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रील कल्चर नहीं, रियल लाइफ से जन्मेगा साहित्य, पत्रिका इंटरव्यू में आलोक श्रीवास्तव ने कही बड़ी बात

Aalok Shrivastav statement on literature: लेखक और शायर आलोक श्रीवास्तव ने नई पीढ़ी के रचनाकारों को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि जेन जी को मोबाइल स्क्रीन और रीलों की दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन को देखना होगा।

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पत्रिका इंटरव्यू में आलोक श्रीवास्तव (फोटो सोर्स- पत्रिका)

रायपुर@ ताबीर हुसैन। Aalok Shrivastav interview: नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए साहित्य की गहराई और संवेदना पर जोर देते हुए प्रसिद्ध लेखक और शायर आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि जेन जी को अब मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया की रील संस्कृति से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन को करीब से देखना होगा। उनके अनुसार, साहित्य केवल कल्पना का खेल नहीं है, बल्कि यह जीवन के अनुभवों, संघर्षों और मानवीय भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति है।

उन्होंने कहा कि जब तक युवा समाज, रिश्तों, परिस्थितियों और जीवन की जमीनी सच्चाइयों को महसूस नहीं करेंगे, तब तक उनकी लेखनी में वह प्रभाव और गहराई नहीं आ सकती जो कालजयी साहित्य की पहचान होती है। आज की पीढ़ी तेजी से डिजिटल दुनिया में जी रही है, लेकिन साहित्य का जन्म हमेशा वास्तविक अनुभवों और संवेदनशील दृष्टि से ही होता है।

पैशन ही बना पेशा

श्रीवास्तव ने बताया कि हर व्यक्ति की एक यात्रा होती है। उन्होंने भी पत्रकारिता और टीवी की दुनिया में लंबा समय बिताया, लेकिन एक दौर के बाद उन्हें लगा कि अब अपने मन की दुनिया में लौटने का समय आ गया है। इसी सोच ने उन्हें साहित्य और लेखन की ओर पूरी तरह समर्पित कर दिया। आज उनका पैशन ही उनका पेशा बन चुका है।

बचपन की स्मृतियां आज भी जीवित

दिल्ली जैसे बड़े शहर में रहने के बावजूद अपने छोटे कस्बे और बचपन की यादें उनके भीतर आज भी जीवित हैं। उन्होंने कहा कि जिस मिट्टी में इंसान पलता-बढ़ता है, वह उसकी सोच, संस्कार और दृष्टि को हमेशा आकार देती है।

अपने चर्चित शेर का जिक्र करते हुए उन्होंने भावनात्मक अंदाज में कहा- “वही आंगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है, अकेला जब भी होता हूं मुझे घर याद आता है।” उन्होंने बताया कि चाहे जीवन कितना भी आगे बढ़ जाए, जड़ों से जुड़ी यादें कभी खत्म नहीं होतीं, बल्कि और भी गहरी होती जाती हैं।

बाजारवाद और साहित्य की स्वतंत्रता

आज के समय में साहित्य और बाजार के संबंधों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक साहित्यकार का काम बाजार के अनुसार खुद को ढालना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना होता है। यदि लेखक केवल लोकप्रियता और बाजार की मांग के अनुसार लिखने लगे, तो उसकी रचनात्मक स्वतंत्रता प्रभावित हो जाती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनकी कविताएं और ग़ज़लें हमेशा पहले साहित्य के रूप में जन्म लेती हैं और बाद में फिल्म, संगीत या अन्य माध्यमों तक पहुंचती हैं। यही कारण है कि उन्होंने कभी अपनी रचनात्मकता से समझौता नहीं किया।

बशीर बद्र से मिली जीवनभर की सीख

प्रसिद्ध शायर डॉ. बशीर बद्र को याद करते हुए आलोक श्रीवास्तव ने उन्हें अपना गुरु और पिता समान बताया। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र ने उन्हें यह महत्वपूर्ण सीख दी कि शायरी की असली ताकत कठिन और भारी शब्दों में नहीं, बल्कि सरल शब्दों में कही गई गहरी बात में होती है। उनके अनुसार, बशीर बद्र चाहते थे कि शेर सिर्फ किताबों तक सीमित न रहें, बल्कि आम लोगों की जुबान तक पहुंचें। यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए है और लगातार प्रासंगिक बनी हुई है।