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Chhattisgarh Culture: 50 साल पहले शुरू हुई थी इतिहास की खोज, मल्हार उत्खनन से सामने आई छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति

Chhattisgarh Heritage छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले स्थल मल्हार में हुए ऐतिहासिक उत्खनन कार्य के 50 वर्ष पूरे हो गए हैं। वर्ष 1975-76 में शुरू हुई इस खोज ने राज्य की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक वैभव को नई पहचान दिलाई थी।

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मल्हार उत्खनन से सामने आई छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति (Photo Patrika)

Chhattisgarh Culture: @ताबीर हुसैन। छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल मल्हार में वर्ष 1975-76 में हुए ऐतिहासिक उत्खनन कार्य के 50 वर्ष पूरे हो गए हैं। 26 मई से उत्खनन का स्वर्ण जयंती वर्ष शुरू हो रहा है। यह उत्खनन मध्यप्रदेश पुरातत्व संचालनालय एवं सागर विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के सहयोग से कराया गया था, जिसने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन इतिहास को नई पहचान दी। सागर विश्वविद्यालय के प्रो. के.डी. बाजपेयी के निर्देशन में श्याम कुमार पाण्डेय, विवेक दत्त झा, के.के. त्रिपाठी तथा तत्कालीन रजिस्ट्रेशन अधिकारी जी.एल. रायकर सहित कई विशेषज्ञ इस उत्खनन कार्य से जुड़े रहे। ग्राम मल्हार में एक कृषक की निजी भूमि पर आपसी सहमति से यह उत्खनन कराया गया था।

Chhattisgarh Culture: छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव के प्रमाण

इस उत्खनन से मल्हार की सांस्कृतिक परतों और ऐतिहासिक कालखंडों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं। साथ ही छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव के प्रमाण भी प्राप्त हुए। उत्खनन से संबंधित प्रकाशन भी सागर विश्वविद्यालय द्वारा मल्हार नाम से प्रकाशित कराया गया। उत्खनन कार्य से जुड़े केके त्रिपाठी ने बाद में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में विभागाध्यक्ष के रूप में उल्लेखनीय योगदान दिया। वर्तमान में वे सागर में निवासरत हैं।

किसान की जमीन से शुरू हुई थी इतिहास की खोज

मल्हार गांव में एक किसान की निजी भूमि पर आपसी सहमति से यह उत्खनन शुरू किया गया था। खुदाई के दौरान यहां से प्राचीन सभ्यता से जुड़े कई महत्वपूर्ण अवशेष, सांस्कृतिक परतें और ऐतिहासिक प्रमाण मिले, जिन्होंने यह साबित किया कि मल्हार क्षेत्र हजारों साल पुरानी सभ्यता का केंद्र रहा है।

पुरातत्वविदों के अनुसार उत्खनन से मिले अवशेषों ने छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव और ऐतिहासिक समृद्धि की मजबूत तस्वीर पेश की। इस शोध से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज और अध्ययन बाद में सागर विश्वविद्यालय द्वारा ‘मल्हार’ नाम से प्रकाशित भी किए गए, जो आज भी शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ माने जाते हैं।

छत्तीसगढ़ की पहचान बना मल्हार

उत्खनन कार्य से जुड़े के.के. त्रिपाठी ने आगे चलकर इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में विभागाध्यक्ष के रूप में उल्लेखनीय योगदान दिया। वर्तमान में वे सागर में निवास कर रहे हैं, लेकिन मल्हार उत्खनन में उनकी भूमिका आज भी याद की जाती है।

राज्य गठन के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, नागपुर ने भी मल्हार के गढ़ क्षेत्र में उत्खनन कार्य कराया। इससे यहां की ऐतिहासिक विरासत को और मजबूती मिली। इतिहासकार मानते हैं कि मल्हार की प्राचीनता और उसकी राष्ट्रीय पहचान स्थापित करने में सागर विश्वविद्यालय की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है।

पर्यटन और शोध का बड़ा केंद्र बन रहा मल्हार

वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग रायपुर मंडल द्वारा मल्हार के ऐतिहासिक और पर्यटन महत्व को और अधिक विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यहां मौजूद प्राचीन मंदिर, मूर्तियां, स्थापत्य कला और उत्खनन से मिले अवशेष आज भी इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

पुरातत्वविद् जेआर भगत ने कहा कि स्वर्ण जयंती वर्ष केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक खोज को याद करने का अवसर है जिसने छत्तीसगढ़ के गौरवशाली अतीत को दुनिया के सामने लाने का काम किया। मल्हार आज भी अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्य समेटे हुए है और आने वाले समय में यहां और महत्वपूर्ण शोध संभावनाएं मौजूद हैं।

सागर विवि की भूमिका महत्त्वपूर्ण

राज्य गठन के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग नागपुर द्वारा भी गढ़ क्षेत्र में उत्खनन कार्य कराया गया। मल्हार की पुरातात्विक संपदा और उसकी प्राचीनता को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में सागर विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग रायपुर मंडल द्वारा मल्हार के ऐतिहासिक एवं पर्यटन महत्व को और अधिक संवर्धित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

जेआर भगत, पुरातत्वविद्