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सच्चा सुख धन संपत्ति में नहीं, बल्कि संतोष में

बेंगलूरु. प्रत्येक जीव सुख की इच्छा में दिन-रात प्रयासरत रहता है। अधिकांश जीव सच्चे सुख से अनजान रहते हुए केवल बाह्य सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हेतु धन-संपत्ति के अर्जन में ही अपना अमूल्य मानव जीवन व्यतीत कर देते हैं।शंकरपुरम में मुमुक्षु भव्य शाह की दीक्षा के उपलक्ष्य में आयोजित संसार-परिहार उत्सव के दूसरे दिन वर्षीदान वरघोडे़ […]

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बेंगलूरु.

प्रत्येक जीव सुख की इच्छा में दिन-रात प्रयासरत रहता है। अधिकांश जीव सच्चे सुख से अनजान रहते हुए केवल बाह्य सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हेतु धन-संपत्ति के अर्जन में ही अपना अमूल्य मानव जीवन व्यतीत कर देते हैं।शंकरपुरम में मुमुक्षु भव्य शाह की दीक्षा के उपलक्ष्य में आयोजित संसार-परिहार उत्सव के दूसरे दिन वर्षीदान वरघोडे़ के समापन के बाद आयोजित प्रवचन में आचार्य अरिहंत सागर सूरीश्वर ने उक्त विचार व्यक्त किए।उन्होंने कहा कि धन प्राप्ति होने पर भी लोभ के कारण मन में उत्पन्न नई-नई इच्छाएं मनुष्य को निरंतर बेचैन बनाए रखती हैं, क्योंकि सच्चा सुख धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि संतोष जैसे आत्मिक गुणों की प्राप्ति में निहित है। इसी सिद्धांत का संदेश देने हेतु अपार सत्ता और संपत्ति होने पर भी तीर्थंकर अपने राजमहल और समस्त सुख-सुविधाओं का स्वेच्छा से त्याग कर दीक्षा ग्रहण करते हैं।मुमुक्षु ने आज संसार-त्याग के प्रतीक स्वरूप वस्तुओं और संपत्ति का दान दिया। इस प्रक्रिया से जन-जन में यह संदेश प्रसारित करने का प्रयास किया जाता है कि सच्चा सुख धन या वस्तुओं को सहेजने में नहीं, बल्कि उनके त्याग में निहित है।इससे पूर्व नेशनल कॉलेज स्विमिंग पूल से आचार्य अरिहंत सागरसूरीश्वर की निश्रा में वर्षीदान वरघोडा प्रारंभ हुआ, जिसमें अनेक संतों ने सहभागिता की। संभवनाथ मंदिर पहुंचने पर मुमुक्षु भव्य शाह ने आचार्य अभयशेखरसूरीश्वर से आशीर्वाद प्राप्त किया। वरघोडा बसवनगुडी, वी.वी.पुरम और संभवनाथ मंदिर होते हुए शंकरपुरम स्थित दीक्षा मंडप पहुंचकर धर्मसभा में परिवर्तित हो गया।राहगीरों को दीक्षा-संबंधित लेख वितरितदीक्षा महोत्सव के आयोजक कल्याण मित्र परिवार के मीडिया प्रभारी हितेष कटारिया ने बताया कि संपत्ति के दान में निहित सुख का संदेश जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए वर्षीदान वरघोडे़ में सबसे आगे दीक्षा, जैन साधु और वर्षीदान की मौखिक जानकारी दी जा रही थी। विभिन्न भाषाओं में तैयार किए गए संक्षिप्त दीक्षा-संबंधित लेखों की प्रतियां राहगीरों को वितरित की गईं।

वरघोड़े में दिखा कला व संस्कृति का रंग

इसके पश्चात विभिन्न बैण्ड, नृत्य मंडलियां, भगवान के रथ, पालखी, अश्व सवार, चतुर्विध संघ, वर्षीदान करते हुए दीक्षार्थी का रथ, दक्षिण भारत के मंगल वाद्य-वृंद, केरल की नादस्वर मंडली, जैन शासन का ध्वज लिए युवा, भगवान और गुरु को चंवर डुलाते श्रावक, विभिन्न संघों के महिला मंडल, पारंपरिक वेशभूषा में श्रावक-श्राविकाएं, राजस्थानी साफे पहने गणमान्य व्यक्ति तथा मुंबई से आए दीक्षार्थी के परिजन वरघोडे़ की शोभा बढ़ा रहे थे। लगभग चार किलोमीटर लंबे इस वरघोडे़ में शंकरपुरम् युवक मंडल, महिला मंडल सहित शहर के अनेक संघों और संगठनों ने सेवाएं प्रदान कीं।

मुमुक्षु का बहुमान

वरघोडे़ के पश्चात दीक्षा मंडप में आयोजित सभा में केशरिया आदिनाथ जैन संघ, शंकरपुरम् ने मुमुक्षु का बहुमान किया। दीक्षा महोत्सव के भूमिदाता के प्रति आभार व्यक्त किया गया। दोपहर में दीक्षार्थी को गृहस्थ जीवन का अंतिम भोजन कराया गया।

स्वागत समारोह में बदला विदाई समारोहशाम को आयोजित विदाई समारोह में कल्याण मित्र परिवार के सदस्य अमन सोमावत ने दीक्षार्थी भव्य शाह से साक्षात्कार कर दीक्षा धर्म की महानता, उपयोगिता और विशेषताओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सांसारिक परिवार के लिए भले ही यह विदाई समारोह है, किंतु मुमुक्षु के लिए तो भगवान महावीर के श्रमण परिवार में यह एक स्वागत समारोह है। श्रद्धालुओं ने दीक्षार्थी पर अक्षत-वर्धापन कर संयममय जीवन के लिए मंगलकामनाएं दीं।