Biosecurity Law: OpenAI, Anthropic और Microsoft AI के प्रमुखों ने अमेरिकी कांग्रेस से सिंथेटिक DNA और RNA की बिक्री पर अनिवार्य जांच व्यवस्था लागू करने की मांग की है।
Artificial Intelligence को साइंस, हेल्थ और रिसर्च के लिए क्रांतिकारी तकनीक माना जाता है। लेकिन इसी AI को लेकर अब दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां खुद चिंता जताने लगी हैं। उनका कहना है कि तकनीक इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि वह उन सुरक्षा दीवारों को कमजोर कर सकती है, जिन्होंने दशकों तक जैविक हथियारों जैसी खतरनाक चीजों को आम लोगों की पहुंच से दूर रखा था।
यही वजह है कि OpenAI, Anthropic और Microsoft AI के टॉप अधिकारियों ने अमेरिकी कांग्रेस से एक खास मांग की है। उन्होंने कहा है कि सिंथेटिक DNA और RNA बेचने वाली कंपनियों के लिए ग्राहकों की जांच और ऑर्डर की स्क्रीनिंग को कानूनन अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
टेक इंडस्ट्री में कंपनियां आमतौर पर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगी रहती हैं। लेकिन इस बार तस्वीर अलग है। ओपनएआई के प्रमुख सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोडेई और माइक्रोसॉफ्ट एआई के प्रमुख मुस्तफा सुलेमान ने एक साझा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पत्र को केवल AI कंपनियों का ही नहीं, बल्कि जैव प्रौद्योगिकी, राष्ट्रीय सुरक्षा और जीवन विज्ञान से जुड़े दर्जनों विशेषज्ञों का भी समर्थन मिला है। इस पत्र में कहा गया है कि AI का विकास जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी ही तेजी से सुरक्षा नियमों को भी मजबूत करना होगा।
एक्सपर्ट्स को डर यह नहीं है कि AI खुद कोई जैविक हथियार बना देगा। चिंता इस बात की है कि AI ऐसी जानकारियों तक पहुंच आसान बना सकता है जो पहले केवल सीमित वैज्ञानिकों या विशेषज्ञों के पास होती थीं। सरल शब्दों में कहें तो जो जानकारी पहले सालों की पढ़ाई और विशेष प्रशिक्षण के बाद मिलती थी, वह अब कुछ सवाल पूछने पर स्क्रीन पर आ सकती है। इसी वजह से इंडस्ट्री का मानना है कि सिंथेटिक DNA और RNA जैसे संवेदनशील जैविक पदार्थों की बिक्री पर सख्त निगरानी जरूरी हो गई है।
दिलचस्प बात यह है कि जिन कंपनियों पर ये नियम लागू होंगे, उनमें से कई भी इस मांग के समर्थन में खड़ी हैं। सिंथेटिक DNA और RNA बनाने वाली कई प्रमुख कंपनियों ने भी इस पहल का समर्थन किया है। उनका मानना है कि पूरे उद्योग के लिए एक समान नियम होना बेहतर रहेगा, ताकि सुरक्षा मानकों में कहीं कोई ढील न रह जाए।
प्रस्ताव के मुताबिक, इन पदार्थों को बेचने वाली कंपनियों को ग्राहकों की पहचान, ऑर्डर का विवरण और खरीदे गए जैविक पदार्थों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना होगा। जरूरत पड़ने पर यह जानकारी सरकारी जांच एजेंसियों की मदद कर सकेगी।
हाल के वर्षों में एआई तेजी से डेवलप हुआ है। कुछ साल पहले तक यह तकनीक केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित थी, लेकिन अब करोड़ों लोग रोजाना इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। यही तेज विस्तार नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों की चिंता का कारण बना हुआ है। उन्हें डर है कि अगर गलत इरादों वाले लोग एडवांस AI टूल्स का उपयोग करने लगें तो संवेदनशील वैज्ञानिक जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी खतरा सैद्धांतिक जरूर है, लेकिन आग लगने के बाद कुआं खोदने से बेहतर है कि पहले से तैयारी कर ली जाए।
जैविक हथियारों का इस्तेमाल बहुत कम हुआ है, लेकिन जब भी हुआ है, उसका असर बेहद गंभीर रहा है। अमेरिका में 2001 में एंथ्रेक्स से संक्रमित पत्र भेजे गए थे, जिनमें कई लोगों की जान चली गई और दर्जनों लोग संक्रमित हुए। उस घटना ने दुनिया को दिखाया था कि जैविक हमले कितने खतरनाक हो सकते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं कि जैविक एजेंट्स की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें पहचानना मुश्किल होता है। कई बार उनका रंग नहीं होता, गंध नहीं होती और कुछ मामलों में वे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक भी फैल सकते हैं। इसीलिए सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि ऐसे खतरों को शुरुआत में ही रोकना सबसे प्रभावी रणनीति है।