
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान। (फोटो: ANI)
Alliance: पिछले कुछ बरसों के दौरान मध्य पूर्व (Middle East Crisis) की राजनीति ने एक ऐसी करवट ली है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। दशकों तक एक-दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे सऊदी अरब और ईरान अब शिया सुन्नी एकता, सहयोग और दोस्ती की नई इबारत (Saudi Iran Relations) लिख रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों के बीच हुए उच्च स्तरीय सैन्य समझौतों और कूटनीतिक वार्ताओं ने अमेरिका सहित पूरी दुनिया (US Foreign Policy) को चौंका दिया है। दरअसल सऊदी अरब और ईरानके बीच तनाव का इतिहास बहुत पुराना है, जो धार्मिक और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई पर आधारित था। हालांकि, चीन की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों ने अपने दूतावास फिर से खोले और अब यह रिश्ता सिर्फ कूटनीति तक सीमित न रह कर सैन्य सहयोग तक पहुंच गया है। हाल ही में सऊदी अरब के शीर्ष सैन्य अधिकारियों की तेहरान यात्रा इस बात का प्रमाण है कि दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक-दूसरे पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं।
सऊदी अरब पारंपरिक रूप से अमेरिका का सबसे मजबूत सहयोगी रहा है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों से यह साफ है कि सऊदी अब अपनी विदेश नीति में 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) अपना रहा है। ईरान के साथ बढ़ता सहयोग इजराइल के लिए भी एक बड़ा झटका है, जो ईरान को अलग-थलग करने की कोशिशों में जुटा रहता है। अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसका एक पुराना साथी अब उसके सबसे बड़े दुश्मन के पाले में खड़ा हुआ नजर आ रहा है।
यमन में चल रहे संघर्ष और लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर होने वाले हमलों ने वैश्विक व्यापार को बहुत प्रभावित किया है। सऊदी अरब को यह समझ में आ गया है कि क्षेत्र में शांति के बिना उसका 'विजन 2030' (Vision 2030) सफल नहीं हो सकता। ईरान के साथ हाथ मिला कर वह न केवल यमन संकट का समाधान चाहता है, बल्कि क्षेत्र में बाहरी हस्तक्षेप (विशेषकर अमेरिकी सैन्य दखल) को भी कम करना चाहता है।
जानकारों का मानना है कि यह बदलाव रातों-रात नहीं आया है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपनी अर्थव्यवस्था को तेल से हटा कर पर्यटन और तकनीक की ओर ले जाना चाहते हैं, जिसके लिए उन्हें एक शांत पड़ोस की जरूरत है। वहीं, प्रतिबंधों से जूझ रहे ईरान को भी सऊदी जैसे समृद्ध देश के साथ की दरकार है। यदि यह गठबंधन मजबूत होता है, तो आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार और रक्षा सौदों में अमेरिका का एकाधिकार खत्म हो सकता है।
यह खबर केवल दो देशों के बीच हाथ मिलाने की नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका की 'मोनोपॉली' (Monopoly) खत्म होने का संकेत है। सऊदी अरब का ईरान की ओर झुकना यह दिखाता है कि अब रियाद अपनी सुरक्षा के लिए केवल वाशिंगटन पर निर्भर नहीं रहना चाहता। यह इजरायल के लिए भी खतरे की घंटी है, जो 'अब्राहम अकॉर्ड' के जरिए अरब देशों को ईरान के खिलाफ एकजुट करने का सपना देख रहा था।
इस घटनाक्रम के बाद अब सबकी नजरें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (2.0) की अगली प्रतिक्रिया पर होंगी। क्या अमेरिका सऊदी अरब पर दबाव बनाने के लिए कोई नया प्रतिबंध लगाएगा या फिर हथियारों की सप्लाई में कटौती करेगा? साथ ही, चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी, जिसने इस दोस्ती की नींव रखी थी। क्या आने वाले समय में ये दोनों देश मिलकर लाल सागर (Red Sea) की सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद संभालेंगे?
इस खबर का एक अहम पहलू 'पेट्रो-डॉलर' (Petro-dollar) भी है। यदि सऊदी अरब और ईरान (दोनों तेल के बड़े उत्पादक) आपस में गहरा सहयोग करते हैं, तो वे भविष्य में तेल का व्यापार डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं (जैसे युआन या रियाल) में करने का फैसला ले सकते हैं। यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा आघात साबित हो सकता है।
बहरहाल,निष्कर्ष सऊदी अरब और ईरान का एक मंच पर आना केवल दो देशों का मिलन नहीं, बल्कि पुरानी विश्व व्यवस्था के ढहने का संकेत है। यह 'न्यू मिडिल ईस्ट' अब वाशिंगटन के बजाय रियाद और तेहरान के फैसलों से संचालित होने की ओर बढ़ रहा है।
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Published on:
15 Jan 2026 01:14 pm
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