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Jaipur Literature Festival: मशहूर लेखिका शोभा डे बोलीं- इच्छा को अपराध न बनाएं, सुहागरात जैसे विषय पर भी खुलकर चर्चा हुई

Jaipur Literature Festival: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में लेखिका शोभा डे ने कहा कि इच्छा केवल निजी नहीं, बल्कि राजनीतिक विषय भी है। राजनीति और समाज मिलकर खासकर महिलाओं की इच्छाओं को नियंत्रित करते हैं। उन्होंने दोहरे मानदंड, शर्म और चुप्पी पर सवाल उठाते हुए संवाद, सहमति और संवेदनशीलता की जरूरत बताई।

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जयपुर

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Arvind Rao

Jan 17, 2026

Jaipur Literature Festival

मशहूर लेखिका शोभा डे (फोटो- पत्रिका)

Jaipur Literature Festival 2026: इच्छा केवल निजी विषय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विषय भी है। सत्ता और समाज दोनों मिलकर यह तय करते हैं कि कौन क्या चाहे, कैसे चाहे और किस हद तक चाहे। खासतौर पर महिलाओं की इच्छा को हमेशा नियंत्रित, दबाया और अपराधबोध से जोड़ा गया। राजनीति जब शरीर और नैतिकता को नियंत्रित करने लगती है, तब सबसे पहले स्त्रियों की स्वतंत्रता पर असर पड़ता है। यह बात जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन फ्रंट लॉन में मशहूर लेखिका और स्तंभकार शोभा डे की किताब द सेंसुअल सेल्फ पर हुई चर्चा में लेखिका शोभा डे ने कही। इस सत्र का संचालन युवा नेता और सामाजिक कार्यकर्ता अनिश गावंडे ने किया।

चर्चा की शुरुआत अनिश गावंडे ने आखिर डिजायर को लेकर समाज में इतना डर और शर्म क्यों है। शोभा डे ने कहा कि राजनीति में इच्छा की बात करने से डरते क्यों हैं? आपकी पार्टी हार भी गई तो क्या फर्क पड़ता है?

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत मूल रूप से एक सेंसुअल सभ्यता रहा है। हमारी साड़ियां, मौसम, रंग, संगीत और साहित्य सब में कामना और सौंदर्य है। ब्रिटिश आए और विक्टोरियन नैतिकता थोप दी। तभी से इच्छा को गंदा और डरावना बना दिया गया।

राजनीति और डिजायर

अनिश गावंडे ने राजनीति में इच्छा पर चुप्पी को लोकतंत्र से जोड़ा। शोभा डे ने तंज कसते हुए कहा, नेता इच्छा की बात तभी करते हैं जब वे विधानसभा में पोर्न देखते पकड़े जाते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी ज़िक्र किया, जिसमें वयस्क कंटेंट देखने के लिए आधार लिंक करने की बात कही गई थी और इसे निजता पर हमला बताया।

राजनेताओं की बात करें तो, उनकी इच्छाओं के लिए उनके पास समय ही कहां होता है? मुझे लगता है कि उनका सबसे बड़ा प्रेम-संबंध तो खुद से ही होता है, बिल्कुल फिल्मी सितारों की तरह। ये दो अलग-अलग श्रेणियां हैं। ऐसे लोग जो अपने अलावा किसी और को देख ही नहीं सकते। आत्ममुग्धता के इस दायरे में वे आम लोगों की भावनात्मक जरूरतों और इच्छाओं से कटे रहते हैं।

महिलाएं, शर्म और चुप्पी

शोभा डे ने बताया कि मध्यमवर्गीय महाराष्ट्रीयन परिवार में पली-बढ़ी होने के कारण इच्छा जैसे विषयों पर कभी खुलकर बात नहीं हुई। स्कूल और कॉलेज में भी यह वर्जित रहा। उन्होंने कहा कि आज भी लड़कियों को इच्छा के नाम पर शर्म और अपराधबोध सिखाया जाता है। पिछले 50 सालों में महिलाओं की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।

उन्होंने कहा, एक यौन रूप से सक्रिय पुरुष की तारीफ होती है, लेकिन वही काम अगर महिला करे तो उसे ‘चरित्रहीन’ कहा जाता है। यह दोहरा मापदंड अब भी कायम है। उन्होंने कहा कि यह स्त्री-से-स्त्री संवाद एक तरह का अनौपचारिक सहारा है, क्योंकि बहुत-सी महिलाओं को न तो इंटरनेट की पहुंच है और न ही पेशेवर सलाह की सुविधा। ऐसे में यह आपसी साझा करना बेहद कीमती बन जाता है।

सत्र में सुहागरात जैसे विषय पर भी खुलकर चर्चा हुई। शोभा डे ने कहा कि फिल्मों और सामाजिक मिथकों ने इसे इतना आदर्श और काल्पनिक बना दिया है कि कई युवतियों के लिए यह अनुभव डर और पीड़ा से जुड़ा होता है। सहमति, संवाद और भावनात्मक तैयारी पर कभी बात ही नहीं की जाती। उन्होंने इसे स्त्री के अनुभव की अनदेखी बताया। आज भी बेटियों को पवित्र रहने की सलाह दी जाती है।

शोभा डे ने बताया कि कैसे महिलाएं अजनबी होते हुए भी उनसे अपनी निजी कहानियां साझा कर लेती हैं। उन्होंने इसे ‘केयर की अनौपचारिक नेटवर्किंग’ बताया, जो थेरेपी से कहीं ज्यादा सशक्त है। बेटों को आधुनिक बनाने के लिए उन्हें पहले पिताओं को प्रशिक्षित करना होगा। इच्छा की कोई उम्र नहीं होती। शरीर थक सकता है, लेकिन दिमाग और कल्पना कभी नहीं।

रिश्तों में संवाद की जगह मोबाइल फोन ने ले ली

आज की युवा पीढ़ी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीक के दौर में युवा एक-दूसरे के बेहद पास होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। डेट पर बैठे लोग भी मोबाइल फोन में खोए रहते हैं। आंखों का संपर्क, संवाद और संवेदनशीलता कम होती जा रही है। कोविड के बाद यह दूरी और गहरी हुई है, जिससे रिश्तों की भाषा और भी उलझ गई है।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल सत्र के अंत में शोभा डे ने उम्मीद जताई कि आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और कई माध्यमों से धीरे-धीरे इन चुप्पियों को तोड़ रही है। वे रिश्तों, सहमति और भावनाओं पर खुलकर बात कर रहे हैं। यही बदलाव समाज को अधिक संवेदनशील, ईमानदार और मानवीय बना सकता है। इस संवाद में लेखिका शोभा डे ने कहानी, इच्छा और समाज के रिश्ते पर गहराई से बात की।

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