीलापन होना चाहिए।
शीलकालीन अवकाश को समीक्षा कराई जाएगी, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
मदन दिलावर, शिक्षा मंत्री
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Published on:
13 Jan 2026 10:01 am
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