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एक साल में बढ़ गए 58 गिद्ध, पहले थे 244, अब हो गए 302, तिघरा का क्षेत्र बना सुरक्षित ठिकाना

गणना में उत्साहजनक परिणाम

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एक साल में बढ़ गए 58 गिद्ध, पहले थे 244, अब हो गए 302, तिघरा का क्षेत्र बना सुरक्षित ठिकाना

एक साल में बढ़ गए 58 गिद्ध, पहले थे 244, अब हो गए 302, तिघरा का क्षेत्र बना सुरक्षित ठिकाना

ग्वालियर . ग्वालियर वन मंडल द्वारा इस वर्ष कराई गई गिद्ध गणना में उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। वर्ष 2024 की तुलना में इस बार गिद्धों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। ताजा आंकड़़े के अनुसार वन मंडल क्षेत्र में कुल 302 गिद्ध पाए गए, जबकि पिछले वर्ष इनकी संख्या 244 थी। इस प्रकार एक वर्ष में 58 गिद्धों की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
वन अधिकारियों के अनुसार सबसे अधिक गिद्ध तिघरा क्षेत्र में पाए गए हैं। यहां का पहाडी़ और दुर्गम भू-भाग गिद्धों के लिए सुरक्षित आवास साबित हो रहा है। खड़ी पहाडिय़ो पर वे आसानी से अपने घोंसले बना लेते हैं, जहां अन्य जंगली जानवरों या इंसानों की पहुंच कठिन होती है।

ऐप से तीन दिन की मॉनिटरिंग
स बार तीन दिवसीय गणना प्रक्रिया को तकनीक से जोड़ा गया। वन कर्मियों के मोबाइल में इपिक कलेक्शन ऐप अपलोड कर तीन दिनों तक सुबह 6.30 से 8.30 बजे के बीच गिनती की गई। इसमें 12 प्रकार की जानकारियां एप में दर्ज कर डेटा सीधे भोपाल मुख्यालय से भेजा गया। उसी के आधार पर गणना की गई है।


खुले और सुरक्षित स्थान पसंद करते हैं गिद्ध
विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्ध खुले और सुरक्षित स्थानों को प्राथमिकता देते हैं, जहां भोजन और आश्रय दोनों सहज उपलब्ध हों। तिघरा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में दुधारू पशुओं की अधिकता के कारण भोजन की उपलब्धता बनी रहती है। इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों में कुत्तों की अधिक संख्या गिद्धों के लिए चुनौती बनती है, क्योंकि कई बार मृत पशुओं तक कुत्ते पहले पहुंच जाते हैं।

बसोटा, मिर्चा घाटी और धुआं क्षेत्र में सक्रियता
वन मंडल के बसोटा, मिर्चा घाटी और धुआं क्षेत्र सहित अन्य वन क्षेत्रों में भी इस बार गिद्धों की सक्रिय मौजूदगी दर्ज की गई है। सुरक्षित आवास और संरक्षण प्रयासों के चलते इनकी संख्या में धीरे-धीरे सुधार देखा जा रहा है।

&इस बार 302 गिद्धों की पहचान हुई है, जिनमें सबसे अधिक तिघरा क्षेत्र में पाए गए हैं, क्योंकि यह क्षेत्र गिद्धों के लिए सुरक्षित भी है। इस बार गणना पूरी तरह ऐप आधारित मॉनिटङ्क्षरग से की गई। जिसमें तीन दिनों तक एक ही क्षेत्र में गिद्धोंं को देखकर उनकी गणना की गई है।

मुकेश पटेल, डीएफओ