
High Court (Photo Source: AI Image)
MP News: बच्चे की कस्टडी को लेकर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने नाबालिग की कस्टडी दादा को सौंपते हुए फैमिली कोर्ट, दतिया के आदेश को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति अनिल वर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बच्चे का सर्वोपरि हित ही कस्टडी तय करने का आधार है। अदालत ने माना कि दादा सरकारी शिक्षक हैं और बच्चे के भरण-पोषण, शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करा सकते हैं।
मामला गार्जियन एंड वाड्र्स एक्ट, 1890 की धारा 47 के तहत दायर प्रथम अपील से जुड़ा था। फैमिली कोर्ट दतिया ने मां द्वारा दायर धारा 25 के आवेदन को स्वीकार कर बच्चे की कस्टडी मां को देने का आदेश दिया था। इस आदेश को दादा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान नाबालिग को कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। बच्चे ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह लंबे समय से अपने दादा के साथ रह रहा है, वहीं खुश है और भविष्य में भी उनके साथ ही रहना चाहता है। उसने मां के साथ रहने से इंकार किया।
कोर्ट ने पाया कि पिता के निधन के बाद मां ने दूसरा विवाह किया और दो वर्षीय बच्चे को दादा-दादी के पास छोड़ दिया। बाद में उसने दूसरा घर भी छोड़ दिया और तीसरे विवाह की इच्छा जताई। न्यायालय ने माना कि इस आचरण से बच्चे के हित और स्थिर वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उसके आगे के जीवन के लिए ये सही नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने मां को प्रति माह एक बार मुलाकात (विजिटेशन) का अधिकार दिया है और दादा को निर्देशित किया है कि मुलाकात में कोई बाधा न डालें। अपील स्वीकार करते हुए मामला बिना किसी लागत के निस्तारित किया गया।
Updated on:
01 Mar 2026 03:41 pm
Published on:
01 Mar 2026 03:40 pm
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