Surya Murder And Assad Encounter Case Update Court Guidelines: बकरीद पर हुए सूर्या हत्याकांड के मुख्य आरोपी असद का एनकाउंटर 'सही' या 'गलत'? जानिए एडवोकेट DR. मयंक मेहरा ने कोर्ट की गाइडलाइन्स को लेकर क्या कुछ कहा?
Surya Murder And Assad Encounter Case Update Court Guidelines:गाजियाबाद के खोड़ा इलाके में बकरीद के दिन 11वीं के छात्र सूर्या की हत्या के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। इस सनसनीखेज हत्याकांड का मुख्य आरोपी असद शनिवार देर रात पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। पुलिस के मुताबिक आरोपी लंबे समय से फरार चल रहा था और गिरफ्तारी से बचने की कोशिश कर रहा था।
पुलिस जांच में सामने आया है कि असद गाजियाबाद छोड़कर फरार होने की योजना बना रहा था। इसके लिए उसे पैसों की जरूरत थी और वह अपने दोस्तों से रुपये लेने के लिए खोड़ा क्षेत्र में आने वाला था। इसी दौरान पुलिस को उसकी गतिविधियों की सूचना मिल गई।
DCP धवल जायसवाल ने बताया कि सूर्या हत्याकांड के बाद असद की तलाश लगातार की जा रही थी। उसकी गिरफ्तारी के लिए 50 हजार रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था। पुलिस को सूचना मिली थी कि आरोपी खोड़ा इलाके में पहुंचने वाला है, जिसके बाद उसे पकड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया।
असद के एनकाउंटर के बाद कई बड़े नेताओं ने एनकाउंटर पर सवाल भी उठाए है। इसमें समाजवादी पार्टी के नेता भी शामिल हैं। आपको बताते हैं। एनकाउंटर्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन क्या है। राजस्थान हाईकोर्ट के एडवोकेट और सहायक आचार्य (विधि) DR. मंयक मेहरा ने राजस्थान पत्रिका की टीम से बातचीत के दौरान एनकाउंटर को लेकर जानकारी शेयर की।
DR. मयंक मेहरा के मुताबिक, एनकाउंटर (Encounter) शब्द को भारतीय दण्ड कानूनों में कहीं भी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। ना तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) और ना ही पूर्ववर्ती CRPC में एनकाउंटर की कोई वैधानिक परिभाषा दी गई है।
उन्होंने कहा, '' सामान्यतः एनकाउंटर से आशय उस स्थिति से लिया जाता है जहां पुलिस और कथित अपराधी के बीच मुठभेड़ होती है और उसमें आरोपी की मृत्यु या गंभीर चोट हो जाती है। एनकाउंटर की विचारधारा वर्तमान समय में एक प्रकार की “अपराधिक विचारधारा” (criminal ideology) के रूप में विकसित होती दिखाई देती है।'' उन्होंने कहा कि यह विधि के शासन (Rule of Law) और न्यायिक प्रक्रिया (Due Process of Law) के विपरीत है।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए DR. मयंक मेहरा ने कहा, '' भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। साथ ही ये भी स्पष्ट करता है कि किसी भी व्यक्ति को केवल “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के अनुसार ही उसके जीवन से वंचित किया जा सकता है। इसलिए न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने से पूर्व किसी व्यक्ति को दंडित करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जाता है।'' उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में BNSS का सेक्शन 43(4) अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये प्रावधान कहता है कि गिरफ्तारी करते समय पुलिस आवश्यक बल का प्रयोग कर सकती है, परंतु ऐसा बल किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु का कारण नहीं बन सकता जो मृत्यु दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का आरोपी नहीं हो।
उन्होंने कहा कि धारा 43(4) BNSS के मुताबिक, “इस धारा में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने का अधिकार देता हो जिस पर मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का आरोप ना हो।” उन्होंने कहा कि इससे ये स्पष्ट है कि पुलिस को असीमित शक्ति प्रदान नहीं की गई है। कानून केवल आवश्यक और वैध बल प्रयोग की अनुमति देता है, ना कि न्यायालय की भूमिका अपने हाथ में लेने की अनुमति देता है। PUCL VS. State of Maharashtra (2014) इस विषय का एक महत्वपूर्ण निर्णय है।
DR. मेहरा के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि एनकाउंटर डेथ (encounter death) के प्रत्येक मामले में निष्पक्ष, स्वतंत्र एवं प्रभावी जांच अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में 16 महत्वपूर्ण दिशानिर्देश (guidelines) जारी की जिनमें मुख्यतः ये हैंः
| क्रमांक | निर्देश |
|---|---|
| 1 | प्रत्येक एनकाउंटर डेथ पर अनिवार्य रूप से FIR दर्ज की जाए। |
| 2 | जांच स्वतंत्र एजेंसी या अन्य पुलिस स्टेशन की टीम के द्वारा की जाए। |
| 3 | हर मामले में मजिस्ट्रियल जांच कराई जाए। |
| 4 | NHRC अथवा स्टेट ह्यूमन राइट्स कमीशन (State Human Rights Commission) को तत्काल सूचना दी जाए। |
| 5 | सभी साक्ष्यों, फॉरेंसिक रिपोर्ट्स (forensic reports) और हथियारों को सुरक्षित रखा जाए। |
| 6 | जांच पूरी होने तक संबंधित पुलिस अधिकारियों को पुरस्कार या पदोन्नति नहीं दी जाए। |
DR. मयंक मेहरा ने बताया, '' सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कहा कि फर्जी मुठभेड़ राज्य द्वारा की गई अवैध हत्या के समान है। बाद के मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने इन दिशानिर्देशों को बाध्यकारी माना। असम एनकाउंटर्स के मामलों में न्यायालय ने पुनः कहा कि PUCL जजमेंट के दिशानिर्देशों का पालन हर एक राज्य के लिए अनिवार्य है। अतः निष्कर्षतः ये कहा जा सकता है कि एनकाउंटर भारतीय विधि व्यवस्था में कोई वैधानिक दंड प्रक्रिया नहीं है। कानून पुलिस को केवल सीमित परिस्थितियों में ही जरूरी बल प्रयोग की अनुमति देता है।